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फ्रांस में मैक्रों की जीत !

इमैनुएल मैक्रों एक बार फिर फ्रांस के राष्ट्रपति बन गए हैं। उन्होंने अपनी प्रतिद्वंद्वी मरीन ली पेन को हराया। मैक्रों को 58.55 फीसदी वोट मिले जबकि पेन को 41.45 फीसदी वोट मिले।

इमैनुएल मैक्रों एक बार फिर फ्रांस के राष्ट्रपति बन गए हैं। उन्होंने अपनी प्रतिद्वंद्वी मरीन ली पेन को हराया। मैक्रों को 58.55 फीसदी वोट मिले जबकि पेन को 41.45 फीसदी वोट मिले। धुर दक्षिणपंथी नेताओं में से मरीन ली पेन ने अब तक के सबसे ज्यादा वोट हासिल किए लेकिन इस बार के चुनावों में सन् 1969 के बाद सबसे कम 72 फीसदी मतदान हुआ है। इमैनुएल मैक्रों की इस बार जीत का अंतर 2017 की तुलना में बहुत कम है, क्योंकि तब मैक्रों के 66.1 फीसदी वोट थे जबकि मरीन ली पेन को 33.9  फीसदी वोट मिले थे। मैक्रों अपनी जीत से संतुष्ट होंगे क्योंकि दो सप्ताह पहले तक दोनों के बीच कांटे का मुकाबला चल रहा था। इमैैनुएल मैक्रों की सत्ता में वापसी इस बात का संकेत है कि फ्रांस की जनता ने कोविड-19 महामारी के दौरान उनके प्रभावशाली नेतृत्व, अर्थव्यवस्था में फिर से जान फूंकने और राजनीतिक परिदृश्य के पूरे केन्द्र पर कब्जा करने की कला को सहमति दे दी है। उनकी प्रतिद्वंद्वी मरीन ली पेन लम्बे समय से रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की पक्षधर रही है। खुद उनकी पार्टी का स्टैंड नाटो के प्रति शत्रुतापूर्ण रहा है। यही कारण है कि इमैनुएल मैक्रों का फिर से राष्ट्रपति बनना अमेरिका और फ्रांस के यूरोपीय सहयोगियों के लिए राहत भरी खबर है। खासकर ऐसे समय में जब यूक्रेन-रूस युद्ध छिड़ा हुआ है।
फ्रांस की जनता और राजनीति के विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मरीन ली पेन चुनाव जीत जाती तो वे यूक्रेन को रूस के हमले से बचाने के लिए पश्चिमी देशों के मोर्चे को कमजोर करने वाली नीतियों का पालन करती। पुतिन का खुलकर पक्ष लेती, यूरोपीय यूनियन को कमजोर करने के लिए केवल संयुक्त फ्रांस-जर्मनी प्रतिबद्धता का नारा देती। मरीन ली पेन पहले भी ब्रिटेन के ब्रैक्जिट की तर्ज पर फ्रांस को यूरोपीय यूनियन से बाहर करने का नारा दे चुकी हैं। लोग महसूस कर रहे थे कि मरीन की जीत से देश में और अधिक ध्रुवीकरण होता और फ्रांस की राजनीति में दक्षिणपंथी पार्टियों का दबदबा हो जाता। सबसे बड़ी बात तो यह रही कि लोगों ने मरीन ली पेन के आर्थिक नजरिए को लेकर कोई उत्साह नहीं दिखाया। अर्थशास्त्री भी उनकी योजनाओं को घातक करार देते रहे। पिछले चुनावों में जहां इमिग्रेशन, धर्म बनाम धर्मनिरपेक्षता और पहचान जैसे मुद्दे हावी रहे थे वहीं इस बार का यह चुनाव आम जनता की क्रय शक्ति और सुरक्षा के मुद्दे पर लड़ा गया। पिछले पांच वर्षों के दौरान मैक्रों ने घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय उथल-पुथल के बीच देश का नेतृत्व किया। येलो वेस्ट प्रोटेस्ट से लेकर फ्यूल टैक्स के खिलाफ पेरिस की सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन भी कोराना