भारत और यूएई के बीच अचानक बातचीत और अचानक हुए समझौते पाकिस्तान के लिए परेशानी का सबब इसलिए हैं क्योंकि अब वह मुस्लिम देशाें का समर्थन खोता जा रहा है। मेरा मानना है कि यूएई राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद ने भारत से मजबूत रिश्तों की जरूरत के लिए ढेरों समझौताें की जो पहल की है उससे यह संदेश दुनिया में गया है कि पाकिस्तान अब मुस्लिम देशों से अलग-थलग पड़ गया है। खुद पीएम मोदी ने प्रोटोकोल तोड़कर उनसे भेंट करते हुए पाकिस्तान को कूटनीति का संदेश दिया है। सऊदी अरब पहले से ही पाकिस्तान से किनारा कर चुका है और अब यूएई भी उससे दूर हो रहा है। सच तो यह है कि भारत और संयुक्त अरब अमीरात का बढ़ता संबंध दोनों देशों को ही नहीं बल्कि पाकिस्तान में भी कई क्षेत्रों को प्रभावित करेगा। दिसम्बर 2025 के आखिरी हफ्ते में राष्ट्रपति नाहयान पाकिस्तान गए थे। पाकिस्तान पर अब यूएई राष्ट्रपति के भारत आने से दबाव पड़ना तय है। इतना ही नहीं, इस्लामिक नाटो पर भी दबाव पड़ेगा। पहले से ही सऊदी अरब और तुर्किए के रिश्ते तल्ख हैं। केन्द्र बिंदु में पाकिस्तान है और ऐसे में मुस्लिम ब्रदरहुड का दाव भी चल नहीं पाएगा। फिर आटोमन साम्राज्य की यादें भी दोनों के बीच कटुता बढ़ाती हैं। ऐसे में, ‘इस्लामिक नाटो’ कितना सफल हो सकेगा, यह अभी ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता।
पीएम मोदी ने आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान को पहले ही बेनकाब कर रखा है और ऐसे में यूएई की दिल्ली यात्रा से निकल रहे इस संदेश से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत में यूएई की रक्षा हिस्सेदारी बढ़ गई है। भारत-यूएई ने सुदृढ़ द्विपक्षीय रक्षा व सुरक्षा सहयोग को व्यापक रणनीतिक साझेदारी तय कर दी है।
यूएई भी चाहता है कि अमेरिका पर उसकी निर्भरता घटे। सुखद बात है कि भारत-यूएई के बीच रणनीति रक्षा साझेदारी के लिए एक ढांचागत समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में आगे बढ़ने के आशय-पत्र पर हस्ताक्षर किए गए। इससे पता चलता है कि आपरेशन सिंदूर को लेकर पाकिस्तान मुश्किल में असलियत की जानकारी सबको है। दुनिया में संदेश गया है कि भारत और संयुक्त अरब अमीरात के रिश्तों में तेज़ी से सुधार देखने को मिला है। कभी केवल तेल और व्यापार तक सीमित रहने वाले ये संबंध अब राजनीति, सुरक्षा, निवेश और कूटनीति तक फैल चुके हैं। भारत–यूएई के बीच रक्षा, एआई डिजीटल सहयोग, खाद्य सुरक्षा, अंतरिक्ष, ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास तथा निवेश के क्षेत्र में 2032 तक सांझा कारोबार 200 अबर डालर तक पहंुचाने का लक्ष्य तय हुआ है। इन नए समझौतों ने न केवल दोनों देशों को फायदा पहुँचाया है, बल्कि इसका असर पड़ोसी देश पाकिस्तान पर भी साफ़ तौर पर दिखाई देने लगा है। पाकिस्तान अब मुस्लिम देशों के बीच अपनी साख गवंा चुका है जहां अमरीका, फांस, रूस, आस्ट्रेलिया, जर्मनी जैसे देश भारत को अत्याधुनिक डिफेंस हथियार व तकनीक प्रदान करने के लिए साथ खड़े हैं तो वही पाकिस्तान को कोई पूछ नहीं रहा। उसे लगता है कि अगर यूएई ने भारत को अपना बना लिया तो मुझे कौन पूछेगा। लिहाजा उसका तिलमिलाना स्वाभाविक है।
