काठमांडाै उस देश की राजधानी है जो आर्थिक प्रगति में भारत से कहीं पीछे है। पर हर मायने में भारत की राजधानी दिल्ली से कहीं आगे है। सारे शहर की सड़कें और फुटपाथ बिल्कुल साफ़ हैं, जहां हर वक्त सफ़ाईकर्मी मुस्तैदी से डटे रहते हैं। ऐसा लगता है कि मोदी जी का ‘स्वच्छ भारत अभियान’ भारत के लिए नहीं बल्कि नेपाल के लिए था। क्योंकि भारत की राजधानी दिल्ली में तो जहां निगाह डालिये वहीं कूड़े के अंबार लगे पड़े हैं।
यही हाल काठमांडाै शहर के सार्वजनिक शौचालयों का भी है। जो इतने साफ़ रहते हैं कि आश्चर्य होता है कि मानो किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान के शौचालय हों। दूसरी ओर दिल्ली के ज़्यादातर सार्वजनिक शौचालयों की हालत इतनी खराब है कि आसानी से घुसने की हिम्मत नहीं पड़ती। काठमांडाै की एक और ख़ासियत ने पिछले तीन दिनों में मेरा ध्यान आकर्षित किया। वो है यहां की ट्रैफ़िक व्यवस्था। सभी व्यस्त सड़कों पर महिला और पुरुष पुलिसकर्मी सतर्क और सक्रिय रह कर ट्रैफ़िक नियंत्रित करते हैं। इतना ही नहीं यहां के नागरिक भी ट्रैफ़िक नियमों का ज़िम्मेदारी से पालन करते हैं। सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाली बात तो यह थी कि काठमांडाै की सड़कों पर गाड़ियों के हॉर्न का कर्कश शोर बिल्कुल भी सुनाई नहीं देता। यहां के ट्रैफ़िक नियमों के अनुसार आपातकालीन स्थिति को छोड़कर सामान्य स्थिति में हॉर्न बजाना वर्जित है और इस नियम को न मानने पर जुर्माना ठोक दिया जाता है। इससे काठमांडाै में ध्वनि प्रदूषण की कोई समस्या नहीं है। इसके साथ ही वायु प्रदूषण की तो यहां कोई समस्या ही नहीं है। जहां दिल्ली में एक्यूआई की मात्रा 400 तक पहुंच जाती है वहां काठमांडाै का एक्यूआई नगण्य है। हालांकि इसके कई कारण हैं, एक तो काठमांडाै एक घाटी में बसा है और चारों ओर पहाड़ों से घिरा है। दूसरा यहां की आबादी बहुत कम है और कारख़ानों की संख्या भी उतनी ज़्यादा नहीं। इसलिए वायु प्रदूषण की दिल्ली के साथ तुलना को छोड़ा भी जा सकता है परंतु ऐसे कई अन्य कारण भी हैं जो काठमांडाै को दिल्ली से बेहतर बनाते हैं। मिसाल के तौर पर यहां क़ानून व्यवस्था, दिल्ली की तुलना में काफ़ी व्यवस्थित है।
यहां के नागरिक बताते हैं कि आधी रात को भी यहां महिलाएं बेझिझक अकेली निकल सकती हैं। किसी भी तरह की छीना-झपटी नहीं होती। न हीं महिलाओं के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ होती है। काठमांडाै और नेपाल में कई विश्व प्रसिद्ध मंदिर भी हैं और पर्यटन की भी अनेकों जगह हैं। यहां जाने पर भी पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के साथ किसी भी तरह का छल-कपट और नाजायज़ उगाही नहीं की जाती। प्रशासन की तरफ़ से जो भी कर्मचारी तैनात किए जाते हैं वो पर्यटकों की हर संभव सहायता करते दिखाई देते हैं। ‘स्वच्छ भारत अभियान’ हो या कोई अन्य अभियान, किसी भी अभियान को प्रचारित करना आसान होता है, जो कि अखबारों और टीवी विज्ञापनों के ज़रिए किया जा सकता है, पर उस अभियान की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि देश की जनता ने उसे किस सीमा तक आत्मसात किया। अब मोदी जी के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ को ही ले लीजिए। जितना इस अभियान का शोर मचा और प्रचार हुआ उसका 5 फ़ीसदी भी धरातल पर नहीं उतरा।
