संसद के शीतकालीन सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित किए गए। जिनमें मनरेगा की जगह जी राम जी, परमाणु ऊर्जा से जुड़ा ‘‘द सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रास्फाॅर्मिंग इंडिया बिल 2025’’ यानि शांति बिल 2025 और बीमा कानून संशोधन विधेयक को मंजूरी दी गई। परमाणु विधेयक को लेकर देशभर में चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि इससे परमाणु ऊर्जा पर केन्द्र सरकार का एकाधिकार खत्म होगा। वहीं देश में प्राइवेट कम्पनियां परमाणु संयंत्रों के निर्माण और इससे संचालन गतिविधियों में शामिल हो सकेंगी। निजी कम्पनियों के हाथ में परमाणु शक्तियों का आना उचित है या अनुचित इस पर गम्भीर बहस जारी है।
इस विधेयक में प्राइवेट कम्पनियों के लिए परमाणु संयंत्र के निर्माण और इसके संचालन के लिए लाइसैंस हासिल करने का प्रावधान किया गया है। निजी क्षेत्र किसी सरकारी संस्था या किसी कम्पनी के साथ मिलकर संयुक्त उपक्रम के लिए भी लाइसैंस हासिल कर सकते हैं। इन कम्पनियों को परमाणु ईंधन लाने-ले जाने की अनुमति होगी। हालांकि परमाणु ऊर्जा से जुड़ी कई गतिविधियों पर सरकार की पाबंधियां रहेंगी। परमाणु संवर्धन, खर्च हुए ईंधन के प्रबंधन और हैवी वाटर के उत्पादन से जुड़े काम केन्द्र के नियंत्रण में रहेंगे। सरकार के पास रेडियो एक्टिव पदार्थों या रेडिएशन से जुड़े उपकरणों के नियंत्रण का भी अधिकार होगा, ताकि किसी सुरक्षा खतरे की स्थिति में सरकार खुद व्यवस्था को अपने हाथ में ले सके।
पहला महत्वपूर्ण सवाल यह है कि परमाणु ऊर्जा में प्राइवेट सैक्टर की जरूरत क्यों समझी गई। भारत में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। देश में इस समय परमाणु ऊर्जा क्षमता 8.18 मेगावाट है और वर्ष 2047 तक 100 मेगावाट की जरूरत होगी। वर्तमान में भारत में 20 से अधिक परमाणु रिएक्टर काम कर रहे हैं। 100 मेगावाट क्षमता प्राप्त करने के िलए लगभग 15 लाख करोड़ रुपए की जरूरत है जबकि बजट 2025-26 में केवल 20 हजार करोड़ का प्रावधान है, इसलिए पूंजी जुटाने के लिए निजी सैक्टर का निवेश जरूरी है। निजी भागीदारी से छोटे मॉडयूलर रिएक्टर और उन्नत तकनीक से परमाणु ऊर्जा का विस्तार किया जा सकता है। यह विधेयक प्राइवेट सैक्टर की भागीदारी की तरफ कदम बढ़ाता है लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह उठ रहा है कि अगर परमाणु ऊर्जा से जुड़ा कोई बड़ा हादसा होता है तो उसके लिए जिम्मेदार कौन होगा।
संसद में चर्चा के दौरान विपक्ष ने इसको लेकर कई सवाल उठाए। विपक्ष का कहना है कि सवाल सिर्फ बाजार खोलने का नहीं है बल्कि इससे जोखिम की प्रकृति उत्तरदायित्व और निगरानी संरचना पूरी तरह से बदल जाएगी। अगर निजीकरण की प्रक्रिया पारदर्शी सख्त और जनहित की शर्तों पर न हुई तो भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। परमाणु ऊर्जा अगर भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सहायक है तो इसका गलत प्रबंधन हादसों को भी बुलावा दे सकता है। ऐसे में सरकार ने विधेयक में परमाणु हादसों को ध्यान में रखते हुए कुछ नियम बनाए हैं। इसके तहत किसी भी दुर्घटना की स्थिति में परमाणु ऊर्जा से जुड़े केंद्र के संचालक को सबसे पहले घटना के लिए जिम्मेदार माना जाएगा और उसे नुकसान की भरपाई करनी होगी इसमें कहा गया है कि परमाणु केंद्र का संचालक हर तरह के नुकसान और तबाही के लिए जिम्मेदार होगा, सिवाय किसी खतरनाक प्राकृतिक आपदा से हुई तबाही के।
