प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिख फॉर जस्टिस के मुखिया गुरपतवंत सिंह पन्नू ने एक बार फिर भड़काऊ गतिविधियों को तेज करते हुए पंजाब के स्कूलों-कालेजों में राष्ट्रगान बंद करवाने की धमकी दी है। हालांकि आज तक खालिस्तानियों की किसी भी धमकी का भारत में कोई असर नहीं हुआ है और ना ही आगे होगा, क्योंकि भारत के लोग एकता और अखण्डता में विश्वास रखते हैं जिन पर पन्नू जैसों की किसी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इस बार गुरपतवंत पन्नू ने पंजाब के युवाओं और किशोरों को निशाना बनाया है। हाल ही में पन्नू के द्वारा सोशल मीडीया पर एक वीडियो जारी कर खुद को जेन-जेड (नई जेनरेशन) से जोड़ने की कोशिश करते हुए उन्हें देश के खिलाफ उकसाने का प्रयास किया है।
वीडियो में पन्नू ने दावा किया है कि वह 12 जनवरी से पंजाब के स्कूलों और कॉलेजों में राष्ट्रगान को लेकर बाधा पैदा करने की योजना बना रहा है, यानी कि 12 जनवरी से राष्ट्रगान बंद हो जाएगा। राष्ट्रगान जन- गण- मन बंद करवाकर उसकी जगह, “देह शिवा बर मोहे इहे” चलाएंगे। गुरपतवंत सिंह पन्नू से एक सवाल है कि ऐसा करने से क्या हो जाएगा। क्या ऐसा करके वह खालिस्तान बनवा लेंगे मगर उस खालिस्तान में रहेगा कौन, क्योंकि भारत का कोई भी सिख खालिस्तान का कभी भी समर्थक नहीं रहा और ना ही हो सकता है, क्योंकि सिखों और हिन्दुओं का आपस में जो भाईचारा है उसे पन्नू जैसे कभी अलग नहीं कर सकते। वैसे देखा जाए तो यह पहली बार नहीं हुआ, हर थोड़े दिन के बाद गुरपतवंत पन्नू उठता है और कुछ भी भड़काउ ब्यान जारी कर देता है।
मगर अब हर भारतीय भले ही वह हिन्दू हो या सिख समझ चुके हैं कि पन्नू जैसे लोग विदेशों में बैठकर केवल एजेन्सियों को खुश करने के लिए भड़कऊ बयानबाजी करते हैं, हकीकत में इनमें इतना दम नहीं है कि यह भारत में आकर किसी तरह की कोई गतिविधि कर सकें। अगर वाकय ही इन्होंने कुछ करना है तो पहले मासूम बच्चियों से हो रही दरिन्दगी बंद करवाएं। गुरु ग्रन्थ साहिब की आए दिन हो रही बेअदबियों के खिलाफ कुछ करे, मगर नहीं यह सिर्फ भड़काऊ बयानबाजी तक ही सीमित हैं। जिस राष्ट्रगान को यह बंद करवाने की धमकी देता फिर रहा है शायद इसे इस बात का ज्ञान नहीं कि देश के संविधान लिखे जाने के बाद रविन्दरनाथ टैगौर के द्वारा राष्ट्रगान तैयार किया गया जिसमें पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा (महाराष्ट्र), द्रविड़ (दक्षिण), उत्कल (ओडिशा) और बंगा (बंगाल) का उल्लेख है, जो पूरे भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता को दर्शाता है।
कुल मिलाकर, राष्ट्रगान सिखों और अन्य सभी नागरिकों को एक सूत्र में पिरोता है और देश के प्रति गौरव की भावना जगाता है जिसे समूचे भारतवासी शान से गौरवांवित होकर गाते हैं, फिर गुरपतवंत सिंह पन्नू को ऐतराज क्यों। निहंगों की कार्रवाई से समूचा सिख जगत शर्मसार : निहंग सिख जिन्हें गुरु की लाडली फौज कहा जाता है, क्योंकि इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि मुगलों के साथ जंग-ए-मैदान में गुरु की इन लाडली फौजों ने निहंग बाणे में रहकर अनेकों ही लड़ाईयां लड़ी और शहीद हुए। मगर मौजूदा समय में निहंग बाणे का फायदा कुछ आपराधिक छवि के लोगों के द्वारा किया जा रहा है जो निहंग बाणा पहनकर कुछ इस तरह की गतिविधयों को अंजाम दिया जाता है जिसके चलते निहंग जत्थेबंदियां ही नहीं बल्कि समूचा सिख शर्मसार होता है, हालांकि जो असली निहंग हैं उनकी बकायदा किसी न किसी जत्थेबंदी में रजिस्ट्रेशन होने के बाद ही उन्हें इस बाणे को पहनने का अधिकार मिलता है, मगर कुछ लोग बिना किसी रजिस्ट्रेशन के ही बाणा पहनकर घूमने लगते हैं और उन जैसों के द्वारा ही ऐसी घटनाओं को अन्जाम दिया जाता है।
