अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के गाजा शांति बोर्ड योजना को लेकर दुनिया पूरी तरह से बंट चुकी है। गाजा में शांति स्थापना के लिए भारत को आमंत्रित करना अहम हो सकता है लेकिन भारत ने ट्रंप के अनावरण समारोह में अनुपस्थित रहकर दूरी बना ली है। संयुक्त राष्ट्र में तीन वीटो पावर वाले देशों फ्रांस, चीन और ब्रिटेन ने भी गाजा शांति बोर्ड से खुद को दूर कर लिया है। भारत और रूस ने अभी इसमें शामिल होने को लेकर कोई फैसला नहीं लिया है। रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन का कहना है कि अगर यूक्रेन जंग को लेकर उन्हें कोई रियायत दी जाती है तो वे बोर्ड में शामिल होने को लेकर विचार करेंगे। फ्रांस ने नीतिगत मामलों की वजह बताते हुए इसमें शामिल होने से इंकार कर दिया है जबकि चीन का कहना है कि वह संयुक्त राष्ट्र संघ की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है। चीन हमेशा से संयुक्त राष्ट्र संघ को केन्द्र में रखकर बनाई गई अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्पित है। जहां तक भारत का सवाल है वह इस बात का आकलन कर रहा है कि उसके लिए क्या सही रहेगा और क्या गलत?
ट्रंप के गाजा शांति बोर्ड को लेकर बहुत सारे सवाल उठ रहे हैं। पहला सवाल तो यह है कि क्या ट्रंप संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर करके खुद अपना संयुक्त राष्ट्र बनाना चाहते हैं? ट्रंप इसके जरिए क्या हासिल करना चाहते हैं। जिस तरह से ट्रंप निरंकुश साम्राज्यवादी ताकत बनने की ओर अग्रसर हैं तो क्या उन्हें समर्थन देना चाहिए? इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत की छवि एक संतुलित जिम्मेदार और बातचीत में विश्वास रखने वाले देश की रही है। भारत संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में लंबे समय से योगदान देता आया है। भारत का अनुभव उसकी गैर पक्षपाती विदेश नीति उसे वैश्विक शांति प्रयासों में एक विश्वसनीय भागीदार बनाती है लेकिन भारत के लिए गाज शांति बोर्ड प्रस्ताव बेहद संवेदनशील मुद्दा है। भारत ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीन के आत्मनिर्णय, दो-राज्य समाधान और संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों का समर्थक रहा है। वहीं हाल के वर्षों में इजराइल के साथ उसके रणनीतिक रिश्ते भी मजबूत हुए हैं। ऐसे में भारत ने अब तक खुली प्रतिक्रिया देने से परहेज किया है। भारत हमेशा कहता आया है कि फिलिस्तीन इजराइल विवाद का समाधान संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों और बातचीत से होना चाहिए। ट्रंप का बोर्ड यूएन ढांचे से बाहर है, इसलिए भारत खुलकर समर्थन देने से बच रहा है। भारत गाजा में मानवीय सहायता भेजता रहा है, लेकिन राजनीतिक ढांचे पर चुप्पी बनाए रखना उसे कूटनीतिक लचीलापन देता है। भारत की रणनीति फिलहाल देखो और इंतजार करो की लगती है। भारत के शांति बोर्ड से परहेज करने के कई कारण हैं। मुख्य कारण भारत किसी एक देश या व्यक्ति के पीछे खड़ा दिखना नहीं चाहता।
भारत बिना किसी राजनीतिक बंधन के गाजा में मानवीय सहायता प्रदान कर सकता है। जैसा कि पहले भी वह करता आया है। वह संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के माध्यम से पुनर्निर्माण में सहयोग कर सकता है। अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत वह राजनयिक चैनलों का इस्तेमाल कर सकता है लेकिन उसे ऐसी प्रक्रिया में शामिल नहीं होना चाहिए जो प्रबंधन को न्याय से भ्रमित करती हो। ट्रंप ने गाजा शांति बोर्ड का सदस्य बनने के लिए एक अरब डॉलर की सहायता भी