प. बंगाल में विधानसभा के लिए दोनों चरणों का मतदान पूरा होने के बाद अब जनादेश को अपने में समाहित किये ईवीएम मशीनें गहन सुरक्षित केन्द्रों (स्ट्रांग रूम) में पहुंच गई हैं। अतः चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व बनता है कि इनमें किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ न हो। परन्तु राज्य सरकार की मुख्यमन्त्री सुश्री ममता बनर्जी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों से कह रही हैं कि वे इन केन्द्रों की रात-दिन सुरक्षा करें और सरकारी अमले पर विश्वास न करें। वह मतगणना के दिन भी अपने सदस्यों को पूरी तरह चौकन्ना रहने के निर्देश दे रही हैं।
एक प्रकार से यह चुनाव आयोग के कार्यकलापों पर ही ‘अविश्वास’ है जिसका संज्ञान मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार को लेना चाहिए और अपनी संस्था की दलगत निरपेक्षता व पवित्रता को सर्वोच्च रखना चाहिए। परन्तु दुखद यह है कि देश के विपक्षी दल चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर खुलेआम आरोप लगा रहे हैं और कह रहे हैं कि इसका केन्द्र की सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा की तरफ झुकाव है। प्रख्यात समाजवादी चिन्तक व जन नेता स्व. डाॅ. राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि लोकतन्त्र लोकलज्जा से चलता है। उनका आशय केवल इतना था कि प्रजातन्त्र में कभी भी ‘लोक चेतना’ पर ‘तन्त्र’ प्रभावी नहीं होना चाहिए।
उनके इस मत से जनसंघ के दार्शनिक नेता स्व. पं. दीनदयाल उपाध्याय भी पूर्णतः सहमत हुआ करते थे। अतः बहुत आवश्यक है कि जनादेश भरी हुई ईवीएम मशीनों की सुरक्षा के बारे में देश के किसी भी राजनीतिक दल को किसी प्रकार का सन्देह न हो। इस सम्बन्ध में यह जानना जरूरी है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने चुनाव काल के दौरान चुनाव आयोग को प्रशासन से लेकर अन्य सर्वाधिकार क्यों दिये थे? ये अधिकार इसीलिए दिये गये थे जिससे चुनाव पूरी तरह स्वतन्त्र व भयमुक्त माहौल में हो सकें क्योंकि चुनावों के समय देश या राज्य की सत्ता पर बैठी किसी भी राजनीतिक पार्टी की सरकार अपने राजनीतिक दल की प्रतिनिधि के तौर पर हो जाती है।
चुनावों में सत्तारूढ़ सरकारों का राजनीतिक चरित्र मुखर हो जाता है। अतः यह बेवजह नहीं है कि मुख्यमन्त्री ममता दीदी ईवीएम मशीनों की सुरक्षा के लिए अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से अपील कर रही हैं। पूरा देश जानता है कि इस राज्य में गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण के दौरान 90 लाख मतदाताओं के नाम उड़ाये गये और बाद में 27 लाख मतदाता जरूरी कागजात होने के बावजूद मतदान से सर्वोच्च न्यायालय के जांच किये जाने के आदेश के बाद भी वंचित रखे गये। अतः चुनाव आयोग अपनी ‘अविश्वसनीयता’ के लिए खुद ही जिम्मेदार है जिसका केन्द्र की भाजपा सरकार से कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि आयोग सीधे संविधान से शक्ति लेकर अपना कामकाज पूरी स्वतन्त्रता के साथ करता है ।
अतः श्री ज्ञानेश कुमार का यह कर्त्तव्य बनता है कि वह अपने मातहत सभी छोटे-बड़े चुनाव अधिकारियों को निर्देश दें कि वे मतों की गिनती करते समय कानूनों का सख्ती से पालन करें और लोकतन्त्र की पारदर्शिता व शुद्धता को हर कीमत पर कायम रखें। हालांकि हाल ही में पांच राज्यों के चुनाव हुए हैं मगर पूरे देश में सर्वाधिक चर्चा बंगाल के चुनावों को लेकर ही हो रही है जिसमें चुनाव आयोग की भूमिका संदिग्ध बनी हुई है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को देखकर ही देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस अब यह मांग कर रही है कि नागरिकों का मतदान का अधिकार ‘संवैधानिक’ अधिकार की जगह ‘मौलिक’ अधिकार बनाया जाना चाहिए जिससे भारत के किसी भी वैध नागरिक को मतदान से वंचित न किया जा सके।
यदि गौर से देखें तो यह मांग तार्किक है क्योंकि फिलहाल यह जिम्मेदारी नागरिक की है कि वह अपनी नागरिकता सिद्ध करे जबकि लोकतन्त्र में यह जिम्मेदारी सरकार की होनी चाहिए कि वह किसी भी देशवासी की अवैध नागरिकता सिद्ध करे। बेशक इस मामले में बहुत कानूनी दांव-पेंच हैं जिनका खुलासा कोई विधि विशेषज्ञ ही कर सकता है। ममता दीदी कह रही हैं कि स्ट्रांग रूमों की सुरक्षा इसलिए जरूरी है क्योंकि पूर्व में कई राज्यों में ईवीएम मशीनों की अदला-बदली किये जाने के आरोप लगे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि राज्य में भाजपा व तृणमूल कांग्रेस के बीच कांटे की लड़ाई है और दोनों पार्टियों ने एक-एक वोट के लिए अपनी जान लड़ाई है, जिसकी वजह से भी बंगाल में मतदान का प्रतिशत भी पिछले सभी रिकाॅर्ड तोड़ कर 93 प्रतिशत तक पहुंचा।
मगर विपक्षी दलों को चुनाव आयोग की इस बात के लिए प्रशांसा भी करनी होगी कि उसने इस बार मतदान का कुल प्रतिशत जानने के लिए अधिक समय नहीं लिया और कुल मतदान प्रतिशत की घोषणा कुछ घंटों बाद ही कर दी। इस मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने पिछली गलतियों से सबक लिया लगता है क्योंकि उनसे पहले जब राजीव कुमार अग्रवाल मुख्य चुनाव आयुक्त थे तो वे मतदान का अन्तिम प्रतिशत जानने के लिए तीन-तीन दिन का समय लिया करते थे। इसके साथ यह भी उल्लेखनीय है कि श्री ज्ञानेश कुमार के खिलाफ राज्यसभा में उन्हें पदमुक्त करने के लिए नया नोटिस भी विपक्ष के 73 सांसदों ने दिया हुआ है। इसलिए बंगाल के चुनाव श्री कुमार की गिरती साख से जुड़ गये हैं। लोकतन्त्र में केवल सरकारें ही इकबाल से नहीं चलती हैं बल्कि इसमें गठित सभी संवैधानिक स्वतन्त्र संस्थाएं भी इकबाल से ही चलती हैं। अतः चुनाव आयोग का इकबाल हर सूरत में बुलन्द रहना चाहिए।























