खालिस्तानी गतिविधियों से सिखों की छवि को नुकसान

Summary :

सिख धर्म विश्व के सबसे सम्मानित और मानवता की सेवा को समर्पित धर्मों में से एक माना जाता है। “सरबत दा भला”, सेवा, त्याग और भाईचारे का संदेश देने वाले सिख समुदाय ने दुनिया के हर कोने में अपनी मेहनत, ईमानदारी और मानव सेवा के कारण विशेष पहचान बनाई है। चाहे प्राकृतिक आपदाओं के समय लंगर सेवा हो, कोविड महामारी के दौरान मानवता की सहायता हो या समाज के कमजोर वर्गों के लिए निस्वार्थ योगदान सिख समाज ने हमेशा पूरी दुनिया को इंसानियत का संदेश दिया है। मगर आज माहौल कुछ और ही बनता जा रहा है और खालिस्तानी समर्थकों…

सिख धर्म विश्व के सबसे सम्मानित और मानवता की सेवा को समर्पित धर्मों में से एक माना जाता है। “सरबत दा भला”, सेवा, त्याग और भाईचारे का संदेश देने वाले सिख समुदाय ने दुनिया के हर कोने में अपनी मेहनत, ईमानदारी और मानव सेवा के कारण विशेष पहचान बनाई है। चाहे प्राकृतिक आपदाओं के समय लंगर सेवा हो, कोविड महामारी के दौरान मानवता की सहायता हो या समाज के कमजोर वर्गों के लिए निस्वार्थ योगदान सिख समाज ने हमेशा पूरी दुनिया को इंसानियत का संदेश दिया है। मगर आज माहौल कुछ और ही बनता जा रहा है और खालिस्तानी समर्थकों और कट्टरपं​िथयों का इसमें बहुत बड़ा योगदान है जिसके चलते समूचा सिख जगत शर्मसार होता दिखाई पड़ता है।
श्री दरबार साहिब जो कि संसार भर में बसते गुरु नानक नाम सेवा के लिए आस्था का केन्द्र है और लाखों की गिनती में सिख ही नहीं गैर सिख श्रद्धालु भी बड़ी गिनती में यहां दर्शनों के लिए आते हैं। मगर बीते दिनों में जिस प्रकार गैर सिख श्रद्धालुओं को जिन्हें सिख मर्यादा की जानकारी का आभाव रहता है सेवादारों यां फिर वालं​िटयर के तौर पर सेवा करने वालों के द्वारा बेईज्जत किया जाता है जैसे कि हाल की एक घटना में देखने को मिला कि एक गैर सिख कपड़ों सहित सरोवर में स्नान करने लगा तो बजाए उसे समझाने के सेवा पर तैनात शख्स उस पर टूट पड़ा और बहुत ही मंदभागी शब्दावली का प्रयोग किया जैसा कि सोशल मी​िडया पर दिखाई पड़ा। वहीं दरबार साहिब गलियारे में एक बेजुबान जो अपना दर्द भी बयान नहीं कर सकता किसी निहंग के द्वारा उस पर ताबड़तोड़ कृपाण से हमला बोल दिया जिसके चलते उसकी मृत्यु हो गई हालंाकि इसकी कोई अधिकारिक पुष्टि नहीं हुई मगर सोशल मीडिया पर इसका खूब प्रचार हो रहा है जिसके चलते सिख धर्म शर्मसार होने के और कुछ नहीं कर सकता।
पिछले कुछ वर्षों में खालिस्तान समर्थक गतिविधियों ने वैश्विक स्तर पर सिख समाज की सकारात्मक छवि को नुकसान पहुंचाने का काम किया है। कुछ कट्टरपंथी तत्वों द्वारा विदेशों में हिंसक प्रदर्शन, भारत विरोधी नारे, धार्मिक स्थलों के बाहर उग्र प्रदर्शन और अलगाववादी एजेंडे को बढ़ावा देने के कारण पूरी सिख कौम को अनावश्यक विवादों में घसीटने का प्रयास किया जा रहा है। कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में हाल के वर्षों में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जहां खालिस्तान समर्थक समूहों ने लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की आड़ में कट्टरता और उग्रवाद को बढ़ावा देने की कोशिश की। भारतीय दूतावासों के बाहर प्रदर्शन, राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान, मंदिरों और धार्मिक स्थलों के बाहर तनावपूर्ण गतिविधियां तथा खुलेआम हिंसा भड़काने वाले बयान इन घटनाओं से केवल भारत की छवि को नहीं, बल्कि वैश्विक सिख समाज की प्रतिष्ठा को भी प्रभावित किया है। सबसे गंभीर बात यह है कि दुनिया के अनेक देशों में आम लोग सिख धर्म और खालिस्तानी विचारधारा के बीच अंतर नहीं समझ पाते। कुछ कट्टरपंथी संगठनों की गतिविधियों के कारण पूरे सिख समुदाय को संदेह की दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति बढ़ती है, जबकि वास्तविकता यह है कि अधिकांश सिख शांति, भाईचारे और राष्ट्रभक्ति में विश्वास रखते हैं। भारत की सेना, न्यायपालिका, राजनीति, उद्योग और सामाजिक सेवा में सिखों का योगदान हमेशा गौरवपूर्ण रहा