मतदान भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश के लिए एक महत्वपूर्ण और सबसे जरूरी प्रक्रिया है। किसी भी लोकतंत्र की स्थापना मतदान के बिना नहीं हो सकती। असम, केरल और पुडुचेरी विधानसभा चुनावों में बम्पर वोटिंग हुई है। इन राज्यों में उम्मीद से बहुत अधिक रिकॉर्ड तोड़ मतदान हुआ है। पुडुचेरी में लगभग 90 प्रतिशत मतदान हुआ जो केन्द्र शासित प्रदेश के इतिहास में सबसे अधिक मतदान है। असम में अनुमानित 86 प्रतिशत रिकाॅर्ड मतदान हुआ है, जो 2021 के आंकड़ों से अधिक है। केरल में भी पिछले विधानसभा चुनावों के 76 प्रतिशत मतदान के मुकाबले इस बार 78 प्रतिशत से ज्यादा मतदान हुआ।
एक तरफ विधानसभा चुनावों के दौरान निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के एसआईआर को लेकर तूफान खड़ा हुआ है। पश्चिम बंगाल में एसआईआर को लेकर जबरदस्त तनाव बना हुआ है। राज्य की मतदाता सूची से 91 लाख वोट काटे जाने का मामला जबरदस्त चुनावी मुद्दा बना हुआ है। राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। निर्वाचन आयोग पर केन्द्र में सत्तारूढ़ एनडीए के पक्ष में काम करने के आरोप लगाकर उसकी साख पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। ऐसे वातावरण में तीन राज्यों में जबरदस्त मतदान लोकतंत्र में नागरिकों की बढ़ती भागीदारी को दर्शाता है।
बड़ी संख्या में लोग विशेषकर महिलाएं और युवा वोट डालने के लिए मतदान केन्द्रों तक पहुंचे। इससे पता चलता है कि लोकतंत्र के इस उत्सव के प्रति उनमें कितना उत्साह था। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि तीनों राज्यों में हिंसा की कोई घटना नहीं हुई। इसका श्रेय निर्वाचन आयोग द्वारा की गई पुख्ता व्यवस्था और पुलिस, अर्धसैनिक बलों के प्रबंधन को दिया जाना चाहिए। असम में पिछली बार तीन चरणों में मतदान हुआ था लेकिन इस बार केवल एक ही चरण में मतदान हुआ। अब देशभर की नजरें चुनाव परिणामों पर लग गई हैं और दिग्गज चुनावी विशेषज्ञ इस बात का आकलन करने में जुट गए हैं कि इन राज्यों में किसकी सरकार बनेगी।
असम में भाजपा गठबंधन का मुकाबला कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन से है। देखना यह है कि क्या भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाती है या कांग्रेस फायदे में रहती है। केरल में भी क्या मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन अपनी सरकार बनाते हैं। क्योंकि इस बार कांग्रेस ने वहां काफी दमखम से चुनाव लड़ा है। वामपंथियों का एकमात्र गढ़ अब केरल ही बचा है। जब से पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन का अंत हुआ है तब से ही वामपंथ देशभर में कमजोर हुआ है। केरल में एक बार वामपंथी तो एक बार कांग्रेस के जीतने का सिलसिला चलता रहा है लेकिन 2021 के विधानसभा चुनावों में यह परम्परा टूट गई थी।
तब मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ को 99 सीटें हासिल हुई थीं। कई वर्षों से भाजपा केरल में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए हर सम्भव प्रयास कर रही है लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही। पुडुचेरी की बात करें तो केन्द्र शासित प्रदेश में भाजपा गठबंधन को द्रमुक और कांग्रेस गठबंधन से टक्कर मिल रही है। मैं इस बात का विश्लेषण नहीं कर रहा हूं कि बढ़ते मतदान का फायदा किसे होगा और किसे नुक्सान होगा। चुनावों में जब भी वोटिंग प्रतिशत बढ़ता है तो एक आम धारणा के अनुसार अनुमान लगाया जाता है कि यह सत्ता के खिलाफ आक्रोश है और सरकार में बदलाव हो सकता है। जब कहीं कम मतदान होता है तो यह तर्क दिए जाते हैं कि मतदाताओं का लोकतंत्र में विश्वास कम हुआ है और वे राजनीतिक दलों के प्रति उदासीन हो चुके हैं।
