मतदान में आर-पार का ‘युद्ध’

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के पहले चरण की 152 सीटों और तमिलनाडु की 234 सीटों पर एक ही चरण में गुरुवार को मतदान होगा। दोनों ही राज्य गैर भाजपा शासित हैं। दोनों ही राज्यों में भाजपा के दिग्गजों ने पूरा दमखम ठोक दिया है। पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में मुकाबला जोरदार दिखाई दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह समेत भाजपा के सभी​ दिग्गजों ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सीधे निशाने पर लिया है, जबकि ममता बनर्जी अपनी टीम के साथ भाजपा से सीधे टक्कर ले रही हैं। मछली से लेकर झालमुड़ी तक सियासत हुई है। कांग्रेस पहली बार 294 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ रही है, क्योंकि उसने अपने लम्बे समय से साथी वामपंथी दलों को छोड़ दिया है। कांग्रेस और वामपंथी दलों ने 2021 का चुनाव मिलकर लड़ा था लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई थीं। तब उसका वोट प्रतिशत केवल 4 प्रतिशत था। भाजपा जहां ममता बनर्जी के शासन को उखाड़ने की उम्मीद लगाए बैठी हैं वहीं कांग्रेस की उम्मीद है कि इस बार के चुनावों में उसका वोट शेयर बढ़ेगा और विधानसभा में उसे कुछ सीटें मिल जाएंगी। भाजपा ने चुनावों में सीमापार से घुसपैठ, भ्रष्टाचार आैर चंदा उगाही, राज्य में महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध, परिवारवाद को मुद्दा बनाया है तो दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस ने मतदाता सूचियों से एसआईआर के नाम पर बड़े पैमाने पर लोगों के नाम कटने, बंगालियों की सांस्कृतिक विरासत और मानसिकता को लेकर भाजपा को जमकर निशाना बनाया है।
ममता बनर्जी ने भाजपा के खिलाफ धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने और समाज को बांटने के आरोप लगाए। एसआईआर में ज्यादातर मुस्लिमों के नाम काटे जाना भी बड़ा मुद्दा है। यद्यपि भाजपा के दिग्गजों ने चुनावी रैलियों में विकास योजनाओं का वादा भी किया है लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की ही छवि को सामने रखकर चुनाव लड़ा है। उन्होंने तृणमूल के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए कई घोटालों को उछाला है। कोलकाता, दुर्गापुर आैर सिलीगुड़ी समेत राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के उत्पीड़न की घटनाओं पर राज्य में बड़े पैमाने पर आक्रोश का माहाैल रहा है। कोलकाता के आरजीकर मैडिकल कॉलेज अस्पताल में जूनियर डॉक्टर के साथ रेप के बाद हत्या की घटना की जांच में ममता बनर्जी सरकार की भूमिका और राज्य में महिला सुरक्षा के सवाल पर भाजपा तृणमूल को कठघरे में खड़ा करती रही है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि लगभग 16 साल से शासन कर रहीं ममता बनर्जी के लिए चुनावी लड़ाई आसान नहीं है लेकिन पांव में हवाई चप्पल और सफेद साड़ी में ममता दीदी अकेली ही भारी दिखाई देती हैं।
ममता बनर्जी की लम्बे समय से आम लोगों के बीच मुख्यमंत्री की बजाय दीदी के तौर पर पहचान, महिला मुख्यमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल, आम लोगों से उनका सम्पर्क और उनकी लड़ाकू नेता की छवि काफी मजबूत है। मतदाता सूची में एसआईआर में घपलेबाजी को लेकर राज्य के लोगों के हित में वह वकील के तौर पर सुुप्रीम कोर्ट में बहस कर चुकी हैं। लक्ष्मी भंडार, कन्या श्री, स्वास्थ्य साथी और हाल ही में शुरू की गई युवा साथी योजनाएं उन्हें चुनावी लाभ दिलवा सकती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि तृणमूल कांग्रेस की जीत में महिला आैर मुस्लिम वोटरों की बड़ी भूमिका रही है। यद्यपि भाजपा ने महिला आरक्षण के मुद्दे पर बिल गिराने के लिए तृणमूल की भूमिका को मुद्दा बनाकर महिलाओं को आकर्षित करने का प्रयास किया है लेकिन जहां तक मुस्लिम मतदाताओं का सवाल है उसके बारे में राय बंटी हुई नजर आ रही है। तृणमूल से अलग हो चुके हुमायूं कबीर भले ही अपनी अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ रहे हैं और ओवैसी से उनका गठबंधन भी टूट चुका है। तृणमूल कांग्रेस भी काफी हद तक उन्हें कमजोर बना चुकी है। देखना होगा कि मुस्लिम मतदाता किस ढंग से वोट करता है। अब बात करते हैं तमिलनाडु की। तमिलनाडु में कांग्रेस डीएमके के नेतृत्व वाले धर्मनिरपेक्ष गठबंधन का हिस्सा है और वह 28 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। सत्तारूढ़ गठबंधन के मुख्य खिलाड़ी होने के नाते मुख्यमंत्री स्टालिन ने पूरे राज्य में जोरदार चुनाव अभियान चलाया। कांग्रेस की तरफ से लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने चुनाव अभियान का नेतृत्व किया। भाजपा ने अन्नाद्रमुक और दूसरी पार्टियों के साथ हाथ मिलाया। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने चुनाव से हफ्ताभर पहले अपने चुनावी अभियान का थीम अचानक बदल दिया। पहले डीएमके के अभियान में क्षेत्रवाद बनाम राष्ट्रवाद, भाषा एवं विकास जैसे मुद्दे छाये हुए थे। चुनाव प्रचार खत्म होते-होते यह सब मुद्दे पीछे छूट गए। डीएमके ने पूरा फोकस परिसीमन पर कर दिया। राज्यभर में काले झंडों के साथ परिसीमन के खिलाफ प्रदर्शन किए गए। जिसके चलते उनकी विरोधी अन्नाद्रमुक को बचाव की मुद्रा में आना पड़ा। अभिनेता से नेता बने टीवीके के नेता विजय खलपति भी परिसीमन का जोरदार विरोध कर रहे हैं, इसलिए अन्नाद्रमुक के नेता भी इस मुद्दे पर बोलने से बचते रहे। हालांकि भाजपा ने बार-बार आश्वासन दिया कि परिसीमन में दक्षिण भारतीय राज्यों को नुक्सान नहीं होगा लेकिन स्टालिन ने म​तदाताओं तक यह संदेश पहुंचा दिया है कि केन्द्र सरकार तमिलनाडु के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है। उन्होंने हर संदेश में तमिल गौरव की लड़ाई का जिक्र किया। मुख्यमंत्री स्टालिन ने यह कहकर इमोशनल कार्ड भी जोरदार ढंग से खेला कि अगर अन्नाद्रमुक नेता जयललिता जीवित होतीं तो वो भी परिसीमन का विरोध करतीं। स्टालिन ने बड़ी चतुराई से परिसीमन ​बिल को अपना जबरदस्त हथियार बना लिया। देखना होगा कि तमिलनाडु में भाजपा कितनी जगह बना पाती है। लोकतंत्र में मतदाता ही सर्वोपरि होता है और उनका जनादेश ही स्वीकार्य होगा। मतदान में किसकी नैय्या आर और किसकी नैय्या पार लगेगी इसका पता 4 मई को लगेगा।

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