भाजपा : वाजपेयी से लेकर नितिन नबीन तक

Summary :

आगामी 25 दिसम्बर को स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की 101वीं जन्म जयन्ती है। अतः इस अवसर पर उनका स्मरण होना स्वाभाविक है। यह बात लगभग भुला दी गई है कि 1967 में जब पं. दीन दयाल उपाध्याय की मुगल सराय (अब दीन दयाल नगर) रेलवे स्टेशन पर हत्या हो जाने के बाद स्व. वाजपेयी को जनसंघ (अब भाजपा) का अध्यक्ष बनाया गया था तो उनकी उम्र भी 45 वर्ष के आसपास थी। वह जनसंघ के तब तक के इतिहास में सबसे युवा अध्यक्ष थे। भाजपा के नव नियुक्त राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष श्री नितिन नबीन की 45 वर्ष की उम्र को…

आगामी 25 दिसम्बर को स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की 101वीं जन्म जयन्ती है। अतः इस अवसर पर उनका स्मरण होना स्वाभाविक है। यह बात लगभग भुला दी गई है कि 1967 में जब पं. दीन दयाल उपाध्याय की मुगल सराय (अब दीन दयाल नगर) रेलवे स्टेशन पर हत्या हो जाने के बाद स्व. वाजपेयी को जनसंघ (अब भाजपा) का अध्यक्ष बनाया गया था तो उनकी उम्र भी 45 वर्ष के आसपास थी। वह जनसंघ के तब तक के इतिहास में सबसे युवा अध्यक्ष थे। भाजपा के नव नियुक्त राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष श्री नितिन नबीन की 45 वर्ष की उम्र को लेकर इस पार्टी के कार्यकर्ताओं में खासा उत्साह है और वे इसे पार्टी में एक नये युग का उदय समझते हैं। वास्तव में स्वतन्त्र भारत के इतिहास में भाजपा या जनसंघ एकमात्र ऐसी पार्टी रही है जो राजनीति में आश्चर्य या अचम्भा पैदा करती रही है।

इस पार्टी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कांग्रेस पार्टी की खामियों को अपनी राजनीति के केन्द्र में रखकर प्रतीकों के माध्यम से जनता का मन मोहती रही है। इस पार्टी की लोकप्रियता का सबसे बड़ा राज यही है। जब केवल 45 वर्ष की आयु में स्व. वाजपेयी जनसंघ अध्यक्ष बने थे तो भी देश की राजनीति में एक भूचाल सा आया था, क्योंकि तब सत्ताधारी कांग्रेस का संगठन नेतृत्व लगभग बूढ़ा हो चला था, मगर तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी अपेक्षाकृत युवा थीं जो 1966 में इस पद पर आसीन हुई थीं। वर्तमान भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन व स्व. वाजपेयी में वैसे कोई समानता नहीं है, क्योंकि श्री वाजपेयी तब तक राष्ट्रीय राजनीति में अपना विशिष्ट स्थान बनाने लगे थे और लोकसभा में उनके भाषणों के रिकार्डों को जनसंघ के कार्यकर्ता अपनी जनसभाओं में सुनवाया करते थे।

श्री वाजपेयी की जब भी किसी शहर में कोई जनसभा होती थी उससे पहले उसकी मुनादी पूरे नगर में कराई जाती थी और उसमें कहा जाता था कि ‘संसद में सिंह गर्जना वाले’ श्री वाजपेयी को सुनने के लिए अमुक स्थान या मैदान में पहुंचे। मुझे आज भी अच्छी तरह याद है कि उत्तर प्रदेश में मेरे कस्बे नजीबाबाद में 1969 में स्व. वाजपेयी की जनसभा मूर्तिदेवी सरस्वती इंटर कालेज के प्रांगण में हुई थी। इस वर्ष उत्तर प्रदेश विधानसभा के मध्यावधि चुनाव हो रहे थे। इससे पूर्व 1967 में राज्य विधानसभा चुनाव हुए थे जिनमें जनसंघ को भारी सफलता मिली थी और 418 सदस्यीय विधानसभा में इसके 101 सदस्य चुन कर आये थे। कांग्रेस के बाद राज्य में यह सबसे बड़ी दूसरी पार्टी थी। इन चुनावों में 1967 में कांग्रेस छोड़कर बाहर आये स्व. चौधरी चरण सिंह ने अपनी अलग पार्टी भारतीय क्रान्ति दल बना ली थी।

उनकी नई पार्टी राज्य के गांवों में खासी लोकप्रिय थी। इससे जनसंघ के राजनीतिक समीकरण पर विपरीत प्रभाव पड़ने का भारी अन्देशा था। स्व. वाजपेयी ने इस खतरे को भांप लिया था। उस समय चौधरी साहब की उम्र 67 वर्ष थी। श्री वाजपेयी राजनीति में हास्य-व्यंग्य का पुट भरने में माहिर थे। उनकी लोकप्रियता का यह भी एक राज था। वह ओजस्वी वक्ता तो थे ही। 1967 के बाद उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में ही सभी विपक्षी दलों की मिली-जुली संविद सरकार गठित हुई थी। इस सरकार में जनसंघ के स्वर्गीय नेता श्री राम प्रकाश गुप्त (जो बाद में मुख्यमन्त्री भी हुए) उपमुख्यमन्त्री तथा शिक्षामन्त्री थे। इसके बावजूद 1969 के मध्यावधि चुनाव सभी विपक्षी दल अलग-अलग लड़ रहे थे। श्री वाजपेयी ने अपनी जनसभा में स्व. चौधरी साहब पर व्यंग्य कसा और उनकी पार्टी को लेकर हास्य का पुट बिखेरा कि ‘बूढे़ हो गये हैं अब करेंगे क्रान्ति’।

