ममता ने सोनिया को किया फोन

Summary :

‘कितने ताने-बाने पिरोकर इस रिश्ते को बरसों तक एक लिबास पहनाया था हमने आज इसके गांठ-गिरह खोल कर इक उम्र को रेशे-रेशे कर रहे हैं हम दोनों’ पिछले दिनों कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी का 79वां जन्मदिन संसद भवन में भी मनाया गया। जन्मदिन का केक सामने हाजिर था और कांग्रेस समेत इंडिया गठबंधन के कई बड़े नेताओं की भी वहां उपस्थिति देखी जा सकती थी। एक तरफ सोनिया के साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे तो दूसरी ओर बाजू में सपा प्रमुख अखिलेश यादव बैठे थे। प्रियंका गांधी सोनिया के एकदम पीछे खड़ी थीं, केक कटा और बधाईयों का सिलसिला भी…

‘कितने ताने-बाने पिरोकर इस रिश्ते को बरसों तक एक लिबास पहनाया था हमने
आज इसके गांठ-गिरह खोल कर इक उम्र को रेशे-रेशे कर रहे हैं हम दोनों’

पिछले दिनों कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी का 79वां जन्मदिन संसद भवन में भी मनाया गया। जन्मदिन का केक सामने हाजिर था और कांग्रेस समेत इंडिया गठबंधन के कई बड़े नेताओं की भी वहां उपस्थिति देखी जा सकती थी। एक तरफ सोनिया के साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे तो दूसरी ओर बाजू में सपा प्रमुख अखिलेश यादव बैठे थे। प्रियंका गांधी सोनिया के एकदम पीछे खड़ी थीं, केक कटा और बधाईयों का सिलसिला भी शुरू हो गया कि अचानक एकदम से वहां तृणमूल कांग्रेस के कुछ सदस्यों का अप्रत्याशित आगमन हुआ और उन सांसदों ने भी समवेत स्वरों में सोनिया को जन्मदिन की बधाईयां दीं तो कुछ वहीं खड़ीं प्रियंका गांधी से बतियाने लगे, तो मौके की नजाकत को भांपते प्रियंका ने तृणमूल सांसदों से कहा-‘बहुत अच्छा लगा कि आप लोग यहां आए, पर आपकी नेता का फोन मेरी मां के पास नहीं आया, आप सबको मालूम ही होगा कि ममता जी को मेरे पिता कितना पसंद करते थे और कैसे उन्होंने सदैव उन्हें राजनीति में आगे बढ़ाने में मदद की।’ टीएमसी के सांसदगण इस पर बिना कुछ बोले वहां से बाहर निकल गए, फिर उन्होंने वहीं से फोन लगा यह पूरा वाकया दीदी को बताया। पलक झपकते ही सोनिया के मोबाइल पर ममता बनर्जी का फोन आ धमका। ममता ने जब सोनिया को जन्मदिन की भावुक बधाई दी तो शायद पहली बार सोनिया सीधे सियासी गुफ्तगू पर उतर आईं। सूत्रों की मानें तो सोनिया ने ममता से कहा, ‘अभी देश एक संक्रमण काल से गुजर रहा है और हमारी डेमोक्रेसी भी ‘अंडर थ्रेट है, यह वक्त है हम सबके साथ आने का। बंगाल में भी हमें एक महागठबंधन बनाने पर सोचना चाहिए, कांग्रेस भी इस गठबंधन का एक हिस्सा रह सकती है। ‘इस पर ममता ने चुटकी ली और कहा कि पहले आप तय कर लीजिए कि आप लोग किसके साथ हैं, अभी बिहार चुनाव में तो आप लोग कम्युनिस्टों के साथ मिलकर लड़े थे।’ सोनिया ने कहा- ‘हां, मैं बिहार के अनुभव के बाद ही यह बात कह रही हूं, अगर आप बंगाल में हमें 35-40 सीटें भी देंगी तो चलेगा।’ ममता ने कहा- ‘अभी भी हमारे यहां आपका कैडर नहीं है, आपको अगर मैं सीट दे भी देती हूं तो आपके उम्मीदवारों के हमारे कैडर को ही लड़ाना पड़ेगा। नहीं तो आपने देखा यूपी-बिहार में कांग्रेस ने अखिलेश-तेजस्वी का क्या हश्र कर दिया। यूपी में आपकी पार्टी ने 2017 में अखिलेश से लड़-झगड़ कर 114 सीटें ले लीं, पर आप अपके 7 लोग ही मुश्किल से जीत पाए, बिहार में आप 61 सीटों पर लड़ें, पर जीते सिर्फ 6, यानी दस प्रतिशत का स्ट्राइक रेट रहा आपका। देखिए, मैंने पहले भी राहुल से एक ‘ग्रैंड अलांयस’ बनाने की बात कहीं थी। हमारा प्रस्ताव था कि हम असम, त्रिपुरा व गोवा का चुनाव मिलकर लड़ते हैं, पर वे मानें नहीं। मेरा ऑफर अभी भी खुला है, आप असम में हमें सीटें दो, हम आपको बंगाल में देते हैं।’ ममता ने अपने तर्कों से सोनिया को लाजवाब कर दिया था, इस पर सोनिया बस इतना ही कह पाई- ‘आई विल टॉक टू राहुल’ और उन्होंने फोन रख दिया।
