पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इन दिनों उत्साहित नजर आ रही हैं, और इसके पीछे ठोस कारण भी हैं। हाल ही में दो अहम घटनाएं उनके लिए बड़ी जीत के रूप में सामने आई हैं पहली, स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (एसआईआर) पर न्यायालय का फैसला, और दूसरी, संसद में महिला आरक्षण विधेयक का ठंडे बस्ते में चला जाना।
“मैं बहुत खुश हूं मुझे अपनी न्यायपालिका पर गर्व है”, ये शब्द बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद कहे, जिसमें विवादास्पद स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान हटाए गए मतदाताओं को वोट डालने की अनुमति दी गई। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस पर एक शर्त भी लगाई कि केवल वे ही मतदाता मतदान के पात्र होंगे, जिनके नाम अपीलीय न्यायाधिकरणों द्वारा मंजूर किए गए हों।
रिकॉर्ड के अनुसार, लगभग 27 लाख मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया था। उनके मतदान के अधिकार का निर्णय न्यायिक अधिकारियों द्वारा किया गया, जिससे पश्चिम बंगाल में कुल विलोपन की संख्या 90 लाख से अधिक हो गई।
जानकारी के लिए, एसआईआर एक मतदाता सूची सत्यापन प्रक्रिया है, जिसे चुनाव आयोग द्वारा विभिन्न राज्यों में मतदाता सूचियों को अद्यतन और शुद्ध करने के लिए चलाया जाता है। इसका उद्देश्य मृत व्यक्तियों के नाम हटाना और डुप्लिकेट प्रविष्टियों को समाप्त कर चुनाव प्रक्रिया को अधिक सटीक और “समावेशी” बनाना है। हालांकि, बनर्जी ने इस प्रक्रिया की आलोचना करते हुए इसे “समावेश के बजाय बहिष्करण करने वाला” करार दिया है।
ममता बनर्जी की “खुशी के स्तर” को यदि संसद में महिला आरक्षण विधेयक के ध्वस्त होने से जोड़कर देखा जाए, तो तस्वीर लगभग पूरी हो जाती है। हालांकि, उन्होंने इसे भाजपा के लिए “अंत की शुरूआत” करार दिया, क्योंकि पार्टी संसद में इस विधेयक को पारित कराने में असफल रही।
महिला आरक्षण विधेयक, जिसे सरकार ने विशेष रूप से बुलाई गई दो दिवसीय संसदीय सत्र के माध्यम से पेश करने की कोशिश की, शुरूआत से ही विफलता की ओर बढ़ता नजर आ रहा था। इसके पीछे मुख्य कारण यह था कि इसे चुनावों के बीच में लाया गया और साथ ही इसे विवादास्पद परिसीमन विधेयक से जोड़ दिया गया। विपक्ष के अनुसार, यह सरकार की “गुप्त, कपटपूर्ण और संदिग्ध चाल” थी, जिसके जरिए महिला विधेयक की आड़ में परिसीमन लागू करने का प्रयास किया जा रहा था। तृणमूल कांग्रेस की तेज-तर्रार सांसद महुआ मोइत्रा ने भी इसे इसी रूप में पेश करते हुए कहा कि यह विधेयक “साड़ी में लिपटा परिसीमन” है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि “चालाक” भाजपा ने इस बार अपनी चाल हद से ज्यादा चल दी। इस मुद्दे पर मोइत्रा की बात काफी हद तक सटीक प्रतीत होती है। भाजपा ने वास्तव में अपनी रणनीति में अति कर दी और इसी प्रक्रिया में वह सौदा गंवा बैठी।
हालांकि इसके परिणाम पर कोई विवाद नहीं है, लेकिन मोदी सरकार की मंशा पर सवाल जरूर उठ रहे हैं। आखिर विधेयक को इतनी जल्दबाजी में क्यों लाया गया? सरकार की रणनीति क्या थी? क्या उसे लगा कि इससे उसे किसी न किसी रूप में राजनीतिक लाभ मिलेगा? दूसरे शब्दों में, यदि विधेयक पारित हो जाता, तो वह अपनी सफलता का प्रचार करती, और यदि विफल होता , जैसा कि हुआ, तो वह विपक्ष को “महिला-विरोधी” ठहराने की कोशिश करती। इस परिप्रेक्ष्य में यह एक तरह की “हर हाल में जीत” की रणनीति नजर आती है। हालांकि, यहां दीर्घकालिक नुकसान बनाम अल्पकालिक लाभ का प्रश्न भी सामने आता है। संभवतः सरकार ने यह आकलन किया होगा कि भले ही विधेयक संसद में गिर जाए, फिर भी वह पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में होने वाले शेष चुनावी अभियान में इसे इस रूप में प्रस्तुत कर सकती है कि उसकी महिला सशक्तिकरण की पहल को विपक्ष ने विफल कर दिया।
