देश के सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को संवैधानिक करार देकर स्पष्ट कर दिया है कि यह प्रक्रिया भारत के चुनावी कानून जन प्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 के प्रावधानों के विरुद्ध नहीं है तथा स्वतन्त्र व निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराये जाने के अनुरूप है। इससे यह भी साफ हो गया है कि चुनाव आयोग को समय-समय पर गहन पुनरीक्षण कराने का अधिकार है और यह प्रक्रिया पूरी तरह संविधान सम्मत है। विगत वर्ष अक्तूबर मास में जब बिहार राज्य में विधानसभा चुनाव कराये गये थे तो उनसे पहले चुनाव आयोग ने राज्य की मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण कराया था जिसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में इसके विरुद्ध विभिन्न विपक्षी दलों व संस्थाओं व व्यक्तियों ने 20 के लगभग याचिकाएं दायर करते हुए कहा था कि चुनाव आयोग को व्यापाक आधार पर एेसा करने का अधिकार ही नहीं है अतः यह प्रक्रिया असंवैधानिक घोषित की जानी चाहिए। पुनरीक्षण करते समय चुनाव आयोग ने सभी वयस्क भारतीय नागरिकों के लिए उनके मतदाता होने के सम्बन्ध में कुल 11 प्रपत्रों की सूची जारी की थी जिनमें से किसी एक को दिखा कर वे अपने वैध होने का प्रमाण दे सकें मगर इन प्रपत्रों में आधार कार्ड शामिल नहीं था। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश जारी कर आधार कार्ड को भी साक्ष्य मानने का हुक्म जारी कर दिया था।
याचिकाओं में कहा गया था कि चुनाव आयोग मतदाताओं की नागरिकता की जांच कर रहा है जिसका उसे अधिकार नहीं है क्योंकि यह क्षेत्र केन्द्रीय गृहमन्त्रालय का है और केवल वही किसी भी भारत में रहने वाले व्यक्ति की नागरिकता की जांच कर सकता है। इस सन्दर्भ में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकान्त व जायमाल्या बागची की पीठ ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग यदि अपने पैमानों पर खरे न उतरने वाले नागरिक का नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं करता है अथवा उसका नाम मतदाता सूची से काट देता है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है। इस मामले में पृथक प्रक्रिया है। चुनाव आयोग केवल अपनी मतदाता सूची में शामिल किये जाने या उससे बाहर किये जाने की कार्रवाई निर्धारित मानदंडों पर कर सकता है और उसका इसे पूरा अधिकार है। न्यायालय ने कहा कि लोकतन्त्र केवल चुनावों में मतदान का ही नाम नहीं है बल्कि यह इन चुनावों में भाग लेने वाले लोगों की वैध निशानदेही पर भी निर्भर करता है। चुनाव पूरी तरह साफ- सुथरे हों यह भी लोकतन्त्र में जरूरी होता है। अतः चुनाव आयोग यदि अपनी संवैधानिक सीमाओं व नियमों के तहत एेसा काम करता है जो उसके निर्दिष्ट अधिकारों के भीतर हो तो उसे गैर कानूनी या असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता। स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनावों का मतलब केवल मतदान की प्रक्रियागत पवित्रता ही नहीं होती बल्कि यह मतदाता सूचियों की शुद्धि पर भी निर्भर करती है जो कि लोकतन्त्र का आधार होती है।
न्यायमूर्तियों ने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत इस प्रकार लक्ष्य की प्राप्ति होती है कि तार्किक आधार पर सूचियों का शुद्धिकरण हो और इस प्रक्रिया में एेसा सुरक्षातन्त्र मौजूद हो जिससे किसी भी शिकायतकर्ता को पूरा न्याय मिल सके। चुनाव आयोग इस प्रक्रिया को करते समय एेसे सुरक्षातन्त्र को भी तरजीह दे रहा है। पुनरीक्षण की प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूचियों को वैधानिक तरीके से सम्पूर्ण रूप से अशुद्धि रहित व विश्वसनीय बनाना है। अतः चुनाव आयोग को अधिकार है कि वह नागरिकों के लिए एेसे साक्ष्यों की सूची जारी करे जिससे पुनरीक्षण के लक्ष्य की प्राप्ति हो सके। यदि किसी व्यक्ति का एेसा मामला आता है जिसे सूची में दाखिल करने के चुनाव आयोग अयोग्य मानता है तो उसका मामला वह सक्षम केन्द्रीय विभाग के पास जांच हेतु प्रेषित कर सकता है। मगर चुनाव आयोग किसी भी व्यक्ति की नागरिकता की जांच नहीं कर सकता वह केवल उस व्यक्ति को सूची में शामिल करने या उसे बाहर निकालने के बारे में ही फैसला कर सकता है। न्यायमूर्तियों ने आज अपना केवल वह निर्णय पढ़ा है जो उन्होंने इस वर्ष के शुरू में ही जनवरी महीने में पुनरीक्षण के विरुद्ध दायर याचिकाओं की सुनवाई करने के बाद लिखकर सुरक्षित रख लिया था। इस फैसले के बाद अब तस्वीर पूरी तरह साफ हो गई है कि चुनाव आयोग को विशेष गहन पुनरीक्षण करते समय किसी भी व्यक्ति की नागरिकता की जांच करने का अधिकार नहीं है बेशक वह शक जरूर कर सकता है । इसके साथ यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए कि हम जिस लोकतन्त्र में जी रहे हैं उसमें मतदाता सूचियों का समय- समय पर शुद्धिकरण कितना जरूरी है लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि भारत में हर वयस्क नागरिक को वोट देने का अधिकार है अतः चुनाव आयोग को उसके इस अधिकार की हर हालत में रक्षा करनी चाहिए और एक भी एेसा मतदाता नहीं छूटना चाहिए जो जायज तौर पर वोट देने का अधिकार रखता हो क्योंकि एेसा होने पर भारत से भागीदारी का लोकतन्त्र होने का भाव हल्का पड़ जायेगा। अभी तक जिन राज्यों में विशेष गहन पुनरीक्षण हुआ है वहां पर लाखों लोगों के नाम मतदाता सूचियों से उड़ाये गये हैं। एेसे सभी नामों की भी जांच कराये जाने की मांग उठ सकती है। इसके साथ एक सवाल यह भी है कि अभी तक यह परंपरा रही है कि नया मतदाता बनने के लिए प्रत्येक वयस्क नागरिक को यह शपथ देनी पड़ती है कि वह भारत का नागरिक है और उसके बाद उसका नाम जुड़ जाता है मगर गहन पुनरीक्षण के क्रम में नई साक्ष्य प्रक्रिया को जोड़ दिया गया है, हालांकि आधार कार्ड के शामिल हो जाने के बाद इसमें नागरिकों को सुविधा हुई मगर प. बंगाल से एेसी शिकायतें भी मिली जिनमें चुनाव आयोग ने इस कार्ड के अलावा पासपोर्ट प्रमाण तक को नहीं माना। अतः सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद चुनाव आयोग को भी चौकन्ना होना पड़ेगा। वैसे पाठकों को याद होगा कि एस आई आर के मसले पर संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान भी लम्बी बहस हुई थी और विपक्ष अपनी इस जिद पर अड़ा रहा था कि संविधान में सामूहिक तौर पर इसे कराने की इजाजत नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद विपक्ष को भी दिशा मिलेगी और वह इस प्रक्रिया को कराने में अब नागरिकों की मदद भी करेगा। स्वस्थ लोकतन्त्र में एेसी ही अपेक्षा की जा सकती है।


