क्या महामहिम गंगवार को मिलेगा प्रमोशन?
झारखंड के मौजूदा राज्यपाल संतोष गंगवार सियासत के एक माहिर खिलाड़ी हैं, समझा जाता है कि डेढ़ वर्ष पूर्व रांची राजभवन भेजने से पहले इनसे भाजपा शीर्ष ने एक अहम वचन लिया था, सूत्रों की मानें तो वह वचन था कि उन्हें झारखंड मुक्ति मोर्चा को इंडिया गठबंधन के पाले से निकाल कर एनडीए के पाले में शामिल करवाना। अभी झामुमो के पास तीन लोकसभा सांसद हैं, दुमका, राजमहल व सिंहभूम में। गंगवार ने नेपथ्य की आहटों को भी कानोंकान खबर नहीं होने दी। सोरेन जिनका पिछले कुछ समय से तेजी से इंडिया गठबंधन से मोहभंग हो रहा था। खास कर हालिया बिहार चुनाव ने तो गठबंधन से इनके रिश्तों में मट्ठा डालने का ही काम किया। तेजस्वी व राहुल वादा करके भी बिहार में झामुमो के लिए एक भी सीट नहीं छोड़ पाए। मौके की इसी नजाकत को भांपते गंगवार साहब ने अपना सबसे बड़ा सियासी पैंतरा चल दिया। उन्होंने सीधे हेमंत सोरेन को बातचीत के लिए भाजपा चाणक्य के समक्ष बिठवा दिया। इस बातचीत से दोनों पक्षों के दरम्यान रिश्तों में जमी बर्फ पिघली और कहा जाता है कि सोरेन अपनी कुछ शर्तों के साथ एनडीए के साथ आने को राजी हो गए हैं। इस बीच गंगवार भी भाजपा चाणक्य से कई बार मिले और उनके समक्ष अपने मन के उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि अब झारखंड जैसे छोटे राज्य में उनका मन रम नहीं रहा, सो उन्हें किसी बड़े राज्य की गवर्नरी चाहिए। आने वाले दिनों में कर्नाटक और मध्य प्रदेश का राजभवन खाली होने जा रहा है, सो गंगवार साहब ने अपनी ख्वाहिशें बंगलुरू जाने की जताई है। पर समझा जाता है कि भाजपा शीर्ष ने उनसे कहा है कि उन्हें ईनाम तब बख्शा जाएगा जब वे रांची छोड़ने से पहले सोरेन से एनडीए ज्वॉइन करने की एक औपचारिक घोषणा करवा दें। भाजपा शीर्ष ने यह भी कहा कि वे झामुमो से एक मंत्री भी केंद्र सरकार में बना देंगे।
अखिलेश को ओवैसी नसीहत
पिछले दिनों मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने में डीएमके, कांग्रेस के साथ-साथ अखिलेश यादव की सपा ने भी एक महत्वपूर्ण रोल अदा किया, आमतौर पर किसी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 50 सांसदों की रजामंदी यानी के उनके दस्तख्त की जरूरत पड़ती है। पर जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ 107 विपक्षी सांसदों के दस्तख्त थे। दरअसल, यह पूरा मामला तमिलनाडु के सुब्रह्मण्यम स्वामी मंदिर से जुड़ा है। जस्टिस स्वामीनाथन ने मंदिर के अधिकारियों को परिसर में मौजूद एक दरगाह के खंभे पर दीप जलाने की अनुमति दे दी। जस्टिस के इसी फैसले से डीएमके व कांग्रेस जैसे दल खासे आहत हैं और उन्होंने सिर पर आसमान उठा रखा है। पिछले दिनों संसद में अखिलेश यादव असदुद्दीन ओवैसी से टकरा गए, तो समझा जाता है कि ओवैसी ने अखिलेश को आड़े हाथों लेते हुए कहा- ‘मैं तो आपको बहुत समझदार नेता समझता था, वैसे भी लोकसभा में आपके 37 सांसद हैं। पर मैं कहूंगा कि इस मामले में आप भाजपा के जाल में फंस गए हो। चलो, डीएमके-कांग्रेस का समझ आता है अभी उन्हें वहां चुनाव लड़ना है, पर तमिलनाडु में आपका क्या है? क्यों आप नाहक अपनी ऐसी हरकतों से हिंदू वोटरों को नाराज़ करते हो, अभी आप देखना भाजपा समर्थित सारा सोशल मीडिया आपको मंदिर व हिंदू विरोधी ठहरा देगा, फिर आप क्या करोगे? 