देश के चुनाव आयोग पर इस समय विश्वसनीयता का भारी संकट मंडरा रहा है। इस सन्दर्भ में यह जान लेना जरूरी है कि भारत के संविधान के अनुसार चुनाव आयोग सरकार का अंग या हिस्सा न होकर एक स्वतन्त्र स्वायत्तशासी संस्था होती है। अतः इसके कार्यकलापों की जिम्मेदारी सरकार के किसी मन्त्री की नहीं होती बल्कि यह खुद चुनाव आयोग की होती है। मुख्य चुनाव आयुक्त तीन सदस्यीय चुनाव आयोग का मुखिया होता है अतः संविधान के अनुसार आयोग जो भी फैसले करता है वे तीनों में सर्वसम्मति के अनुसार या बहुमत से होने चाहिए। मगर अंग्रेजी दैनिक में विगत 23 सितम्बर को किये गये खुलासे से स्पष्ट हो गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार गुप्ता ने मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण के दौरान एेसे इकतरफा निर्णय लिये जिन पर अन्य दो चुनाव आयुक्तों सर्वश्री सुखबीर सिंह सन्धू व विवेक जोशी की सहमति नहीं थी। अब अखबार के खुलासे के बाद चुनाव आयोग की तरफ से जो स्पष्टीकरण 26 सितम्बर को जारी किया गया है उसमें पुराने किये गये फैसलों की समीक्षा करके उनमें सुधार करने का निर्णय किया गया है। इससे साफ हो गया है कि पिछले दस महीनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ने बिना श्री सन्धू व जोशी की सहमति के ही फैसले लिये। एक प्रकार से यह श्री ज्ञानेश कुमार की स्वीकारोक्ति है। क्योंकि अंग्रेजी दैनिक की रिपोर्ट में कहा गया था कि पिछले दस महीनों में 14 बार श्री सन्धू व जोशी ने आयोग के फैसलों पर अपनी लिखित आपत्ति या असहमति जताई मगर ज्ञानेश कुमार ने इन पर कोई ध्यान नहीं दिया। इसका कानूनी पहलू यह है कि पिछले दस महीनों में आयोग ने जो भी फैसले किये क्या उन्हें संवैधानिक माना जायेगा?
पूरा देश जानता है कि इन दस महीनों के दौरान चुनाव आयोग ने देश के 30 केन्द्र शासित क्षेत्रों व राज्यों में मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण किया और 13 करोड़ मतदाताओं के नाम काट डाले। ये नाम इन दस महीनों के दौरान आयोग द्वारा जारी नये नियमों के तहत ही काटे गये। अतः सवाल उठना लाजिमी है कि क्या काटे गये नाम संविधान की कसौटी पर खरे हैं? इस प्रश्न से पूरी गहन पुनरीक्षण कवायद पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाता है। कुछ चुनाव व विधिवेत्ता सवाल खड़े कर रहे हैं कि देश के सर्वोच्च न्यायालय को इसका संज्ञान लेना चाहिए क्योंकि भारत में संविधान का राज देखना उसकी जिम्मेदारी है। पिछले दस महीनों में बिहार व प. बंगाल में विधानसभा चुनाव भी पुनरीक्षित मतदाता सूचियों के आधार पर ही हुए अतः विशेषज्ञ इन चुनावों की वैधानिकता पर भी सवालिया निशान लगा रहे हैं। कुल मिला कर श्री ज्ञानेश कुमार ने उस चुनाव आयोग की साख को धरातल पर लाकर पटक दिया है जिसकी कार्यप्रणाली का अध्ययन करने कभी ब्रिटिश सरकार का प्रतिनिधिमंडल भारत आया था। जबकि आजादी के बाद भारत ने खुद ब्रिटिश की संसदीय प्रणाली के लोकतन्त्र का अनुसरण किया था।
चुनाव आयोग ने पिछले दस महीनों के दौरान न केवल मौजूदा मतदाताओं के नाम काटे बल्कि 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवा वर्ग के नये मतदाताओं के नाम जोड़ने की प्रक्रिया भी जटिल की और इस बाबत भरे जाने वाले फार्म-6 में यह शर्त जोड़ दी कि युवा को अपने माता-पिता के मतदाता होने का भी सबूत देना होगा जबकि मूल फार्म-6 में एेसा कोई प्रावधान नहीं था। इस फार्म में नई शर्तें जोड़ने का प्रावधान केवल देश की संसद ही कर सकती थी। एेेसे फैसले को श्री सन्धू ने गैर संवैधानिक बताया और पूछा कि यह फैसला किसके कहने पर लिया गया? श्री विवेक