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गाजा में मानवता की हत्या

गाजा पट्टी के लोग रोटी के टुकड़े-टुकड़े को तरस रहे हैं। भूख, सब्र, मौत और कयामत का दूसरा नाम बन चुका है गाजा। इजराइल और हमास का हिंसक संघर्ष साढ़े चार महीने से पूरी तरह मानवता के लिए चुनौती बना हुआ है। गाजा में रोज मानवता की हत्या हो रही है। गाजा में मदद की बाट जोह रहे लोगों पर इजराइली डिफैंस फोर्स की कार्रवाई में 104 लोगों की मौत ने युद्ध के कारण अभूतपूर्व मानवीय संकट के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। अब तक 30 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। गाजा के अस्पतालों में डीहाइड्रेशन और कुपोषण के कारण बच्चे दम तोड़ रहे हैं। महिलाओं की हालत बहुत दयनीय है। लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं। इजराइली हमले में हर 10 मिनट में एक बच्चा दम तोड़ रहा है। निर्दोष फिली​स्तीनियों की मौत मानवता का सबसे काला अध्याय है।
हालात कितने गंभीर हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र ने भी गाजा की दयनीय स्थिति को रेखांकित किया है। संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम ने चेतावनी दी है कि उत्तरी गाजा में इन दिनों अकाल के हालात हैं। गाजा के लोग भुखमरी से कुछ ही कदम दूर हैं, क्योंकि यहां खाने के लाले पड़ने लगे हैं। उधर, गाजा में कोई भी मदद पहुंचते ही लोग उसे लूटने में जुट जाते हैं, इस कारण 23 जनवरी से यहां कोई सहायता भी नहीं पहुंच रही है। गाजा पट्टी में गंभीर मानवीय आपातकाल सामने आने के बाद से वहां की मुख्य संयुक्त राष्ट्र सहायता एजेंसी इससे निपटने के लिए लगातार संघर्ष कर रही है। संयुक्त राष्ट्र ने अन्य देशों से भी सख्त जरूरत वाले हजारों फिलीस्तीनियों तक मदद पहुंचाने का आह्वान किया।
लगातार फिलीस्तीनियों की मौत को लेकर यद्यपि इजराइल पर दबाव बन रहा है लेकिन अभी तक युद्ध विराम के लिए किसी समझौते पर पहुंचने के आसार नजर नहीं आ रहे। हमास के नेताओं का भी किसी समझौते को लेकर कोई स्पष्ट रुख सामने नहीं आया है। गाजा में सुरक्षा के डगमगाते हालात के बीच अकाल का खतरा पैदा हो गया है। इजराइल गाजा पट्टी में युद्ध अपराध कर रहा है लेकिन हैरानी की बात यह है कि पूरी दुनिया कोरी बयानबाजी कर दूर से तमाशा देख रही है। अमेरिका, ​ब्रिटेन और अन्य ​पश्चिमी देश तो खुद को मानवाधिकारों का अलम्बरदार मानते हैं और समय-समय पर उनके यहां की मानवाधिकार परिषदें अन्य देशों में हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन की पूर्वाग्रह से ग्रसित रिपोर्टें जारी करती रहती हैं। आज सभी खामोशी धारण किए हुए हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि अमेरिका और उसके मित्र देश दोहरा रवैया अपना रहे हैं। दुनिया भर में मानवाधिकारों को ढिंढोरा पीटने वाले देश स्वयं मानवीय मूल्यों को हाशिये पर धकेल रहे हैं। इजराइल-हमास जंग का असर अमेरिका में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों पर भी पड़ रहा है। यह आरोप लगाया जा रहा है कि अमेरिका चुनावी लाभ के लिए पश्चिम एशिया में आक्रामकता दिखा रहा है। अमेरिका दुनिया में अपने वर्चस्व को बचाने तथा देश में चुनावों से पहले राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन की छवि चमकाने के लिए इराक और सीरिया के खिलाफ भी आक्रामकता दिखा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र में रूस के राजदूत वैसिली नेबेंजिया ने अमेरिका पर अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करने और “पश्चिम एशिया में अराजकता और विनाश के बीज बोने” का आरोप लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका और उसके सहयोगियों की हिंसा फिलीस्तीनी क्षेत्रों से लेकर लेबनान, लाल सागर और यमन तक बढ़ गई है और यह “पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने के अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को विफल कर रही है।” उन्होंने सभी देशों से “इन संवेदनहीन कृत्यों की स्पष्ट रूप से निंदा करने का आह्वान किया जो इराक और सीरियाई अरब गणराज्य की संप्रभुता का उल्लंघन करते हैं।” रूसी राजदूत ने दावा किया कि अमेरिका “मौजूदा अमेरिकी प्रशासन की छवि को सही ठहराने के लिए आगामी राष्ट्रपति चुनाव से पहले अपने चुनाव प्रचार अभियान के तहत अपनी ताकत दिखाने का प्रयास कर रहा है।’
इजराइल-हमास जंग को लेकर खुद अमेरिका का समाज दो हिस्सों में बंट चुका है। अब जबकि रमजान का महीना शुरू हो रहा है इसलिए कुछ हफ्ते के लिए युद्ध विराम तो होना ही चाहिए और हमास को भी चाहिए कि वह 40 इजराइली बंधकों को रिहा कर दे। अभी तक युद्ध विराम समझौते का कोई प्रारूप सामने नहीं आया है। दुनिया भर के मुस्लिम संगठन चीख-चीख कर इजराइली हमलों को फिलीस्तीन की आजादी और जीने के अधिकार पर हमला करार दे रहे हैं। वह यह भी सवाल उठा रहे हैं कि बीते सालों में डेढ़ लाख से ज्यादा फिलीस्तीनियों को क्याें मार दिया गया। उनमें करीब 35 हजार बच्चों का कत्लेआम ​क्यों किया गया लेकिन मुस्लिम देश हमास को आतंकी नहीं मान रहे हैं। दरअसल आतंकवाद सम्पूर्ण मानवता के लिए घातक स्थिति है जिससे कोई भी देश अछूता नहीं है। युद्धरत देशों पर संयुक्त राष्ट्र का कोई अंकुश नहीं है। विश्व शांति का राग अलापने वाले बड़े देश ही युद्ध की आग काे भड़का रहे हैं। दु​निया के बड़े मानवीय संकट को रोकने के लिए ठोक कदम उठाए जाने जरूरी हैं, अन्यथा मासूमों की लाशें ही बिछती रहेंगी।

आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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