एक्जिट पोल पर कैसे विश्वास करें?

Summary :

मतदान बाद के चुनाव परिणाम सर्वेक्षणों या एक्जिट पोल पर मेरा कभी भी विश्वास नहीं रहा है क्योंकि भारत में जिस संसदीय प्रणाली के चुनाव होते हैं उनमें हार-जीत का फैसला कई प्रत्याशियों के बीच सर्वाधिक मत पाने वाले प्रत्याशी पर निर्भर करता है। बहु-प्रत्याशी परिपाठी में विभिन्न उम्मीदावारों के बीच इस बात का सर्वेक्षण में पता लग सकता है कि प्रत्येक सीट पर कौन सा प्रत्याशी बढ़त लिये हुए होता है मगर कुछ लोगों के समूहों से कुछ सवाल-जवाब करके यह पता नहीं लगाया जा सकता कि राज्य स्तर पर किस पार्टी के कितने प्रत्याशी जीत जायेंगे। भारत के…

मतदान बाद के चुनाव परिणाम सर्वेक्षणों या एक्जिट पोल पर मेरा कभी भी विश्वास नहीं रहा है क्योंकि भारत में जिस संसदीय प्रणाली के चुनाव होते हैं उनमें हार-जीत का फैसला कई प्रत्याशियों के बीच सर्वाधिक मत पाने वाले प्रत्याशी पर निर्भर करता है। बहु-प्रत्याशी परिपाठी में विभिन्न उम्मीदावारों के बीच इस बात का सर्वेक्षण में पता लग सकता है कि प्रत्येक सीट पर कौन सा प्रत्याशी बढ़त लिये हुए होता है मगर कुछ लोगों के समूहों से कुछ सवाल-जवाब करके यह पता नहीं लगाया जा सकता कि राज्य स्तर पर किस पार्टी के कितने प्रत्याशी जीत जायेंगे।

भारत के जन मानस के हृदय की बात जानने की अपनी एक विशिष्ट कला होती है। यह कला चुनावों का जायजा लेने वाले अनुभवी पत्रकारों में कूट-कूट भरी होती है परन्तु एक्जिट पोल करने वाली एजेंसियां जिस प्रकार कुछ मतदाताओं के नमूनों के आधार पर कयास लगाती हैं उसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता। इसका प्रमुख कारण एक तरफ भारतीय समाज की क्लिष्ठ विविधता है और दूसरी ओर राजनैतिक दलों की लम्बी फेहरिस्त है। चुनावी सर्वेक्षण करने वाले जानते हैं कि किसी भी व्यक्ति से उसकी चुनावी मंशा निकलवाना कितना मुश्किल और सरल काम होता है।

लिखे हुए राजनैतिक सवालों के जवाब लेकर कागजों की पूर्ति तो हो सकती है मगर मतदाता की राय जानने के लिए किसी भी सर्वेक्षक को उस व्यक्ति के पूरे हाव-भावों को भी पढ़ना पड़ता है। मैंने अपने पत्रकारिता जीवन में 1977 से लेकर 2026 के चुनावों तक के विधानसभा व लोकसभा चुनावों का छिट-पुट सर्वेक्षण किया है। इसमें मैंने पाया मतदाता तभी अपने मन की बात खोलता है जब उससे राजनैतिक सवाल घुमा-फिरा कर पूछे जायें। मगर यह कला हर पत्रकार को भी नहीं आती है। इस कला को कोई सिखा भी नहीं सकता है क्योंकि पत्रकारिता बिल्कुल शास्त्रीय संगीत की तरह होती है जिसमें केवल सात स्वर से हजारों रागों का निर्माण होता है। किसी भी व्यक्ति का मन जानने के लिए उसकी सामाजिक पृष्ठ भूमि का ज्ञान भी प्राप्त करना पड़ता है।

