ट्रम्प के हाथ खाली

Summary :

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार अपनी दादागिरी से पूरी दुनिया में उथल-पुथल मचाए हुए हैं। उनके हर वक्तव्य के बाद तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव आता है। पलभर में शेयर बाजार धराशायी होते हैं, फिर उनके किसी बयान पर शेयर बाजार सम्भलता है। एक व्यक्ति के अहंकारी रवैये का खामियाजा पूरी दुनिया झेल रही है। इससे स्पष्ट है कि युद्धों के चलते जटिल हो चुकी दुनिया कई खेमों में बंट चुकी है और युद्धों के खिलाफ जो सामूहिक आवाजें उठनी चाहिए थी वह गायब हैं। युद्धों के दौरान भी वैश्विक शक्तियां कूटनीतिक स्तर पर नए सम्पर्क तलाश रही हैं। चीन…

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार अपनी दादागिरी से पूरी दुनिया में उथल-पुथल मचाए हुए हैं। उनके हर वक्तव्य के बाद तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव आता है। पलभर में शेयर बाजार धराशायी होते हैं, फिर उनके किसी बयान पर शेयर बाजार सम्भलता है। एक व्यक्ति के अहंकारी रवैये का खामियाजा पूरी दुनिया झेल रही है। इससे स्पष्ट है कि युद्धों के चलते जटिल हो चुकी दुनिया कई खेमों में बंट चुकी है और युद्धों के खिलाफ जो सामूहिक आवाजें उठनी चाहिए थी वह गायब हैं। युद्धों के दौरान भी वैश्विक शक्तियां कूटनीतिक स्तर पर नए सम्पर्क तलाश रही हैं। चीन दौरे से लौटने के बाद ऐसी मीडिया रिपोर्टें आ रही थीं कि मिडिल ईस्ट में फिर से घमासान होगा। हथियारों से भर कर अमेरिकी विमान इजराइल पहुंच चुके हैं। अमेरिका और इजराइल एक बार फिर ईरान पर बड़े हमले की तैयारी कर चुके हैं लेकिन डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर ईरान पर हमले को टाल दिया। पश्चिमी मीडिया से लेकर एशियाई मीडिया तक ऐसी खबरें हवा में तैरने लगी कि अमेरिका ने चीन के डर से ईरान पर हमला टाल ​दिया है। जबकि दूसरी ओर ऐसी खबरें भी उछली कि ट्रम्प ने चीन के डर से नहीं बल्कि खाड़ी देशों कतर, सऊदी अरब और यूएई के कहने और पेंटागन की रणनीतिक रिपोर्टों के बाद ईरान पर हमले को टाला है। पर्दे के पीछे से चल रही अमेरिका-ईरान वार्ता की खबरें भी आ रही हैं कि ईरान द्वारा रखी गई शर्तों को ट्रम्प ने ठुकरा दिया है।
ईरान ने जब्त सम्पत्ति की वापसी और संवर्धित यूरेनियम वापिस न करने की शर्त रखी है। ईरान भी लगातार चेतावनी दे रहा है कि अगर उस पर दोबारा हमला हुआ तो वह न केवल खाड़ी देशों पर हमले करेगा बल्कि अमेरिकी जहाजों को भी निशाना बनाएगा। ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात यानि यूएई के परमाणु ठिकाने पर हमला कर अपनी धमकी का खतरनाक प्रभाव दिखा दिया है। अगर ईरान का मिसाइल और ड्रोन अटैक यूएई के परमाणु ठिकाने के भीतर होता तो स्थितियां बहुत भयानक होतीं। इसमें कोई संदेह नहीं कि ईरान की मिसाइल क्षमता अब भी बरकरार है। ट्रम्प के आक्रामक बयानों के बावजूद अमेरिकी सेना हमले के लिए अभी भी पूरी तरह तैयार दिखाई नहीं देती। अमेरिका के मित्र खाड़ी देश ईरान के हमलों से डरे बैठे हैं। खाड़ी देशों का मानना है कि कोई न कोई समझौता जल्द हो जाना चाहिए। अमेरिका आैर ईरान के टकराव को लेकर चीन ने भी खुलकर बातचीत का समर्थन किया है। पेंटागन ने डोनाल्ड ट्रम्प को अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कर दिया है कि ईरान के खिलाफ युद्ध से अमेरिका के रक्षा संसाधन सीमित हो सकते हैं जिसका फायदा चीन ताइवान जैसे क्षेत्रों में उठा सकता है। ट्रम्प भले ही चीन यात्रा के बाद बीजिंग को साध लेने के संकेत दे लेकिन ड्रैगन को काबू करना बहुत मुश्किल है।