महामारी के बीच चरम पर रहे। इस सबके बावजूद मैक्रों आर्थिक सुधारों को लेकर आगे बढ़ते रहे। इस बार के चुनाव में महंगाई, कट्टर इस्लाम और हिजाब मुद्दा बने। मैक्रों कट्टर इस्लामिक गतिविधियों के खिलाफ खुलकर बोलते रहे। पिछले वर्ष ही उन्होंने ‘द फोरम आफ इस्लाम’ बनाने का ऐलान किया था। इसमें इस्लाम को नए सिरे से आकार देने की बात कही गई थी। मरीन को भी इस्लाम विरोधी माना जाता है। इस चुनाव में उन्होंने यहां तक कह दिया था कि अगर वह राष्ट्रपति बनती हैं तो देश में सार्वजनिक स्थानों पर हिजाब पहनने वाली महिलाओं पर जुर्माना लगाया जायेगा।
फ्रांस ने अब तक इस्लामी कट्टरपंथ के कारण बड़े आतंकी हमले झेले हैं। फ्रांस हमेशा इस्लामी आतंकवादी संगठनों के निशाने पर रहा है। वामपंथी रूझान वाले लोग मध्यमार्गी माने जाने वाले मैक्रों को ज्यादा पसंद नहीं करते लेकिन वे धुर दक्षिणपंथी मरीन के पक्ष में भी मतदान नहीं करना चाहते थे। कुल मिलाकर फ्रांस के नागरिकों ने स्वतंत्र, मजबूत और निष्पक्ष फ्रांस और यूरोपीय संघ के लिए प्रतिबद्ध फ्रांस को चुना है। जहां तक भारत का संबंध है 1980 के दशक में फ्रांस ने भारत के साथ अपने रिश्तों को मजबूत किया। कोशिश रंग लाई और 1998 में तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति शिराक ने भारतीय दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच सामरिक संधि पर हस्ताक्षर किए। राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी और फ्रांस्वां ओलांद के समय में भी भारत के साथ संबंध काफी मजबूत हुए।
2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने फ्रांस दौरे के दौरान लड़ाकू हवाई जहाज खरीद के सौदे पर हस्ताक्षर किए थे और फ्रांस से हमें रफेल विमान भी ​ मिल चुके हैं। मैं पाठकों को याद दिलाना चाहता हूं कि  1982 में भारत ने 36 मिराज-2000 लड़ाकू विमान का सौदा किया था और भारत-पाकिस्तान कारगिल युद्ध के दौरान यह ​विमान काफी कारगर साबित हुआ था। फ्रांस ने स्कोरपिन पनडुब्बियों की निर्माण तकनीक भी भारत काे हस्तांतरित की थी। फ्रांस भारत में नौवां सबसे बड़ा विदेशी निवेशक है। भारत में अनेक फ्रांसीसी कंपनियां जिन में भारतीयों को रोजगार मिला हुआ है। फ्रांस में भी भारत के फार्मा, साफ्टवेयर स्टील और प्लास्टिक उत्पादों की कंपनियां हैं। भारत और फ्रांस युद्ध अभ्यास भी करते रहते हैं और कई क्षेत्रों में दोनों देशों का सहयोग बढ़ रहा है। चीन मामले में भी भारत और फ्रांस के विचार समान हैं। फ्रांस ने कई बार भारत के रुख का समर्थन किया है कि हिन्द प्रशान्त काे एक खुले और समावेशी क्षेत्र के तौर पर संरक्षित रखना चाहिए तथा हिन्द प्रशांत तथा दक्षिणी चीन सागर में नौवहन की स्वतंत्रता एवं अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अनुपालन काे सुनिश्चित किया जाना चाहिए। मैक्रों का नरेन्द्र मोदी से अच्छा तालमेल है। फ्रांस भारत का एक अच्छा मित्र साबित हुआ है।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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