करतारपुर कॉरिडोर पर राजनीति से बाज आए पाकिस्तान

Summary :

सिख समुदाय के लिए गुरुद्वारा करतारपुर साहिब केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और भावनाओं का भी केन्द्र है। यही वह पवित्र धरती है जहां सिखों के पहले गुरु गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन का अंतिम समय खेती करते हुए व्यतीत किया और मानवता, सेवा तथा भाईचारे का संदेश दिया। करोड़ों सिखों की वर्षों पुरानी अरदास के बाद जब करतारपुर कॉरिडोर खुला, तो इसे सीमाओं से ऊपर उठकर श्रद्धा और शांति का प्रतीक माना गया। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण सत्य यह है कि पाकिस्तान ने इस पवित्र मार्ग को भी राजनीतिक स्वार्थ, प्रचार और आर्थिक वसूली का माध्यम…

सिख समुदाय के लिए गुरुद्वारा करतारपुर साहिब केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और भावनाओं का भी केन्द्र है। यही वह पवित्र धरती है जहां सिखों के पहले गुरु गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन का अंतिम समय खेती करते हुए व्यतीत किया और मानवता, सेवा तथा भाईचारे का संदेश दिया। करोड़ों सिखों की वर्षों पुरानी अरदास के बाद जब करतारपुर कॉरिडोर खुला, तो इसे सीमाओं से ऊपर उठकर श्रद्धा और शांति का प्रतीक माना गया। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण सत्य यह है कि पाकिस्तान ने इस पवित्र मार्ग को भी राजनीतिक स्वार्थ, प्रचार और आर्थिक वसूली का माध्यम बना दिया। पाकिस्तान सरकार और वहां के वक्फ बोर्ड द्वारा करतारपुर साहिब के दर्शन के लिए भारतीय श्रद्धालुओं से 20 डॉलर तथा एनआरआई श्रद्धालुओं से 5 डॉलर शुल्क वसूलना लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। दुनिया भर के किसी भी प्रमुख गुरुघर में माथा टेकने के लिए इस प्रकार की अनिवार्य फीस नहीं ली जाती। गुरुद्वारों की परंपरा “संगत और पंगत” की रही है, जहां हर व्यक्ति को समान अधिकार प्राप्त है। लेकिन पाकिस्तान की यह नीति उस मानसिकता को उजागर करती है जो आज भी धार्मिक स्थलों को श्रद्धा नहीं बल्कि कमाई और नियंत्रण का साधन मानती है।
सिख संगठनों और श्रद्धालुओं ने लगातार इस शुल्क का विरोध किया है। उनका कहना है कि यह “सेवा” और “मुफ्त दर्शन” की सिख परंपरा के खिलाफ है। यह स्थिति लोगों को उस मुगलकालीन जजिया कर की याद दिलाती है, जिसमें गैर-मुस्लिमों से केवल उनकी आस्था के आधार पर कर वसूला जाता था। आज 21वीं सदी में भी यदि किसी पवित्र स्थल के दर्शन के लिए केवल इसलिए टैक्स देना पड़े क्योंकि श्रद्धालु दूसरे देश से आया है, तो यह मानसिक गुलामी और धार्मिक असहिष्णुता का संकेत माना जाएगा। इतना ही नहीं ऐसी भी जानकारी है कि पाकिस्तान से आने वाले श्रद्धालुओं से भी अलग अलग कैटेगरी के हिसाब से दर्शन फीस वसूली जाती है। सबसे चिंता की बात यह है कि पाकिस्तान समय-समय पर सिखों की भावनाओं का उपयोग अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए करता दिखाई देता है। हाल ही में “ऑपरेशन सिंदूर” के बाद यह खबरें सामने आईं कि करतारपुर साहिब के दर्शन अस्थायी रूप से बंद कर दिए गए थे और अब दोबारा खुलने की संभावना बन रही है। लेकिन इसके साथ ही पाकिस्तान शुल्क वसूली की अपनी जिद पर अड़ा हुआ है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान के लिए सिखों की आस्था से अधिक महत्वपूर्ण उसकी राजनीतिक छवि और आर्थिक हित हैं। इतना ही नहीं, कॉरिडोर परिसर में “ऑपरेशन सिंदूर” को पाकिस्तान की कथित जीत के रूप में दर्शाने वाले पोस्टर लगाए जाने की जानकारी भी सामने आई है। धार्मिक स्थल और युद्ध या राजनीतिक प्रचार का कोई मेल नहीं हो सकता। गुरुघर शांति, सेवा और आध्यात्मिकता के केन्द्र होते हैं, न कि राजनीतिक प्रदर्शन और प्रचार का मंच। ऐसे पोस्टर न केवल भारत से आने वाली संगत की भावनाओं को आहत करते हैं, बल्कि करतारपुर कॉरिडोर की मूल भावना को भी कमजोर करते हैं। पाकिस्तान को यह समझना होगा कि सिख समुदाय अपनी आस्था के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करेगा। करतारपुर साहिब किसी सरकार की जागीर नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझा विरासत है। यदि पाकिस्तान वास्तव में सिखों के प्रति सम्मान दिखाना चाहता है, तो उसे सबसे पहले दर्शन शुल्क समाप्त करना चाहिए, धार्मिक स्थलों को राजनीतिक प्रचार से मुक्त रखना चाहिए और श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। भारत ने हमेशा करतारपुर कॉरिडोर को शांति और सद्भाव का पुल माना है, लेकिन पाकिस्तान बार-बार इसे अपने राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल करता दिखाई देता है। अब समय आ गया है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया जाए ताकि धार्मिक आस्था को राजनीतिक हथियार बनने से रोका जा सके। आज पूरी संगत की यही अरदास है कि जल्द से जल्द करतारपुर साहिब के दर्शन बिना किसी राजनीतिक अड़चन, बिना किसी भेदभावपूर्ण टैक्स और बिना किसी प्रचारबाजी के पुनः सुचारु रूप से शुरू हों। क्योंकि गुरुघर किसी एक देश की सीमा में जरूर हो सकते हैं, लेकिन उन पर आस्था रखने वालों के दिलों की कोई सीमा नहीं होती।
सिख गुरुओं के द्वारा पर्यावरण के प्रति प्रेरणा
गुरु नानक देव जी द्वारा उच्चारित पंक्ति “पवन गुरु, पानी पिता, माता धरत महत” केवल धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए जीवन का मूल सिद्धांत है। सिख धर्म ने सदियों पहले ही प्रकृति को ईश्वर का रूप मानते हुए यह संदेश दे दिया था कि हवा गुरु के समान है, पानी पिता के समान पालनकर्ता है और धरती हमारी महान माता है। लेकिन दुखद सत्य यह है कि आज आधुनिकता और सुविधाओं की दौड़ में मनुष्य, विशेषकर हम स्वयं सिख समाज भी, इस महान सिद्धांत से दूर होते दिखाई दे रहे हैं।
आज बहुत कम लोग ऐसे दिखाई देते हैं जो वास्तव में इस शिक्षा को अपने जीवन में उतार रहे हों। गुरुद्वारों में कीर्तन और प्रवचन तो होते हैं, लेकिन पर्यावरण संरक्षण को लेकर वैसी गंभीरता कम ही दिखाई देती है जैसी गुरु साहिबान की शिक्षाओं में अपेक्षित थी। यही कारण है कि जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में दिल्ली के प्रसिद्ध व्यवसायी एम एम पाल सिंह गोल्डी के विचार सुनने को मिले, तो मन को एक सकारात्मक आशा मिली। उन्होंने जिस प्रकार पर्यावरण संरक्षण को सिख धर्म की मूल शिक्षा से जोड़ते हुए समाज को जागरूक करने का प्रयास किया, वह वास्तव में सराहनीय है। आज दुनिया जिस पर्यावरण संकट से गुजर रही है, उसके पीछे सबसे बड़ा कारण मनुष्य का प्रकृति के प्रति स्वार्थी रवैया है। नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, जंगल कट रहे हैं और प्लास्टिक ने धरती को बीमार कर दिया है। ऐसे समय में सिख समाज की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है, क्योंकि सिख धर्म स्वयं प्रकृति की रक्षा का संदेश देता है। हर सिख और हर गुरुद्वारा साहिब को पर्यावरण बचाने हेतु विशेष मुहिम चलानी चाहिए।
सिख राजनीति में डिजिटल कट्टरता का खतरा
सोशल मीडिया में वैसे तो देखने में आता है कि लोगों की जिन्दगी को काफी सरल बना दिया है। मगर सकरात्मक के साथ साथ इसके नकरात्मक प्रभाव भी दिखाई पड़ते हैं। आज हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल है और हर मुद्दा कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। यह लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए एक सकारात्मक माध्यम माना गया था, लेकिन धीरे-धीरे यही सोशल मीडिया अब नफरत, अपमान और ट्रोल संस्कृति का बड़ा मंच बनता जा रहा है।
विशेष रूप से सिख राजनीति में इसका प्रभाव चिंताजनक रूप से बढ़ता दिखाई दे रहा है। अब राजनीतिक बहस का स्थान व्यक्तिगत आरोप, गालियां, फर्जी प्रचार और ट्रोलिंग ने ले लिया है। किसी के बयान को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करना, पुरानी वीडियो या तस्वीरों को गलत संदर्भ में फैलाना, व्यक्तिगत जीवन पर टिप्पणी करना और धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाले पोस्ट वायरल करना अब आम बात बनती जा रही है। इससे न केवल राजनीति का स्तर गिर रहा है, बल्कि पूरे सिख समाज की छवि भी प्रभावित हो रही है।

Shera Rajput