यानी अगर कोई प्राकृतिक आपदा ऐसी है, जिसमें तमाम सुरक्षा मानकों का पालन करने के बावजूद नुकसान को नहीं रोका जा सकता, उस स्थिति में संचालक की जिम्मेदारी सीमित या नहीं होगी। इसके अलावा सशस्त्र संघर्ष, गृह युद्ध, आतंकवाद की घटना या विद्रोह की स्थिति में भी परमाणु इंस्टॉलेशन के संचालक की जिम्मेदारी सीमित या तय होगी। विधेयक में यह भी कहा गया है कि अगर नुकसान का मुआवजा संचालक की तय जिम्मेदारी से ज्यादा है तो अतिरिक्त मुआवजे के लिए केंद्र सरकार जिम्मेदार होगी। यद्यपि यह कानून परमाणु दुर्घटनाओं के पीड़ितों के लिए क्षतिपूर्ति की जिम्मेदारी आपूर्तिकर्ताओं के साथ-साथ संचालकों तक विस्तारित करता है। इसी प्रावधान के चलते अमेरिका और फ्रांस की विदेश रिएक्टर कम्पनियां भारत आने से परहेज करती हैं।
यद्यपि परमाणु ऊर्जा को सबसे सुरक्षित ऊर्जा स्रोतों में से एक माना जाता है, लेकिन इससे संबंधित हादसे-चाहे चेर्नोबिल हो या फुकुशिमा पारंपरिक औद्योगिक दुर्घटनाओं की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकते हैं। भारत में भोपाल की यूनियन कार्बाइड आपदा का लंबा प्रभाव जनस्मृति में गहराई से अंकित है। इसलिए जनमानस का प्रबंधन और व्यावहारिक क्षतिपूर्ति तंत्र लागू करना उतना ही महत्त्वपूर्ण होगा जितना कि तकनीक और वित्त तक पहुंच बनाना। जब परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम 2010 लाया गया था तब विपक्ष में रहते हुए भाजपा और वामपंथी दलों ने जमकर विरोध किया था। इस समय भी विपक्ष कांग्रेस और अन्य दल उत्तरदायित्व कानून के प्रावधानों को कमजोर करने का विरोध कर रहा है। यद्यपि सरकार का कहना है कि जनता की सुरक्षा के लिए कोई भी समझौता नहीं किया जाएगा।
अब देखना होगा कि भारत इस मुद्दे को कैसे सम्बोधित करता है। 2033 तक भारत में कम से कम 5 स्माल मॉडयूलर रिएक्टर शुरू करने का लक्ष्य तय किया गया है। रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की हल ही की यात्रा के दौरान परमाणु ऊर्जा में रूस का व्यापक सहयोग की रणनीति तय की गई है। कुडनकुुलम में रूस पहले ही परमाणु रिएक्टरों का निर्माण कर रहा है, क्योंकि इस क्षेत्र में रूस की विशेषज्ञता है। भारत की परमाणु महत्वकांक्षाएं स्वाभाविक रूप से व्यापक हैं लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए राष्ट्र की सुरक्षा पर ध्यान केन्द्रित करना भी जरूरी है और साथ ही प्राइवेट सैक्टर के लिए सक्षम और सहज वातावरण बनाना भी जरूरी है। देखना होगा कि विदेशी कम्पनियां खासतौर पर अमेरिकी और फ्रांसीसी भारत की ओर कितनी आकर्षित होती हैं।


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