बंगाल में ‘महा-मतदान’

भारत के लोकतन्त्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि जब राजनीतिज्ञ अपना रास्ता भटक जाते हैं तो इस देश की जनता आगे बढ़कर उन्हें सही रास्ता दिखा देती है। भारत के चुनावी इतिहास में एेसी घटनाएं भरी पड़ी हैं जब स्वयं जनता ने ही लोगों की निगेहबानी की हो। फिलहाल प. बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव एेसे समय हो रहे हैं जबकि अन्तर्राष्ट्रीय मोर्चे पर ईरान व अमेरिका-इजराइल युद्ध की वजह से भारत की ऊर्जा सुरक्षा संकट में पड़ी हुई है और आम लोगों पर भी इसकी आंच आ रही है। इसके बावजूद भारत के इन दोनों राज्यों में राजनीतिक विमर्शों का तीखापन उफान पर है और लोगों पर अपनी मनपसन्द राज्य सरकारों के गठन का जुनून सवार है। इसका प्रमाण यह है कि दोनों ही राज्यों में मतदान जम कर हुआ है। फिर भी प. बंगाल के चुनाव की ज्यादा चर्चा देशभर में इस वजह से है कि इस बार केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी पिछले 15 वर्षों से हुकूमत कर रही ममता दीदी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी को करारी शिकस्त देना चाहती है। मगर यह काम इतना आसान नहीं है क्योंकि ममता दीदी ने पिछले 30 वर्षों के दौरान राज्य में जिस प्रकार की जन-मूलक राजनीति की उसमें बंगाल के उप-राष्ट्रवाद के उभार के साथ ही बांग्ला संस्कृति की अस्मिता का भाव जनमानस में सिर चढ़कर बोला। यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी का हिन्दू राष्ट्रवाद का सिद्धान्त बंगाल में दूसरे पायदान पर नजर आता है। इसके कुछ एेेतिहासिक कारण हैं जिसके मूल में बंगाल का भाषाई राष्ट्रवाद प्रमुख है। यहां यह महत्वपूर्ण है कि 1971 में जो पूर्वी पाकिस्तान बदल कर बांग्लादेश बना उसकी जड़ में समूचे बंगाल का बांग्ला भाषाई राष्ट्रवाद ही था।
मगर भारत के प. बंगाल राज्य में आजादी के बाद से ही बांग्ला संस्कृति का प्रादुर्भाव इस प्रकार रहा है कि राज्य की हिन्दू-मुस्लिम जनता ‘वन्दे मातरम्’ को अपना राष्ट्रवादी मन्त्र मानती रही है। इसके साथ ही बंगाल के लोगों के खान-पान में भी हिन्दू-मुस्लिम का बहुत ज्यादा भेदभाव नहीं रहा है। राजनीति का इन सब चीजों से प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं रहता है मगर परोक्ष रूप से ये चीजें राजनीतिक विमर्श को एक स्वरूप देने में निर्णायक भूमिका भी निभाती हैं। प. बंगाल के चुनावों का शोर हमें इसलिए भी ज्यादा सुनाई दे रहा है क्योंकि इन चुनावों में राज्य के लगभग 34 लाख मतदाताओं को मत देने के अधिकार से चुनाव आयोग ने वंचित कर दिया है। इस वजह से चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर भी पूरे देश में विवाद बना हुआ है और यह मामला देश के सर्वोच्च न्यायालय तक में कानूनी चर्चा का विषय बना हुआ है। सभी जानते हैं कि प. बंगाल में 1977 से लेकर 2011 तक वामपंथियों तक एक छत्र राज्य रहा। इस दौरान कम्युनिस्टों ने बंगाल की वह पहचान गायब कर दी जिसके लिए वह अंग्रेजों के शासन के दौर से लेकर विख्यात था। बंगाल की यह प्रसिद्धि इसके औद्योगीकरण को लेकर थी। वामपंथियों ने अपने 34 वर्ष के शासन के दौरान बंगाल को गरीब राज्यों की शृंखला में लाकर खड़ा कर दिया। इसका ब्यौरा कई बार राज्यसभा में पूर्व वित्तमन्त्री स्वर्गीय अरुण जेतली ने रखा था। इन 34 वर्षों में बंगाल से निजी पूंजी निवेश गायब होता चला गया और इस राज्य की बहुसंख्य जनता गरीबी की सीमा रेखा के निकट सरकती चली गई। 