हाल ही में फतेहगढ़ साहिब शहीदी जोड़ मेले के दौरान एक निहंग बाणा पहने बच्चे के द्वारा ठिठुरती ठण्ड में गैर सिखों के सिर पर पहनी टोपियां उताकर नेजे पर टांगी जा रही थी। अफसोस कि उस नासमझ को किसी ने यह समझाने की कोशिश नहीं की, जिस गुरु का वह सिख बना फिरता है उस गुरु ने दूसरों के धर्म हेतु अपना पूरा सरबंस कुर्बान कर दिया और उन्हीं के सिरों से सर्दी से बचाव के लिए पहनी टोिपयां उतारने में लग गया। अगर इसमें ताकत है तो जिन सिखों के बच्चों ने दस्तार की जगह टोपियां पहनी हैं उन्हें उतरवाने की हिम्मत दिखाए। इतना ही नहीं कई निहंगों के द्वारा दुकानदारों से जबरन वसूली की बातें भी सामने आई हैं, इसलिए निहंग जत्थेबंदियों को मुस्तैदी के साथ ऐसे नकली निहंगों को बेनकाब करना चाहिए जिससे निहंग जत्थेबंदियां और समूचा सिख जगत शर्मसार होने से बच सकें।
तीनों सैनाओं में सेवाएं देने वाले सिख योद्धा कर्नल पृथ्वीपाल सिंह: सिख समाज का भारतीय फौज में अहम योगदान रहा है, भले ही वह जल, थल या वायु सेना हो, सिख समाज के जांबाज सिपाहियों ने तीनों सेनाओं के अन्दर अपना अलग ही दबदबा बनाया। इतिहास गवाह है कि किस प्रकार सिख सिपाहियों के द्वारा जंग के मैदान में दुश्मनों के छक्के छुड़ाए जाते। हालांकि अब राज्य की जनसंख्या के हिसाब से फौज में भर्ती होने लगी है जिसके चलते सिखों की गिनती फौज में आए दिन कम होती चली जा रही है, अन्यथा पंजाब और हरियाणा से काफी गिनती में युवा वर्ग की फौज में भर्ती हुआ करती थी। एक सिख सैनिक तो ऐसा भी है जिसने जल, थल, और वायु तीनों सैनाओं में अपनी सेवाएं देकर सिख समाज का नाम रोशन किया है। तीनों सैनाओं में सेवा देने वाले कर्नल पृथीपाल सिंह गिल जिनकी 100 साल पूरे होने के बाद मृत्यु हुई। उनकी कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि यह किसी पद, पुरस्कार या प्रचार की उस पीढ़ी की, बल्कि उस पीढ़ी की कहानी है जिसने चुपचाप देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया।
बिना शिकायत, बिना शोर और बिना किसी अपेक्षा के। कर्नल गिल ने जिस दौर में सेवा दी, वह युद्धों, बदलावों और अनिश्चितताओं से भरा था। फिर भी उनका जीवन संतुलन, सादगी और साहस का प्रतीक बना रहा, उनकी पूरी ज़िंदगी यह बताती है कि देश सेवा कोई एक फैसला नहीं, बल्कि हर दिन चुना गया रास्ता होती है। आसमान से समुद्र और फिर ज़मीन तक फैली उनकी यात्रा इस बात का प्रमाण है कि जब इरादे मजबूत हों तो सीमाएं मायने नहीं रखतीं। वर्ष 1920 में पटियाला में जन्मे पृथीपाल सिंह गिल उस दौर में बड़े हुए, जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था। उनका परिवार सेना से जुड़ा था। अनुशासन और देशप्रेम उनके घर की हवा में घुला हुआ था। बचपन से ही उन्हें आसमान अपनी ओर खींचता था। यही आकर्षण उन्हें एक साहसिक कदम की ओर ले गया। साल 1942 में, परिवार को बिना बताए उन्होंने रॉयल इंडियन एयर फोर्स जॉइन कर ली। वह समय द्वितीय विश्वयुद्ध का था। कराची में प्रशिक्षण लेकर उन्होंने बतौर पायलट उड़ान भरी।
इस पद पर रहते हुए वे हॉवर्ड एयरक्राफ्ट उड़ाते थे। युवा उम्र में युद्ध का सामना करना आसान नहीं था, लेकिन पिता को बेटे की चिंता थी। उन्हें उड़ानों का जोखिम डराता था। पिता की इच्छा के आगे उन्होंने सिर झुकाया। 1943 में उन्होंने रॉयल इंडियन नेवी जॉइन की। अगले पांच साल उन्होंने माइंसवीपिंग जहाजों पर बिताए। तीर जैसे जहाजों के साथ वह युद्ध के दौरान कार्गाे वेसल्स की सुरक्षा में तैनात रहे। 1951 में उन्होंने भारतीय थल सेना में कदम रखा। आर्टिलरी रेजिमेंट में गनर ऑफिसर के रूप में उन्होंने अपनी पहचान बनाई। कर्नल पृथीपाल सिंह गिल का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची देशसेवा किसी एक वर्दी तक सीमित नहीं होती। जब इरादे मजबूत हों तो जमीन, समुद्र और आसमान सभी देशभक्ति के साक्षी बन जाते हैं।


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