मांगी है। सवाल धन का भी नहीं है। यह भारत की संवैधानिक, नैतिकता, रणनीतिक स्वायत्तता और नैतिक विश्वसनीयता का प्रश्न है। एक बड़ा कारण तो यह है कि शांति बोर्ड में भारत के परम्परागत दुश्मन पाकिस्तान आैर तुर्की भी इसमें शामिल हैं। दोनों देश भारत के खिलाफ अक्सर साजिशें रचते रहते हैं आैर पाकिस्तान आतंकवाद को लगातार प्रायोजित कर रहा है। ऐसे में बोर्ड में भारत शामिल होकर अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय में पाकिस्तान को बेनकाब करने के प्रयासों को कमजोर नहीं करना चाहेगा।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान गाजा पाट्टी में भारत द्वारा की जा रही किसी भी कोशिश को विफल बना सकता है। शांति बोर्ड के अध्यक्ष पद पर ट्रंप का आजीवन बने रहना भी परेशानी का सबब है। भारत एक संप्रभु राष्ट्र है। ऐसे में अगर भारत को बोर्ड में शामिल होना है तो उसकी अपनी पहल होगी। शांति बोर्ड के चार्टर में गाजा युद्ध से परे भी एक चार्टर को शामिल किया गया है। जिससे यूरोपीय सरकारों की चिंताएं बढ़ गई हैं। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र का काम कमजोर हो सकता है और ट्रंप द्वारा बनाए गए यूनाइटेड नेशन्स कहीं भी हस्तक्षेप करने लगेगा। शांति बोर्ड में पाकिस्तान को शामिल करना बहुत ही हास्यस्पद लगता है।
पहला सवाल तो यह है कि कंगाल पाकिस्तान क्या एक अरब डालर देगा? इसे लेकर पाकिस्तान के भीतर भी बवाल मचा हुआ है। वहां यह सवाल उठने लगे हैं कि पाकिस्तान जो हमेशा इजराइल का विरोधी रहा है क्या वह इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ बैठकर गाजा में शांति की बात करेगा? पाकिस्तान का आवाम खुद यह कह रहा है कि पाकिस्तान पाप कर रहा है और यह गाजा के लोगों के साथ धोखा है। अहम बात यह भी है कि ट्रंप द्वारा भेजे गए इस निमंत्रण पर भारत को गंभीरता से विचार करना होगा क्योंकि ट्रंप जैसे अस्थिर स्वभाव वाले अमेरिकी राष्ट्रपति इसे अस्वीकार करने को अपमान भी मान सकते हैं। पहली बात तो यह है कि भारत को अमेरिका से 50 प्रतिशत तक टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है और उसने भारत-पाकिस्तान के बीच युद्धविराम कराने में ट्रंप की भूमिका को स्वीकार नहीं किया है। इसलिए, उसे आगे के परिणामों पर गंभीरता से विचार करना होगा, खासकर तब जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसे “वैश्विक संघर्ष को सुलझाने का एक साहसिक नया तरीका” बताया है। अब जबकि ग्रीनलैंड के मसले पर यूरोपीय आैर नाटो देश ट्रंप के खिलाफ खड़े हो चुके हैं और खुद ट्रंप भी इधर-उधर की बातें करने लगे हैं। ऐसे में भारत को बहुत सोच-समझकर फैसला लेना होगा क्योंकि हमास को हथियार विहीन करना आैर इजराइली सेनाअों की वापसी जैसे मुद्दे काफी जटिल हैं। ट्रंप को अपनी दादागिरी करने के लिए खुला नहीं छोड़ा जा सकता।
गाजा शांति बोर्ड और भारत
Summary :
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के गाजा शांति बोर्ड योजना को लेकर दुनिया पूरी तरह से बंट चुकी है। गाजा में शांति स्थापना के लिए भारत को आमंत्रित करना अहम हो सकता है लेकिन भारत ने ट्रंप के अनावरण समारोह में अनुपस्थित रहकर दूरी बना ली है। संयुक्त राष्ट्र में तीन वीटो पावर वाले देशों फ्रांस, चीन और ब्रिटेन ने भी गाजा शांति बोर्ड से खुद को दूर कर लिया है। भारत और रूस ने अभी इसमें शामिल होने को लेकर कोई फैसला नहीं लिया है। रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन का कहना है कि अगर यूक्रेन जंग को लेकर उन्हें कोई…


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