है। ऐसे में कुछ अलगाववादी तत्वों की गतिविधियों से पूरी कौम की पहचान प्रभावित होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। जरूरत इस बात की है कि शांतिप्रिय और राष्ट्रवादी सिखों की आवाज को अधिक महत्व मिले, ताकि दुनिया के सामने सिख धर्म की वास्तविक पहचान और मूल भावना उजागर हो सके। सिख कौम की पहचान तलवार की धार से नहीं, बल्कि सेवा, साहस और बलिदान से बनी है। यदि कुछ लोग व्यक्तिगत या राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस पहचान को कट्टरता से जोड़ने का प्रयास करेंगे, तो इसका नुकसान केवल भारत को नहीं बल्कि पूरी सिख कौम को उठाना पड़ेगा।
एजुकेशन लंगर समय की जरुरत
सिख धर्म मंे लंगर की प्रथा गुरु नानक देव जी के समय से शुरु हुई जब उनके पिता ने 20 रुपये देकर उन्हें व्यापार करने हेतु भेजा तो वह उन पैसों से भूखे साधुओं को भोजन करवा आए, तभी से संसार में लंगर की प्रथा चली जो आज तक जारी है। संसार में कहीं भी अगर कोई शख्स भूखा हो तो उसे इस बात का पता रहता है कि गुरुद्वारा में जाकर उसे खाने के लिए लंगर और रहने के लिए स्थान मिल जाएगा। मगर धीरे धीरे यह प्रथा दिखावे में तबदील होती चली गई। आज हालात ऐसे बन चुके हैं कि अपनी वाह वाही के चक्कर में सड़कांे पर लंगर लगाए जाते हैं जिसका जरुरतमंदों को कोई खास लाभ नहीं होता और साथ ही लंगर की बेअदबी अधिक होती है। नगर कीर्तनों के दौरान एक ही सड़क पर अनगिनत स्टाल लगा दिये जाते हैं जबकि वास्तव मंे अगर लंगर सेवा करनी हो तो एक दिन ना करके हरदिन उसे करना चाहिए। वहीं आज यह भी महसूस होने लगा है कि आज समय की जरुरत एजुकेशन लंगर लगाने की है जिस पर सिख संगत का ध्यान नहीं जा रहा। गुरु नानक पब्लिक स्कूल राजौरी गार्डन के चेयरमैन बलदीप सिंह राजा का मानना है कि एजुकेशन इतनी महंगी हो चुकी है कि अनेक सिख परिवार ऐसे हैं जिन्हंे अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए मदद की आवश्यकता रहती है उन परिवारों की मदद समुदाय को मिलकर करनी चाहिए। उन्हांेने बताया कि उनके स्कूल में भी अक्सर ऐसे केस आते रहते हैं जिन्हें राजौरी गार्डन गुरुद्वारा के सहयोग से मदद पहुंचाई जाती है। आज सिखों के अनेक विद्धयक संस्थान बहुत बड़े संकट से गुजर रहे हैं सभी को मिलकर उनका हल निकालकर उन्हें संकट से उबारना चाहिए ना कि राजनीतिक लाभ की खातिर एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करते हुए उन्हें बर्बादी की राह पर धकेलना चाहिए।
जत्थेदार अकाल तख्त की युवा पीढ़ी को प्रेरणा
सिख धर्म में पिछले लम्बे समय से धर्म परिवर्तन किए जाने की बात गंभीर चिन्ता का विषय बना हुआ है, इतना ही नहीं फैशन प्रस्ती की आड़ मंे पंजाब की युवा पीढ़ी पतितपुने की ओर अग्रसर होती चली जा रही है पर किसी भी धार्मिक जत्थेबंदी के द्वारा इसे रोकने की ओर ध्यान ही नहीं दिया मगर श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गढ़गज के द्वारा जिस प्रकार से युवा पीढ़ी जो पतितपुने की राह पर निकल चुकी है और स्वयं ही नहीं अपने बच्चों को भी सिखी से दूर कर दिया है उन बच्चों को सिखी के प्रति जागरूक करते हुए पुनः सिखी स्वरूप में आने की अपील की जा रही है, इतना ही नहीं उनके द्वारा जहां भी पतित सिख बच्चा दिखाई देता है उसे रोककर सिखी के लिए प्रेरित करते हैं जो कि एक सराहनीय कदम है। इसी प्रकार अगर हर धार्मिक नेता, प्रचारक, कथावाचक, रागी सिंह अपनी जिम्मेवारी समझते हुए पतित लोगों को सिखी में वापिसी के लिए प्रेरित करें तो निश्चित तौर पर सिखी का दायरा ना सिर्फ बढ़ेगा बल्कि भविष्य में युवा पीढ़ी सिखी से दूर हो जाएगी ही नहीं। इसके लिए देखा जाए तो सबसे अधिक दोषी पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री, गायक और कलाकार हैं जो स्वयं तो सिखी का त्याग कर ही चुके हैं उसके साथ साथ अपनी फिल्मों में इस प्रकार के दृश्य, डायलग फिल्माए जाते हैं जो युवा पीढ़ी को सिखी से दूर करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं उसके लिए भी जत्थेदार जी को ध्यान देने की आवश्यकता है।

Shera Rajput