हंगरी की राजनीति में एक बड़ा बदलाव दर्ज हुआ है, जहां 45 वर्षीय नेता पीटर माज्यार ने लंबे समय से सत्ता में काबिज़ प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन को चुनाव में पराजित कर दिया। यह परिणाम इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि ओर्बन पिछले 16 वर्षों से सत्ता में थे। ओर्बन, जिन्हें अक्सर उनकी राष्ट्रवादी नीतियों के कारण आलोचक ‘तानाशाह’ या ‘हंगरी का हिटलर’ भी कहते थे।
माज्यार, जिन्हें प्रगतिशील यूरोपीय रुख के साथ एक कंजरवेटिव-लिबरल नेता माना जाता है, अगले सप्ताह शपथ लेने वाले हैं। हंगरी की संसद में दो-तिहाई के भारी बहुमत माज्यार को शिक्षा एवं स्वास्थ्य, न्यायिक स्वतंत्रता और विवादास्पद एनईआर (नेम्जेटी एग्युट्टमुकोडेस रेंडजेरे) या राष्ट्रीय सहयोग प्रणाली पर ओर्बन युग के कई बदलावों को पलटने में मदद करने के लिए पर्याप्त है। राष्ट्रीय सहयोग प्रणाली के बारे में विपक्ष का कहना है कि इसने आर्थिक मंदी, घोर भ्रष्टाचार और याराना पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज्म) के साथ-साथ यूरोपीय संघ विरोधी रुख को जन्म दिया है। चुनाव से पहले विक्टर ओर्बन को हाल के संघर्षों में आक्रांता माने जाने वाले तीन शक्तिशाली नेताओं (अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू) का समर्थन मिला। ट्रम्प ने तो पिछले हफ्ते बुडापेस्ट में ओर्बन के साथ एक सार्वजनिक रैली को संबोधित करने के लिए उपराष्ट्रपति जे.डी. वैंस को भी भेजा था। ओर्बन ने नेतन्याहू का स्पष्ट रूप से समर्थन किया था। दरअसल, हंगरी ने इजराइल के प्रधानमंत्री के खिलाफ युद्ध अपराधों के आरोप में वारंट जारी होने के बाद अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय छोड़ दिया था।
हंगरी के मतदाताओं का फैसला बिल्कुल स्पष्ट है। उनके फैसले ने हंगरी के ईसाई-राष्ट्रवादी, लोकलुभावन और धुर दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। ओर्बन ने रिकॉर्ड कई सालों तक देश की सत्ता संभाली (1998-2002 और 2010-2026)। उन्होंने इस चुनाव से पहले लगातार चार चुनावी जीत हासिल की थीं। ताजा चुनावी नतीजों के मुताबिक, विपक्षी नेता पीटर माज्यार की तिस्जा पार्टी ने लगभग 138 सीटें जीती हैं, जबकि ओर्बन की फिदेस्ज पार्टी को 55 सीटें मिली हैं। पूरी दुनिया के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 2010 के दशक में जहां चुनावों के जरिए कई लोकलुभावन नेताओं का उदय हुआ, वहीं हंगरी के चुनाव नतीजों से यह संकेत मिलता है कि दुनिया भर के मतदाता शायद उस धुर दक्षिणपंथी, बहुलवाद-विरोधी,आप्रवासी-विरोधी और विदेशियों के प्रति नफरत से भरी बयानबाजी से थक रहे हैं जिसका उन्होंने समर्थन किया था। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, नीदरलैंड, ब्रिटेन और पोलैंड में हुए चुनावों में भी इसी किस्म के नतीजे देखने को मिले हैं।
एक लोकतांत्रिक नेता का असली इम्तिहान सिर्फ चुनाव जीतने में नहीं होता, बल्कि पूरी आबादी का प्रतिनिधित्व करने और सरकार बनने के बहुत बाद भी अपने कार्यों की जवाबदेही सुनिश्चित करने वाली समावेशी नीतियों को आगे बढ़ाने में होता है। विक्टर ओर्बन ने बहुमत के जोर पर मूल संविधान को खत्म कर दिया और खुद को जैसा चाहिए वैसा बदलाव करके नया संविधान विक्टर साहब ने बना लिया। न्याय व्यवस्था को मुट्ठी में कर लिया। मीडिया पर 90 प्रतिशत नियंत्रण हासिल कर लिया और ‘क्रोनी वैपिटलिज्म’ (पूंजीवादी मित्रवाद) के जोर पर सार्वजनिक संपत्ति अपने ही लोगों की जेब में डाल दी।
विक्टर ओर्बान ने अपने कार्यकाल में उनके देश में क्या-क्या किया, स्वतंत्र पत्रकारिता पर प्रतिबंध लगाए गए। सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी विचार व्यक्त करने वालों को धमकाया गया। उनके खिलाफ मामले दर्ज किए गए। सरकार की आलोचना को ‘राष्ट्रीय अपराध’ घोषित कर दिया गया। अनेक ‘मीडिया हाउस’ सरकार समर्थक उद्योगपतियों के नियंत्रण में आ गए। चुनिंदा उद्योगपति मित्रों को मालामाल करने का अभियान चलाया गया। सभी सरकारी कॉन्ट्रैक्ट और लाभ अपने ही लोगों को दिए गए। कहा जाता है कि यह सारी बेनामी संपत्ति विक्टर ओर्बन की ही है। चुनाव जीतने के लिए भ्रष्ट तरीकों से चंदा इकट्ठा किया गया। विपक्ष को चुनाव में परेशानी हो, इस तरह से निर्वाचन क्षेत्रों की रचना की गई। खुद की ही पार्टी को फायदा हो, इस तरह से चुनावों में पक्षपात और भ्रष्टाचार किया गया। इसमें हंगरी का चुनाव आयोग भी शामिल हो गया।
मतदाताओं और जनता में निरंतर भ्रम और डर पैदा किया। लोगों को धर्मांध बनाया। एक बड़े दुश्मन का आभास पैदा किया। शरणार्थियों, विदेशी नागरिकों और बुद्धिजीवियों, उदारवादियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक बताया गया। ऐसे विचारों वाले लोगों के कारण देश संकट में आ जाएगा, ऐसा दुष्प्रचार करने में प्रधानमंत्री विक्टर सबसे आगे रहे। देश की न्याय व्यवस्था को एक तरह से गुलाम और असहाय बना दिया गया। विक्टर को अर्थव्यवस्था के बारे में कोई समझ नहीं थी। उनके कार्यकाल में अर्थव्यवस्था सुस्त हो गई, महंगाई बढ़ गई, नौकरियां कम हो गईं और सार्वजनिक सेवाएं चरमरा गर्इं। आर्थिक और कानूनी अव्यवस्था के कारण यूरोपीयन निधि बंद कर दी गई। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि नई सरकार यूरोप और अमेरिका के साथ अपने संबंधों को किस तरह संतुलित करती है। हंगरी पहले से ही यूरोपीय संघ का सदस्य है और ऐसे में माज्यार की विदेश नीति आने वाले समय में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। कुल मिलाकर यह चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन भर नहीं, बल्कि हंगरी की राजनीतिक दिशा में एक बड़े बदलाव का संकेत है।






