45 वर्ष के वाजपेयी कि इस फब्ती को लोगों ने बहुत सहजता से लिया। श्री वाजपेयी ने तब अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी सावधान किया कि पार्टी आगे की सीटें जीती जाती है और पीछे की हारती जाती है। ऐसा उन्होंने नजीबाबाद के सन्दर्भ में ही खासतौर पर कहा था, क्योंकि 1962 में इस विधानसभा सीट से जनसंघ के स्व. चौधरी श्रीराम जीते थे, मगर 1967 में यह सीट पार्टी हार गई थी। उस समय श्री वाजपेयी के युवा होने का भान जनसंघ के सभी महत्वपूर्ण स्थानीय नेता भी लोगों को कराया करते थे। 1969 में नजीबाबाद जनसंघ के अध्यक्ष स्व. पन्ना लाल अरोड़ा थे। उन्होंने जनसभा में जब वाजपेयी का परिचय दिया तो कहा कि ‘मैं अपने सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष को आपके सामने पेश करता हूं’ मगर हमें ध्यान रखना चाहिए कि तत्कालीन जनसंघ के आलाकमान ने युवा वाजपेयी को अपना राष्ट्रीय अध्य़क्ष बनाकर देश की राजनीति की बदलती गति को अपने पक्ष में करने की रणनीति तैयार की थी।

हालांकि श्री दीन दयाल उपाध्याय से पहले जनसंघ के अध्यक्ष स्व. प्रोफेसर बलराज मधोक थे। उन्हीं के नेतृत्व में 1967 के आम चुनाव लड़े गये थे जिसमें जनसंघ ने अपनी विजय यात्रा शुरू की थी और उत्तर भारत में यह दूसरे नम्बर की पार्टी बनकर उभरी थी, जबकि दिल्ली में इसने अपना राज नगर निगम से लेकर महानगर परिषद तक में स्थापित कर लिया था, मगर स्व. मधोक बहुत गर्म मिजाज और उग्र राष्ट्रवाद के समर्थक थे, जबकि केन्द्र की सत्ता में श्रीमती इन्दिरा गांधी के काबिज होने के बाद राष्ट्रीय नीतियां उदार समाजवाद की तरफ मुड़ रही थीं। भाजपा आलाकमान ने इस बदलती तस्वीर को एक चुनौती की तरह लिया था और स्व. वाजपेयी के उदार व्यक्तित्व को एक प्रतीक के रूप में स्थापित किया था।

यही वजह रही कि जब 1969 में कांग्रेस पार्टी से श्रीमती इन्दिरा गांधी ने विद्रोह करके अपनी पार्टी का जब पहली बार विभाजन किया और बैंकों का राष्ट्रीयकरण व राजा-महाराजाओं का प्रिविपर्स बन्द करके समाजवाद की तरफ कदम बढ़ाया तो जनसंघ में स्व. वाजपेयी व स्व. मधोक के बीच चले शीतयुद्ध में पूरी पार्टी ने श्री वाजपेयी का साथ दिया। इसके बाद का श्री वाजपेयी का राजनीतिक इतिहास देश काल परिस्थिति के अनुरूप रहा है जिसमें उन्हें महारथ हासिल था। भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष श्री नितिन नबीन को स्व. वाजपेयी से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। सबसे बड़ी बात यह है कि आज भाजपा की नीतियां राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत हैं अतः देश काल परिस्थिति के अनुरूप श्री नबीन को पार्टी के हित में समयोचित फैसले लेने पड़ेंगे और सिद्ध करना होगा कि कि वह प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों व गृहमन्त्री श्री अमित शाह की राजनीतिक रणनीति के सच्चे पैरोकार हैं।

भाजपा ने 1999 के लगभग तब भी राजनीति में ऐसा ही आश्चर्य पैदा किया था जब पार्टी अध्यक्ष पद पर तमिलनाडु के स्व. कृष्णमूर्ति को बैठाया था। इससे पहले 1967 में जनसंघ का राष्ट्रीय अधिवेशन केरल के कालीकट में करके भी पार्टी ने राजनीतिक पर्यवेक्षकों को चाैंकाने का काम किया था। हालांकि श्री नबीन की नियुक्ति से पर्यवेक्षक स्वयं ही चौंके हैं मगर ऐसा करना भाजपा या जनसंघ के स्वभाव के विपरीत नहीं कहा जा सकता। नबीन को अध्यक्ष बनाकर भाजपा ने पार्टी के आम कार्यकर्ताओं के बीच नव ऊर्जा का संचार किया है और सन्देश दिया है कि उनकी पार्टी यदि एक चाय बेचने वाले को देश का प्रधानमन्त्री बना सकती है तो एक साधारण से कार्यकर्ता और बिहार राज्य के मन्त्री को पार्टी का अध्यक्ष भी बना सकती है। भाजपा पूरे देश को यह सन्देश देने में तभी सफल होगी जब श्री नबीन देश काल परिस्थितियों के अनुरूप अपनी पार्टी की दिशा तय कर पायेंगे।

Team Desk