जोशी ने भी इसकी हिमायत की। इसका निष्कर्ष भी यही निकलता है कि श्री ज्ञानेश कुमार इकतरफा मनमर्जी के फैसले लेकर उहें चुनाव आयोग पर थोप रहे थे। अपने 26 सितम्बर के स्पष्टीकरण में आयोग ने कहा है कि अब आगे से फार्म-6 अपने मूल रूप में ही भरा जायेगा। मगर आयोग को यह भी बताना चाहिए कि उन 13 करोड़ मतदाताओं का क्या होगा जिनके नाम मतदाता सूचियों से काटे जा चुके हैं जबकि भारत का संविधान चुनाव आयोग को हुक्म देता है कि एक भी जायज मतदाता नागरिक का नाम सूची से छूटना नहीं चाहिए और किसी गैर भारतीय नागरिक का नाम इसमें शामिल नहीं होना चाहिए। अतः चुनाव आयोग को यह भी बताना चाहिए कि उसने अभी तक कितने गैर भारतीय नागरिकों के नाम मतदाता सूची से काटे। खबर के खुलासे में यह भी रहस्योद्घाटन हुआ था कि ज्ञानेश कुमार आयोग की बैठक बुलाने से पहले किसी प्रकार की विषयावली (एजेंडा) दोनों आयुक्तों को नहीं भेजते थे और न ही बैठक की कार्यवाही का अाधिकारिक रिकाॅर्ड बनाते थे।
अब 26 सितम्बर को जारी बयान या स्पष्टीकरण में कहा गया है कि आगे से बैठकों का एजेंडा भी पूर्व में दोनों आयुक्तों के पास भेजा जायेगा और बैठकों का रिकाॅर्ड भी रखा जायेगा। ज्ञानेश कुमार ने इंटरनेट माध्यम से नाम जोड़ने व काटने की प्रक्रिया के लिए बनाये गयी वेबसाइट ‘ईसीआई नेट’ का भी केन्द्रीकरण कर दिया था और दिल्ली में इसकी चाबी एक अफसर को दे दी थी जिससे राज्यों में बैठे चुनाव अधिकारियों को मतदाता नाम जोड़ने व काटने की सुविधा ही नहीं प्राप्त थी। अब 26 सितम्बर को जारी स्पष्टीकरण में कहा गया है कि ईसीआई नेट के कामकाज की जांच के लिए उपचुनाव आयुक्त के औहदे के एक अफसर के नेतृत्व में एक समिति बनाई जायेगी जिसमें एक स्वतन्त्र विशेषज्ञ भी शामिल होगा। आयोग ने पिछले दस महीनों में तकनीकी अनियमितता या लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के आधार पर लाखों मतदाताओं के नाम सूचियों से काटने के नोटिस सम्बद्ध मतदाताओं को जारी किये और उनके नाम मतदाता सूची से उड़ा डाले जिसका सबसे बड़ा प्रमाण प. बंगाल की मतदाता सूची है जहां 37 लाख के लगभग मतदाताओं को नोटिस जारी किये गये। ये मतदाता विधानसभा चुनावों में भाग नहीं ले सके। अब आयोग कह रहा है कि नोटिस पाने वाले मतदाताओं के घर बीएलओ (विकासखंड स्तर का संगणक) जायेगा और छोटी-मोटी गलतियों को परिमार्जित करेगा।
आखिरकार चुनाव आयोग में यह हो क्या रहा था ? श्री ज्ञानेश कुमार को ध्यान में रखना चाहिए कि भारत के संविधान निर्माता बाबा साहेब अम्बेडकर जिस पुस्तक को लिख कर गये हैं उसके अनुसार चुनाव आयोग की भूमिका भारत में उस लोकतन्त्र की स्थापना करना है जिसका मालिक आम मतदाता ही होगा। गांधी ने अंग्रेजों से आजाद करा कर भारत को इसके लोगों के हाथ में एक वोट का समान मूल्य अधिकार देकर ही सौंपा था। यह बेशकीमती अधिकार वह किसी तकनीकी अनियमितता का बहाना बना कर नहीं ले सकते।
मतदाता और चुनाव आयोग
Summary :
देश के चुनाव आयोग पर इस समय विश्वसनीयता का भारी संकट मंडरा रहा है। इस सन्दर्भ में यह जान लेना जरूरी है कि भारत के संविधान के अनुसार चुनाव आयोग सरकार का अंग या हिस्सा न होकर एक स्वतन्त्र स्वायत्तशासी संस्था होती है। अतः इसके कार्यकलापों की जिम्मेदारी सरकार के किसी मन्त्री की नहीं होती बल्कि यह खुद चुनाव आयोग की होती है। मुख्य चुनाव आयुक्त तीन सदस्यीय चुनाव आयोग का मुखिया होता है अतः संविधान के अनुसार आयोग जो भी फैसले करता है वे तीनों में सर्वसम्मति के अनुसार या बहुमत से होने चाहिए। मगर अंग्रेजी दैनिक में विगत…


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