27 में तो आपके यहां भी चुनाव होने हैं, क्या आप हिंदू वोटरों को नाराज़ करने का रिस्क ले सकते हो? आपकी पार्टी को इस पर दस्तख्त करने की क्या जरूरत थी? हर नेता को उसका दायरा मालूम होना चाहिए, क्या मैं ऐसे किसी भी प्रस्ताव पर कभी हस्ताक्षर करूंगा जो बात मुस्लिम जनभावना के खिलाफ हो? अब आप बिहार की मिसाल ले लीजिए, खुद मेरी सभाओं में भीड़ नहीं जुट पा रही थी, पर जिस दिन तेजस्वी ने मुझ पर अलगाववादी होने का चस्पां लगा दिया, मुसलमानों ने इस बात का बहुत बुरा माना, मेरे पांच लोग जीत गए। तब कहीं जाकर अखिलेश को भी अपनी गलती का अहसास हुआ।
जयंत को नड्डा ने क्यों हड़काया?
इस 10 दिसंबर को जयपुर में प्रवासी राजस्थानी दिवस आहूत था, इसमें शिरकत करने के लिए देश-दुनिया से राजस्थानी लोग वहां जुट रहे थे, खास कर वैसे प्रवासी राजस्थानी जिन्होंने विदेश में रहते हुए भी राजस्थान की धरती से अपने सीधे तार जोड़ रखे थे। इनके अलग-अलग चैप्टर मसलन लंदन, दुबई, सिंगापुर, न्यूयार्क, म्यूनिख, टोक्यो आदि भी इस आयोजन से सीधे तौर पर जुड़ रहे थे। भजनलाल सरकार ने इस आयोजन में मुख्य अतिथि के तौर पर केंद्रीय कौशल विकास राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जयंत चौधरी को बहुत पहले से आमंत्रित कर रखा था। जयंत ने भी सहर्ष इस आयोजन में शामिल होने की सहमति बहुत पहले ही दे दी थी। जयंत की उपस्थिति को जयपुर में खास बनाने के लिए उनकी पार्टी के सैंकड़ों नेता पहले से यूपी से जयपुर चले गए थे। उनके स्वागत में जगह-जगह होर्डिंग्स लगाए गए थे, उनके काफिले की अगवानी के लिए 100-200 गाड़ियों का इंतजाम किया गया था। पर एक छोटी सी चूक से यह सारा परिदृश्य बदल गया। दरअसल, उस दिन अखबारों में आयोजन के जो विज्ञापन छपे उसमें से जयंत नदारद थे, न तो उनकी फोटो छपी और न ही उनका नाम। कहते हैं इस बात से मंत्री जी को गहरी ठेस लगी, उन्होंने आनन-फानन में अपना जयपुर जाने का प्रोग्राम रद्द कर दिया, आयोजकों से कह दिया गया कि वे जयपुर आने में असमर्थ हैं चूंकि आज राज्यसभा के सेशन में उनका रहना निहायत जरूरी है। हैरान-परेशान राजस्थान सरकार ने इस बात की शिकायत भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा से कर दी और कहा-गलती से उनका नाम विज्ञापन में जाने से रह गया, पर इवेंट के बाद तो प्रचार-प्रसार होना ही था।’ नड्डा ने फोन कर जयंत को समझाया कि ‘जबान देकर इससे मुकरना ठीक नहीं, अव्वल तो अपनी सहमति देने से पहले ही खूब सोच-विचार कर लें, नहीं तो ऐसे वाकयों से केंद्र सरकार की किरकिरी होती है। ‘जयंत ने भी वादा किया कि आगे से ऐसा कुछ नहीं होगा।
…और अंत में
संसद के मौजूदा सत्र के दौरान ही एक दिन प्रधानमंत्री के कैबिन में भाजपा के कुछ अहम लोग जुटे और भाजपा के अगले अध्यक्ष को लेकर गंभीर विमर्श हुआ। भाजपा के संगठन महामंत्री बीएल संतोश ने पीएम के समक्ष अपना रोना रोते हुए कहा कि उनके ऊपर कैडर का भारी दबाव है, 15 दिसंबर को खरमास शुरू होने से पूर्व ही नए अध्यक्ष की घोषणा कर दी जाए। सूत्रों की मानें तो पीएम ने अपने साथी नेताओं को समझाते हुए कहा कि संसद चल रही है, ऐसे समय में इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं। आप नाम तय करके रखिए, नए साल में 14-15 जनवरी को नए अध्यक्ष के नाम की घोषणा कर दीजिए। पीएम की सलाह को बैठक में शामिल हर शख्स की मूक सहमति हासिल थी।

त्रिदीब रमण