इतिहास बताता है कि भारत और यूएई के बीच रिश्ते पुराने हैं। यूएई में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं और वहां की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाते हैं। भारतीय मजदूर, इंजीनियर, डॉक्टर और कारोबारी यूएई के विकास में वर्षों से योगदान दे रहे हैं। पीएम मोदी की यूएई यात्रा के बाद दोनों देशों ने आपसी सहयोग को नई दिशा दी। इसके बाद कई उच्चस्तरीय यात्राएँ हुईं और भरोसा बढ़ा। अब यूएई भारत को केवल एक व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि एक रणनीतिक मित्र के रूप में देखने लगा है।
नए समझौते के बाद कई सामानों पर टैक्स कम कर दिया गया, जिससे भारतीय कंपनियों को यूएई में अपना सामान बेचना आसान हो गया। भारत से दवाइयाँ, कपड़े, अनाज, गहने और तकनीकी सेवाएँ यूएई भेजी जाती हैं। इसके साथ ही यूएई भारत में सड़कों, बंदरगाहों, स्टार्टअप और डिजिटल प्रोजेक्ट्स में निवेश कर रहा है। इससे भारत की अर्थव्यवस्था को मज़बूती मिली है और रोज़गार के नए अवसर पैदा हुए हैं। भारत और यूएई दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख रखते हैं। इस मुद्दे पर यूएई ने कई बार भारत का समर्थन किया है। यूएई अब यह मानने लगा है कि आतंकवाद किसी एक देश की समस्या नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए खतरा है। यही कारण है कि वह इस मुद्दे पर भारत के साथ खड़ा दिखाई देता है। यह बात पाकिस्तान के लिए चिंता का कारण बनी है। बड़ी बात यह है कि कल तक जो खाड़ी देश कभी पाकिस्तान के क़रीबी माने जाते थे, अब वे भारत के साथ भी उतनी ही गर्मजोशी से संबंध बना रहे हैं। पाकिस्तान लंबे समय तक यह सोचता रहा कि धर्म के आधार पर खाड़ी देश उसका समर्थन करते रहेंगे। लेकिन समय के साथ यूएई जैसे देशों ने यह दिखा दिया कि उनके लिए आर्थिक लाभ और स्थिरता ज़्यादा अहम है। बहुत साल पहले कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को खाड़ी देशों से खुला समर्थन मिलता था। लेकिन अब यूएई और अन्य देश इस मामले में तटस्थ रुख अपनाते दिख रहे हैं। यूएई ने कई बार कहा है कि यह भारत का आंतरिक मामला है। यह बदलाव पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका माना जाता है, क्योंकि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाता रहा है। पाकिस्तान को मिलने वाला विदेशी धन कम हुआ है, जो उसकी कमजोर अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह है। भारत ने वक्त के साथ-साथ अपनी कूटनीति को मजबूत किया वहीं पाकिस्तान मजहबी नफरत और आतंकवादी नजरिए से उभर नहीं पाया तथा विदेश नीति को लेकर वह पिछड़ गया।
उसे अपनी अर्थव्यवस्था सुधारनी होगी और पड़ोसी देशों के साथ संतुलित रिश्ते बनाने होंगे। अपनी तरक्की के दम पर आज की तारीख में भारत ने अपना महत्व साबित कर दिया है, जबकि पाकिस्तान अपनी ही आतंक प्रमोशन नीतियों व मजहबी हिंसा तथा अपनी जनता के बीच आपसी समस्याओं के चक्रव्यूह में फंस चुका है इसलिए भारत की उन्नति से उपेक्षा, ईष्या है तथा यूएई से भारत के रिश्तों की मजबूती को देखकर यह हैरान परेशान हैं।
भारत-यूएई डील से परेशान पाकिस्तान
Summary :
भारत और यूएई के बीच अचानक बातचीत और अचानक हुए समझौते पाकिस्तान के लिए परेशानी का सबब इसलिए हैं क्योंकि अब वह मुस्लिम देशाें का समर्थन खोता जा रहा है। मेरा मानना है कि यूएई राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद ने भारत से मजबूत रिश्तों की जरूरत के लिए ढेरों समझौताें की जो पहल की है उससे यह संदेश दुनिया में गया है कि पाकिस्तान अब मुस्लिम देशों से अलग-थलग पड़ गया है। खुद पीएम मोदी ने प्रोटोकोल तोड़कर उनसे भेंट करते हुए पाकिस्तान को कूटनीति का संदेश दिया है। सऊदी अरब पहले से ही पाकिस्तान से किनारा कर चुका…


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