उम्मीद यह थी कि इससे महिलाओं का वोट उनके पक्ष में एकजुट होगा और चुनावों में बढ़त मिलेगी। दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण उद्देश्य यह था कि इससे विपक्ष को चुनावी तौर पर नुकसान पहुंचे। हालांकि, मोदी सरकार की रणनीति और आशावाद के बावजूद, घटनाक्रम भाजपा की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं भी हो सकता है। उदाहरण के तौर पर पश्चिम बंगाल में, केवल इस मुद्दे के आधार पर महिलाओं द्वारा ममता बनर्जी का साथ छोड़ना मुश्किल नजर आता है। “दीदी” के नाम से लोकप्रिय मुख्यमंत्री न केवल महिला सशक्तिकरण का प्रतीक हैं, बल्कि एक जुझारू नेता के रूप में भी जानी जाती हैं, और सबसे अहम, हालिया एसआईआर प्रक्रिया में जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए थे, उनके मतदान अधिकारों की बहाली के लिए उन्होंने संघर्ष किया।
यह सर्वविदित है कि पश्चिम बंगाल का चुनाव इस समय एसआईआर के मुद्दे और चुनाव आयोग द्वारा मतदाताओं के कथित वैध अधिकारों को नजरअंदाज करने के आरोपों के इर्द-गिर्द लड़ा जा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में ममता बनर्जी “बंगाल की रक्षक” के रूप में उभरकर सामने आई हैं, जिन्होंने स्वयं सर्वोच्च न्यायालय में उपस्थित होकर “अपने लोगों के लिए पैरवी” की। ऐसे में फिलहाल लैंगिक विभाजन धुंधला पड़ गया है और पुरुष तथा महिलाएं दोनों ही महिला रक्षण के मुद्दे से अधिक केंद्र सरकार और चुनाव आयोग की कथित ज्यादतियों व अन्याय पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
इसलिए, भले ही केंद्र ने राज्य चुनावों को ध्यान में रखकर महिला आरक्षण विधेयक पेश किया हो, इससे उसे अपेक्षित लाभ मिलने की संभावना कम ही दिखती है। और यदि कुछ लाभ मिलता भी है, तो वह अल्पकालिक ही होगा। इसके विपरीत, विपक्ष को इससे दीर्घकालिक राजनीतिक लाभ मिल सकता है, एक ऐसा पहलू जिसे भाजपा ने या तो नजरअंदाज किया या फिर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में जीत की अपनी आतुरता के चलते पर्याप्त महत्व नहीं दिया।
बड़ी तस्वीर यह है कि विधेयक का ध्वस्त होना एक बार फिर विपक्षी एकजुटता की ताकत को रेखांकित करता है। ‘आई.एन.डी.आई.ए.’ गठबंधन के गठन के बाद भले ही इसमें उतार-चढ़ाव देखने को मिले हों, लेकिन समान विचारधारा वाले दलों का इस मुद्दे पर एकजुट होना स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि यदि विपक्ष ठान ले और एक साथ आए, तो वह सरकार और भाजपा को कड़ी चुनौती दे सकता है।
दूसरे शब्दों में, वह वही कर सकता है जो 2024 के चुनावों में भाजपा के साथ हुआ, जब वह पूर्ण बहुमत हासिल करने में असफल रही और अपने दम पर सरकार बनाने के लिए आवश्यक संख्या से पीछे रह गई।
यदि भाजपा इस संकेत को समझने में चूकती है, तो यह उसके लिए घातक साबित हो सकता है। साथ ही, विपक्ष को भी इस संदेश को आगे बढ़ाते हुए अपने प्रयासों को संगठित करना होगा और 2029 के आम चुनावों में भाजपा के सामने एक मजबूत चुनौती पेश करने के लिए एकजुट होना होगा। स्पष्ट है कि यह लड़ाई 2026 से अधिक 2029 की दिशा तय करने वाली है।























