क्या पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव अब ममता बनर्जी बनाम अमित शाह के बीच एक जनमत संग्रह में बदल गया है? जिस तरह से केंद्रीय गृह मंत्री ने बीजेपी की तरफ से चुनाव लड़ने में खुद को पूरी तरह झोंक दिया, उससे वे असल में राज्य में पार्टी का चेहरा बन गए। ज़ाहिर है, बंगाल में केंद्रीय नेताओं की कुल रैलियों और रोडशो में से 60% अकेले उन्होंने ही किए। उन्होंने राज्य भर में 63 जगहों पर 66 रैलियों और रोडशो को संबोधित किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 जगहों पर 18 रैलियां कीं।
सार्वजनिक कार्यक्रमों के अलावा, शाह लगभग एक महीने तक राज्य में ही डटे रहे; उन्होंने ‘वॉर रूम’ संभाला, पार्टी के चुनावी अभियान की प्रगति पर नज़र रखी और नियमित सर्वे करवाए ताकि यह पता चल सके कि ममता बनर्जी और टीएमसी के मुकाबले बीजेपी का प्रदर्शन कैसा है। बीजेपी के गलियारों में यह चर्चा है कि अगर पार्टी सचमुच पश्चिम बंगाल में जीत हासिल कर लेती है, तो यह शाह की उपलब्धियों में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा और उन्हें ‘मोदी-युग’ के बाद नेतृत्व की कतार में सबसे आगे खड़ा कर देगा।
अब पहले जैसे नहीं रहेंगे डीएमके और राहुल के बीच के रिश्ते तमिलनाडु विधानसभा चुनावों का नतीजा चाहे जो भी हो, डीएमके और राहुल गांधी के बीच के रिश्ते अब पहले जैसे कभी नहीं रहेंगे। यह एक ऐसी दोस्ती है जिसमें अब खटास आ गई है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एम.के. स्टालिन कभी ‘इंडी’ गठबंधन में राहुल गांधी के सबसे मुखर समर्थकों में से एक हुआ करते थे। उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया था कि अगर विपक्षी गठबंधन 2024 का लोकसभा चुनाव जीत जाता है, तो वे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए अपना समर्थन देंगे।
हालाँकि, जब कांग्रेस ने अभिनेता विजय और उनकी नई बनी पार्टी ‘टीवीके’ के साथ नज़दीकियां बढ़ानी शुरू कीं, तो दोनों के रिश्तों में अचानक भारी गिरावट आ गई। तमिलनाडु में कांग्रेस के कुछ नेताओं ने तो खुले तौर पर यह मांग भी कर डाली कि डीएमके के साथ गठबंधन तोड़कर, उसकी जगह टीवीके के साथ हाथ मिला लिया जाए। इन घटनाक्रमों से स्टालिन इतने नाराज़ हो गए कि एक समय तो उन्होंने कांग्रेस को दो-टूक चेतावनी (अल्टीमेटम) ही दे डाली कि वे सीटों के बँटवारे पर बातचीत के लिए मेज़ पर आएं, वरना डीएमके अकेले ही चुनाव लड़ेगी।
आखिरकार, गठबंधन बना रहा और दोनों पार्टियों ने मिलकर चुनाव लड़ा। लेकिन रिश्तों में इतनी ज़्यादा कड़वाहट आ चुकी है कि पूरे चुनावी अभियान के दौरान राहुल गांधी ने स्टालिन के साथ मंच साझा करने से ही इनकार कर दिया और उन्होंने अपनी रैलियों को अकेले ही संबोधित किया। ज़ाहिर है, स्टालिन समेत डीएमके के तमाम नेता राहुल गांधी और कांग्रेस से काफी नाराज़ हैं।


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