भारत के किसी भी छोटे-बड़े शहर, गांव या कस्बे में चले जाइए तो आपको गंदगी के अंबार पड़े दिखाई देंगे, इसलिए इस अभियान का निकट भविष्य में भी सफल होना संभव नहीं लगता, क्योंकि जमीनी चुनौतियां ज्यों की त्यों बनी हुई हैं।
स्वदेशी अभियान की सफलता भी जन-जागरण, सतत् निगरानी और व्यवहार परिवर्तन पर निर्भर करती है। अगर आम नागरिक इसमें सक्रिय भूमिका निभाएं तभी यह आंदोलन सफल होगा। निसंदेह ‘स्वच्छ भारत अभियान’ मोदी जी की एक प्रशंसनीय पहल थी। पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने हमारे चारों ओर दिनों-दिन जमा होते जा रहे कूड़े के ढेरों की बढ़ती समस्या के निस्तारण का एक देशव्यापी अभियान छेड़ा था। उस समय बहुत से नेताओं, फिल्मी सितारों, मशहूर खिलाड़ियों व उद्योगपतियों तक ने हाथ में झाड़ू पकड़ कर फ़ोटो खिंचवा कर इस अभियान का श्रीगणेश किया था। पर सोचें आज हम कहां खड़े हैं?
शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थाई सफाई-व्यवस्था बनाना अब भी एक बड़ी चुनौती है। कचरा पृथक्करण, पुनः उपयोग और रीसायक्लिंग की जागरूकता में अपेक्षाकृत कमी दिखती है। कुछ जगहों पर शौचालयों के रखरखाव, जल आपूर्ति और व्यवहार परिवर्तन को लेकर समस्याएं बनी हुई हैं, इसलिए अभियान के उद्देश्य और जमीनी सच्चाई में अंतर बना हुआ है और अनेक स्थानों पर पुराने तरीकों का पालन अब भी हो रहा है।
दिल्ली हो या देश का कोई अन्य शहर यदि कहीं भी एक औचक निरीक्षण किया जाए तो स्वच्छ भारत अभियान की सफलता का पता चल जाएगा। यदि इतने बड़े स्तर पर शुरू किए गए अभियान की सफलता अगर काफ़ी कम पाई जाती है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? निसंदेह स्थानीय निकाय जिम्मेदार है किंतु हम सब नागरिक भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। उल्लेखनीय है कि यदि हम नागरिक किसी साफ़-सुथरे मॉल या अन्य स्थान पर जाते हैं तो सभी नियमों का पालन करते हैं। कचरे को केवल कूड़ेदान में ही डालते हैं। इस तरह हम एक साफ़- सुथरी जगह को साफ़ रखने में सहयोग अवश्य देते हैं लेकिन ऐसा क्या कारण है कि जहां किसी नियम को सख्ती से लागू किया जाता है तो हम पूरा सहयोग देते हैं परंतु जहां कहीं भी किसी नियम को लागू करने में एजेंसियां ढिलाई बरतती हैं या हमारे विवेक पर छोड़ देती हैं तो आम नागरिक भी उसे हल्के में ले लेता है। भाजपा या अन्य दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओं, स्थानीय निकायों और हम सब आम नागरिकों को भी भारत को कचरा मुक्त देश बनाने के लिए अब कमर कसनी होगी, क्योंकि ये कार्य केवल नारों और विज्ञापनों से नहीं हो पाएगा।
आश्चर्य की बात तो यह है कि हम सब जानते हैं कि लगातार कचरे के ढेरों का हमारे परिवेश में चारों तरफ़ बढ़ते जाना हमारे व हमारी आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य के लिए कितना ख़तरनाक है? फिर भी हम सब निष्क्रिय बैठे हैं।
हमें जागना होगा और इस समस्या से निपटने के लिए सक्रिय होना होगा, इसलिए नारे चाहे ‘स्वच्छता’ के लगें या ‘स्वदेशी’ के, जनता की भागीदारी के बिना, नारे-नारे ही रहेंगे।























