देश के इतिहास में अलग-अलग समय पर न्यायपालिका ने संविधान, लोकतंत्र की मजबूती एवं रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। न्यायपालिका ने कार्यपालिका, विधायिका और अलग-अलग जांच एजेंसियों के खिलाफ अंतिम उम्मीद वाले संस्थान की प्रतिष्ठा हासिल की है। न्यायपालिका ने खुद को एक जिम्मेदार संस्थान के रूप में स्थापित किया है और इस तरह कानून के शासन की वास्तविकता को दिखाया है। यही कारण है कि देशवासियों का विश्वास न्यायपालिका पर कायम है। दिल्ली के चर्चित शराब घोटाले में दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल आैर उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, तेलंगाना की राजनीतिज्ञ के. कविता समेत सभी को बरी कर दिया है। यह फैसला निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया के मूलभूत महत्व को प्रतिष्ठापित करता है। अदालत ने केन्द्रीय जांच एजेंसी सीबीआई की कार्यप्रणाली और जांच करने के तरीके पर बहुत सारे सवाल खड़े किए हैं। आम लोगों के बीच यह सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियां सुनियोजित साजिश के तहत विपक्ष के नेताओं या अन्य लोगों के खिलाफ केस बनाती है। दोनों एजेंसियों के खिलाफ यह आरोप कोई नए नहीं हैं कि सरकार किसी भी राजनीतिक दल की क्यों न हो वह राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ बदले की भावना से केन्द्रीय एजेंसियों को अपना हथियार बनाती रही है।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल बिना ठोस और पर्याप्त सबूतों के लगाए गए आरोपों पर विश्वास नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि शराब घोटाले में सीबीआई की साजिश की थ्यौरी अनुमानों पर आधारित है। शराब घोटाले को लेकर सियासत में तूफान खड़ा हुआ था। इस तूफान से अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी का जनाधार प्रभावित हुआ और उसे दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा के हाथों पराजित होना पड़ा। भ्रष्टाचार के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुए सामाजिक आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी पर भ्रष्टाचार के आरोपों ने सियासत का रुख मोड़कर रख दिया था। सीबीआई की लंबी प्रक्रिया 600 पृष्ठ की चार्जशीट कुछ कम नहीं आई। आरोप पत्र में कई पहलू विरोधाभासी पाए गए। अदालत ने पूर्व डिप्टी एक्साइज कमिश्नर कुलदीप सिंह को आरोपी नम्बर एक बनाए जाने पर भी गम्भीर टिप्पणी की। पीठ ने यह भी पाया कि मनीष सिसोदिया के खिलाफ प्रथम दृष्टि में भी कोई मामला नहीं बनता।
सीबीआई के आपराधिक इरादे और व्यापक साजिश के मामले को खारिज करते हुए, अदालत ने उसकी कार्यप्रणाली पर आपत्ति जताई है-एक आरोपी को क्षमादान देने के बाद प्राप्त गवाहों के बयानों पर सीबीआई का भरोसा। अदालत ने “दक्षिण समूह” शब्द के प्रयोग के लिए एजेंसी को कड़ी और उचित फटकार लगाई है। सीबीआई का दावा था कि हैदराबाद स्थित व्यक्तियों ने आम आदमी पार्टी के नेताओं को रिश्वत दी थी। अदालत ने कहा कि “क्षेत्र-आधारित लेबलिंग” “संवैधानिक खामी” है, क्योंकि “आपराधिक मुकदमों में यह देखा जाना चाहिए कि आरोपी ने क्या किया, न कि आरोपी कौन है”। अदालत ने सीबीआई के मामले की बारीकी से जांच करते हुए बताया कि अभियोजन सामग्री कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य की सीमा को पूरा नहीं करती है, किसी नीति की विफलता अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं है और साजिश के आरोप अनुमानों या गवाहों के अपुष्ट बयानों पर आधारित नहीं हो सकते। अदालत ने जब्ती या वित्तीय साक्ष्य के अभाव के कारण मामले में मौजूद खामियों की ओर भी इशारा किया। इसमें कहा गया है, “एक ऐसी प्रक्रिया जो एक अस्थायी और अप्रमाणित आरोप के आधार पर लंबे या अनिश्चितकालीन कारावास की अनुमति देती है… एक नियामक या जांच प्रक्रिया बजाय एक दंडात्मक प्रक्रिया में तब्दील होने का जोिखम रखती है। देश में समय-समय पर घोटालों का शोर मचता रहा है। बोफोर्स घोटालों में हमने देखा है कि आरोपी कोर्ट द्वारा बरी कर दिए गए। जांच एजेंसियों की छवि दिन-प्रतिदिन बिगड़ रही है। आम धारणा यह बन रही है कि जांच एजेंसियां बिना किसी मजबूत सबूतों के नेताओं को कठघरे में खड़ा करती आई हैं। यद्यपि आम आदमी पार्टी सरकार की आबकारी नीति को नैतिकता के सिद्धांतों के विरुद्ध माना जाता रहा है। क्योंकि एक के साथ एक फ्री दारू की बोतल बांटना सरकार के सामािजक दायित्वों के खिलाफ है लेिकन कोर्ट के फैसले से केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य पर भ्रष्टाचार के दाग फीके पड़ गए हैं। इस फैसले से अरविंद केजरीवाल को दिल्ली में बाऊंस बैक करने का मौका िमल गया है। पंजाब, गुजरात और गोवा समेत राष्ट्रीय स्तर पर नए सिरे से आक्रामक राजनीति करने का रास्ता भी साफ हो गया है। यद्यपि कांग्रेस आम आदमी पार्टी को भाजपा की बी टीम करार दे रही है और कह रही है कि अरविंद केजरीवाल भाजपा की वाशिंग मशीन में धुलकर आ गए हैं। भाजपा भी कड़ी प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर रही है लेकिन राजनीति में आम आदमी पार्टी को नया जीवनदान मिला है। अब अरविंद केजरीवाल और उनकी पूरी टीम की सक्रियता बढ़ेगी। देश के सामने सबसे बड़ा सवाल तो यह पैदा हो गया है कि सीबीआई और ईडी जैसी जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता कैसे कायम हो। दोनों जांच एजेंसियों की आेर से जितने भी मामले दर्ज किए जाते हैं उनमें दोष सिद्धि की दर मामूली है तो ऐसा क्यों है। एजेंसियों की साख कम हो चुकी है। यह चिन्ता का विषय है। जांच एजेंसियों की कार्यशैली आैर उनके अधिकारियों की क्षमता की परख करना बहुत जरूरी है।
शराब घोटाला और न्यायपालिका
Summary :
देश के इतिहास में अलग-अलग समय पर न्यायपालिका ने संविधान, लोकतंत्र की मजबूती एवं रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। न्यायपालिका ने कार्यपालिका, विधायिका और अलग-अलग जांच एजेंसियों के खिलाफ अंतिम उम्मीद वाले संस्थान की प्रतिष्ठा हासिल की है। न्यायपालिका ने खुद को एक जिम्मेदार संस्थान के रूप में स्थापित किया है और इस तरह कानून के शासन की वास्तविकता को दिखाया है। यही कारण है कि देशवासियों का विश्वास न्यायपालिका पर कायम है। दिल्ली के चर्चित शराब घोटाले में दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल आैर उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, तेलंगाना की…


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