2017 में जब पंजाब, उत्तर प्रदेश के साथ कुछ अन्य राज्यों के चुनाव भी हो रहे थे तो उससे पहले 2016 के अक्टूबर महीने में प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अचानक पांच सौ और एक हजार रुपये के नोट बन्द करने की घोषणा कर दी। उनके इस कदम का देश के विपक्षी राजनीतिक दलों ने जम कर विरोध किया। तब लोग अपने पुराने नोट बदलवाने के लिए लम्बी- लम्बी लाइनें लगाने लगे थे। मगर श्री मोदी के इस आर्थिक उपाय का उत्तर प्रदेश के सामाजिक ताने-बाने व राजनीति पर बहुत गहरा असर पड़ा। जबकि पंजाब पूरी तरह अछूता रहा और वहां धूम-धड़ाके के साथ कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी।

श्री मोदी के इस फैसले का लोगों पर मनोवैज्ञानिक असर यह पड़ा कि समाज के गरीब तबके के लोगों के दिलों में मोदी अपना स्थान बनाने लगे। 2017 के चुनावों में नोटबन्दी को विपक्ष ने बहुत बड़ा चुनावी मुद्दा बनाना चाहा क्योंकि उस समय लम्बी-लम्बी कतारों में लगे लोगों की मृत्यु भी हुई जिसका आंकड़ा विपक्ष ने एक सौ के लगभग बताया। मगर जब मैं 2017 के चुनावों का जायजा लेने उत्तर प्रदेश गया तो आम लोगों के मन की बात सुन कर हैरान रह गया। सबसे ज्यादा आर्थिक विपन्नता से जूझ रहे गरीब लोग ही नोटबन्दी से प्रसन्न थे। इसके पीछे मनुष्य का वह मनोविज्ञान काम कर रहा था जिसे पर-पीड़ा का सुख कहा जाता है। इन लोगों के पास खोने के लिए कुछ नहीं था जबकि उनके ही आस-पास रहने वाले अमीर लोगों की शामत आ सकती थी।

अपने पंजाब केसरी समाचार पत्र में मेरी रिपोर्ट छपी जिसमें मैंने साफ- साफ लिखा था कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में भारी लहर चल रही है जिसे देखते हुए इसे अपार सफलता मिलनी चाहिए। उन चुनावों में भाजपा तीन-चौथाई बहुमत के करीब पहुंच गई थी जबकि राज्य में उस समय समाजवादी पार्टी की सरकार के मुखिया अखिलेश यादव थे और इनका गठबन्धन कांग्रेस पार्टी के साथ था। भाजपा की आंधी ने सत्तारूढ़ पार्टी को बहुत कंगाल बना कर छोड़ दिया था। इन चुनावों में राज्य की दूसरी क्षेत्रीय पार्टी बहुजन समाज पार्टी थी मगर पश्चिम उत्तर प्रदेश में ही इस पार्टी के अधिसंख्य समर्थक भाजपा को अपना मत देने का मन बना चुके थे। इसका बहुत आसानी से पता लगाया जा सकता था।

प्रश्न केवल अपने सवालों से उस व्यक्ति का चेहरा पढ़ना व उसकी ‘बाडी लेंग्वेज’ पर गौर फरमाने का था। जिला बिजनौर के मंडावर कस्बे में जब पास की तीतर पुर गांव के एक व्यक्ति के साथ बातचीत शुरू की तो पता लगा कि वह मंडावर बाजार से खरीदारी करने आया है। वह व्यक्ति अनुसूचित जाति का था। उसके गांव तीतर पुर में 90 प्रतिशत से अधिक लोग इसी जाति के बसते थे। मैंने उनके बारे में जरूरी सूचना लेते हुए जब पूछा कि क्या बहन मायावती को आपके गांव का वोट मिलेगा तो उन्होंने अपने लहजे में जवाब दिया ‘अजी इस बार तो मायावती का कोई नाम भी न ले रहा, सबकी राय कमल की है’।

असल में लोगों का थोड़ा-बहुत मनोविज्ञान जानने की कला भी जिस पत्रकार में होती है उसका आंकलन प्रायः सही उतरता है। इसी प्रकार 1980 व 84 के लोकसभा चुनावों का दौरा करने का अवसर भी मुझे मिला। 1984 के चुनावों में तो मैं प्रधानमन्त्री रहे स्व. चौधरी चरण सिंह के साथ में बहुत घूमा। श्री चरण सिंह बहुत स्पष्टवादी और ईमानदार नेता थे। इन चुनावों में उनकी सभाओं में भारी भीड़ तो आ रही थी मगर वह चौधरी साहब को भाषण के दौरान अपेक्षित हुंकारा या जवाब नहीं दे रही थी। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी की जनसभाओं में जनता खुद ही हुंकारा भरने लगती थी।