कौन नहीं जानता कि चीन की तीसरी आंख से ही ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों को चुन-चुन कर दहलाया है। पेंटागन जानता है कि पूरे मिडिल ईस्ट में अमेरिका के सैन्य ठिकानों की पोजीशन को ट्रैक करने के लिए चीन के ही सैटेलाइट का इस्तेमाल हुआ है। चीन के सैटेलाइट ने सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयरबेस से लेकर यूएई, जार्डन, बहरीन स्थित अमेरिकी ठिकानों की जानकारी ईरान को उपलब्ध कराई थी। जिनपिंग और ट्रम्प की शिखर वार्ता व्यापार से लेकर ताइवान तक मतभेदों वाले मुद्दों पर बिना किसी स्पष्ट प्रगति के समाप्त हुई। जिनपिंग ने ट्रम्प को दो टूक कहा कि ताइवान में अमेरिकी हस्तक्षेप हुआ तो मामला संघर्ष का रूप ले सकता है। अमेरिका लगातार ताइवान को हथियार दे रहा है। कुछ व्यापारिक समझौतों और टैरिफ पर अस्थाई युद्ध विराम के अलावा ट्रम्प को कुछ हासिल नहीं हुआ। ईरान युद्ध के बाद भी ट्रम्प के हाथ खाली हैं। दरअसल ट्रम्प ईरान युद्ध के बाद अपनी शर्तों पर समझौता करके अमेरिकी जनता को यह​ दिखाना चाहते हैं कि दुनिया में ट्रम्प की धाक है। चुनावों में वह तभी जनता को अपना चेहरा दिखा पाएंगे। अमेरिका के भीतर लगातार उनके खिलाफ आवाजें उठ रही हैं और ट्रम्प की लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन गिर रही है। युद्ध में चीन अमेरिका को डरा नहीं रहा बल्कि डिप्लोमैटिक गेम खेल रहा है।
चीन ईरान से अपना 90 फीसदी तेल खरीदता है और उसने स्पष्ट कर दिया है कि वह ईरान से अपना तेल खरीदना जारी रखेगा। ईरान के हमलों से असुरक्षित महसूस कर रहे खाड़ी देश अब हथियारों के लिए चीन की तरफ रुख कर रहे हैं, क्योंकि वे अपनी हवाई सुरक्षा को मजबूत करना चाहते हैं। चीन लगातार खाड़ी देशों में अपनी पैठ बढ़ा रहा है। खाड़ी देश तनाव न बढ़ाने के पक्ष में हैं क्योंकि वे ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों के सीधे निशाने पर हैं। छन-छन कर आ रही रिपोर्टों में तो यह भी कहा जा रहा है कि ईरान के साथ चले टकराव के कारण अमेरिका के महंगे मिसाइल इंटरसैप्टर और गोला बारूद का बड़ा हिस्सा खत्म हो चुका है। यही कारण है कि ट्रम्प बार-बार हमले को टाल रहे हैं। ट्रम्प की दादागिरी महज दिखावटी है। पेंटागन अभी भी ईरान की ताकत का आंकलन कर रहा है। अगर कोई सम्मानजनक डील नहीं हाेती तो ट्रम्प के पास ईरान पर सैन्य हमले का ही विकल्प बचेगा लेकिन इस हमले के बाद पूरे वैश्विक बाजार में तबाही मच जाएगी। बेहतर यही होगा कि ट्रम्प अपनी मनमानी छोड़ कूटनीतिक वार्ताओं से मसले को हल करें। अन्यथा दुनिया की बड़ी आबादी को गरीबी की दलदल में धकेलने के लिए वे एकमात्र जिम्मेदार होंगे।

Aditya Chopra

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