यह भी कहा जाता है कि मतदाताओं को सरकार और राजनीतिक दलों से कोई उम्मीद नहीं है। इसलिए वे वोट डालने के लिए घरों से बाहर ही नहीं निकले लेकिन भारत में संसदीय और विधानसभा चुनावों का इतिहास बताता है कि अधिक या कम वोटों के परिणाम मिले-जुले ही रहते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वोट प्रतिशत में उतार-चढ़ाव के बावजूद बार-बार कांग्रेस की ही सरकार बनती रही है। बाद के वर्षों में भी कोई तय पैमाना नहीं रहा है। वर्ष 2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव में 72.81 प्रतिशत वोट पड़े थे। लगभग इतने ही वोट 72.13 प्रतिशत 2018 में भी पड़े थे। दोनों चुनावों में वोट प्रतिशत में कोई खास अंतर नहीं आया था, फिर भी सरकारें बदल गईं। स्पष्ट है कि वोट प्रतिशत के घटने या बढ़ने का कोई एक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
राजनीति विज्ञानी कहते हैं कि घटे या बढ़े मतदान प्रतिशत का सत्ता विरोधी या सत्ता के पक्ष में कोई कनेक्शन समझ में नहीं आता। हां, अगर छह-सात फीसदी का अंतर हो तब जरूर इसका मतलब निकाल सकते हैं। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्स के मुताबिक आमतौर पर जब मत प्रतिशत घटता और बढ़ता है तो लोग उसके निहितार्थ निकालते हैं, लेकिन इसे लेकर किसी प्रकार की सहमति नहीं बन पाई है। जब भी औसत आंकड़ों में 7 या इससे अधिक प्रतिशत का हेरफेर होता है तो नतीजे चौंकाने वाले आते हैं। उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के उदाहरण भी हमारे सामने हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि चुनाव आयोग मतदान केन्द्रों की संख्या लगातार बढ़ा रहा है और मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए केन्द्रों पर सुविधाएं भी बढ़ा रहा है। ईवीएम ने मतदान की प्रक्रिया को बहुत आसान बना दिया है। इस बार मतदान केन्द्रों पर छोटे बच्चों के साथ वोट देने आई महिलाओं के लिए कई तरह की सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थीं। कई बार मतदाता राजनीतिक कारणों से तो कई बार सामाजिक कारणों से वोट डालने नहीं जाता। तब भी वोटर वोट डालने को लेकर अनमना हो जाता है। जब उसे लगता है कि किसी पार्टी और नेता का इस समय कोई विकल्प ही नहीं बचा तो वह वोट डालने के लिए निकलता ही नहीं लेकिन तीनों राज्यों में बढ़ा मतदान इस बात का संकेत है कि मतदाताओं को राजनीतिक दलों से उम्मीदें हैं।
मतदान से पहले प्रत्येक दल और प्रत्याशी का प्रयास होता है कि उनके समर्थक ज्यादा से ज्यादा संख्या में घरों से निकलें, जमकर वोट करें। इसके लिए वे तरह-तरह के हथकंडे भी अपनाते हैं। निर्वाचन आयोग भी जागरूकता अभियान चलाता है। आयोग मानकर चलता है कि 100 प्रतिशत मतदान नहीं होता। पांच-दस प्रतिशत लोग अपने गृह क्षेत्र से बाहर रहते हैं। ऐसे में 70 प्रतिशत वोटिंग को भी आयोग 80-82 प्रतिशत मान लेता है। हाल के चुनावों में भाजपा के पन्ना प्रमुख एवं बूथ प्रबंधन के अन्य तरीकों ने भी वोट प्रतिशत को बढ़ाया है, क्योंकि दूसरे दल भी उसी अनुरूप अपने वोटरों को बूथों तक आने के लिए प्रेरित करते हैं। मौसम अगर बढ़िया है तो बूथों पर लंबी कतार लगी दिखती है। उम्मीद है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के मतदाता भी रिकॉर्ड तोड़ मतदान करेंगे।


Download Android App
Download iOS App