जब परिणाम आये तो सभी चौंक गये क्योंकि जन-राजनीति में बिल्कुल कोरे समझे जाने वाले प्रधानमन्त्री स्वर्गीय राजीव गांधी की कांग्रेस पार्टी को 400 से अधिक सीटें मिल गई थी जबकि उस समय पंजाब व असम में चुनाव नहीं हुए थे। 1984 में ही मैं ग्वालियर अपने उस समय समाचार पत्र की तरफ से भेजा गया था। ग्वालियर से भाजपा के कद्दावर नेता स्व. अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव लड़ रहे थे उनके मुकाबले में कांग्रेस की तरफ से स्व. माधव राव सिन्धिया मैदान में थे। मैं जब इस इलाके में घूमा तो दंग रह गया। माधव राव सिन्धिया के पक्ष में तूफान जैसा चल रहा था। दिल्ली लौट कर मैंने अपनी खबर उस राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक के लिए लिखी।

उसके पहले शब्द ये थे ‘ग्वालियर से अटल बिहारी चुनाव हार चुके हैं। देखना केवल यह है कि वे कितने बड़े मतान्तर से हारते हैं’। 2004 में सभी एक्जिट पोल सत्तारूढ़ एनडीए को पूर्ण बहुमत दे रहे थे। मगर पंजाब केसरी दिल्ली ही एकमात्र ऐसा अखबार था जो एनडीए की पराजय की घोषणा कर रहा था। 2011 में जब मैं प. बंगाल का चुनाव सर्वेक्षण करने गया तो मैंने पाया कि इस बार वामपंथ नहीं आयेगा क्योंकि वीरभूमि जिले सें स्थित ‘तारा पीठ’ धार्मिक स्थान के बगल में लगे गांव के लोग खुलकर कह रहे थे कि ‘ए बारी ममता’ जबकि एक्जिट पोल वामपंथियों को अच्छी-खासी सीटें दे रहे थे और कुछ तो उसके पुनः सत्ता में रहने की भविष्वाणी भी कर रहे थे।

इन चुनावों में कोलकाता की एक सीट पर मुख्यमन्त्री स्व. बुद्ध देव भट्टाचार्य भी चुनाव लड़ रहे थे। उनकी सीट का सर्वेक्षण करते हुए मैंने पाया कि इलाके के मजदूर तक उनके पक्ष में होने का कोई संकेत तक नहीं दे रहे हैं और खुल कर कह रहे हैं ‘वामपंथ’ होबे ना’।
श्री बुद्ध देव के चुनाव क्षेत्र का दौरा करने के बाद मैने खबर लिखी कि वामपंथ के मुख्यमन्त्री श्री भट्टाचार्य ही चुनाव हार रहे हैं। कोलाकाता के मिर्जा गालिब रोड पर ही मार्क्सवादी पार्टी का कार्यालय है। वहां जाने पर देखा कि इस पार्टी के राज्यसभा सदस्य श्री नीलोत्पल बसु दफ्तर में बैठे हैं। उन्होंने जब मेरी राय पूछी तो मैंने उत्तर दिया कि आपके तो मुख्यमन्त्री ही चुनाव हार रहे हैं।

अतः बहुत स्पष्ट है कि एक्जिट पोल अब सिर्फ एक शगूफा ही रह गये हैं। इनके परिणामों पर यकीन करने का कोई मतलब नहीं रह गया है। वैसे ये आरोप भी लग रहे हैं कि ये एक्जिट पोल सट्टा शेयर बाजार में मुनाफा कमाने के लिए भी होते हैं जैसा कि प. बंगाल के मुख्यमन्त्री ममता दी ने आरोप लगया है और कहा है कि ये पूर्व निर्धारित होते हैं और देश के वाणिज्य मन्त्री श्री पीयूष गोयल ने भी कहा है कि वह इन पोलों पर भरोसा नहीं करते हैं। क्योंकि ये प्रायः इक्का-दुक्का को छोड़ कर गलत ही होते हैं। पिछला रिकार्ड भी यही बताता है।

Team Desk