‘दबाव में काम कर रही सरकार…’, छत्तीसगढ़ में सरकारी आदेशों पर सियासी घमासान, कांग्रेस ने साधा निशाना

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Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ में सरकारी कर्मचारियों की राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों को लेकर जारी आदेशों ने प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। हाल ही में जारी दो अलग-अलग आदेशों के चलते विपक्ष ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष दीपक बैज ने इस मुद्दे पर सरकार की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि सरकार के ताजा फैसले विरोधाभासी हैं और इससे प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं। बैज के अनुसार, सरकार खुद अपने बनाए नियमों को कमजोर कर रही है, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है।

Chhattisgarh News: दो दिनों में बदला फैसला

बैज ने बताया कि 21 अप्रैल को जारी आदेश में सरकारी कर्मचारियों को किसी भी राजनीतिक दल या सामाजिक संगठन की गतिविधियों में शामिल होने से रोक दिया गया था। यह आदेश सेवा नियमों के अनुसार सही माना जा रहा था। लेकिन इसके ठीक अगले दिन यानी 22 अप्रैल को उसी आदेश पर रोक लगा दी गई। इस अचानक बदलाव ने पूरे मामले को उलझा दिया है। उन्होंने कहा कि इतने कम समय में फैसले का बदलना यह दिखाता है कि सरकार के पास स्पष्ट नीति नहीं है या फिर वह किसी दबाव में निर्णय ले रही है।

आरएसएस के दबाव का आरोप

कांग्रेस अध्यक्ष ने इस पूरे घटनाक्रम को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जोड़ते हुए गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि 21 अप्रैल का आदेश लागू रहता तो इसका सबसे ज्यादा असर आरएसएस की गतिविधियों पर पड़ता, क्योंकि इसमें सरकारी कर्मचारियों की भागीदारी सीमित हो जाती। बैज के मुताबिक, इसी कारण सरकार ने जल्दबाजी में आदेश को वापस लिया। उन्होंने यह भी कहा कि यह फैसला प्रशासनिक मजबूती के बजाय राजनीतिक प्रभाव को दर्शाता है।

पहले भी रहा है सख्त रुख

बैज ने याद दिलाया कि पहले की कई सरकारें आरएसएस की गतिविधियों को लेकर सख्त रुख अपनाती रही हैं। ऐसे में वर्तमान सरकार का यह कदम सवालों के घेरे में है। उनका कहना है कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि वह किस आधार पर ऐसे फैसले ले रही है। कांग्रेस ने सरकार से इस मुद्दे पर साफ और स्पष्ट रुख अपनाने की मांग की है। बैज ने कहा कि प्रशासनिक नियमों में पारदर्शिता बेहद जरूरी है, ताकि कर्मचारियों और आम जनता के बीच किसी तरह का भ्रम न रहे। उन्होंने यह भी कहा कि बार-बार फैसले बदलने से न सिर्फ कर्मचारियों का मनोबल गिरता है, बल्कि शासन की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ता है।

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