2011 में ममता दी ने लगभग 17 साल की कड़ी मेहनत के बाद वामपंथियों के शासन को समाप्त किया। हालांकि राज्य में आजादी के बाद से 1977 तक कमोबेश कांग्रेस पार्टी का राज रहा मगर यह पार्टी वामपंथियों की शासन पद्धति की कम्यून तकनीकों का तोड़ नहीं ढूंढ़ पाई। इसकी एक वजह यह थी कि वामपंथियों ने कृषि व गांव के मोर्चे पर खेतीहर जमीन का बंटवारा बहुत करीने से किया था। वामपंथी शासन में कृषि के मोर्चे पर बेशक सुधारात्मक काम हुए मगर औद्योगिक मोर्चे पर पहिया उल्टा घूमा। जिसकी वजह से बंगाल के मध्य वर्ग में भारी रोष पैदा हुआ और 2011 में ममता दी ने इस जनरोष को अपने पक्ष में भुनाने में अपार सफलता प्राप्त कर ली। चूंकि ममता दी 1996 में कांग्रेस से निकल कर ही अपनी अलग तृणमूल कांग्रेस पार्टी का गठन किया था अतः इस पार्टी के सभी सक्रिय तत्व उनके साथ जुड़ते चले गये। इसके बावजूद कांग्रेस पार्टी के कुछ प्रभाव क्षेत्र राज्य में बने रहे जो 2024 के लोकसभा चुनावों में जाकर इसलिए खत्म हुए क्योंकि भाजपा ने चुनावों को सीधे दो कोणीय बना दिया था। इस सन्दर्भ में यह महत्वपूर्ण है कि वर्तमान विधानसभा चुनावों में कांग्रेस राज्य की सभी 294 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और वामपंथी पार्टियों ने भी 250 से अधिक स्थानों पर अपने प्रत्याशी उतारे हैं। इससे कई अंचलों में चुनाव के त्रिकोणीय होने की संभावना बन गई है जिसका परोक्ष लाभ सत्ताधारी दल को हो सकता है। प. बंगाल में कुल 294 सीटें हैं जिनमें से 152 पर आज मतदान हुआ । मतदान का प्रतिशत 90 के आसपास रहना बताता है कि राज्य के लोगों में राजनीतिक जागरूकता अपने उच्चतम स्तर पर है जिसका अर्थ हर राजनीतिक दल अपने हिसाब से निकाल रहा है मगर यह उस गुस्से का प्रतीक भी है जो मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया के खिलाफ है जिसमें 34 लाख लोग मतदान से वंचित कर दिये गये हैं। जबकि तमिलनाडु की सभी 234 सीटों के लिए आज ही मतदान हो गया है और यहां भी मतदान का प्रतिशत 80 के करीब है। इस राज्य में फिल्मी कलाकार विजय की पार्टी के लिए युवाओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है जिसका अर्थ निकलता है कि राज्य में द्रमुक व अन्ना द्रमुक की राजनीति के बीच एक तीसरी शक्ति का उदय होने जा रहा है । परन्तु यह दीवानगी राज्य के ग्रामीण मतदाताओं में नहीं है अतः विपक्षी दल अन्ना द्रमुक व विजय की पार्टी के बीच दूसरे स्थान के लिए कांटे की लड़ाई हो सकती है। बंगाल में 29 अप्रैल को शेष सीटों के लिए चुनाव होने हैं और कहा जा सकता है कि उन सीटों पर भी बम्पर मतदान होगा। अतः बम्पर मतदान भारतीय लोकतन्त्र की जीवन्तता को बता रहा है और घोषणा कर रहा है कि जनता राजनीतिक धुंधलके को पूरी तरह छांटने की क्षमता रखती है।

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