वैश्विक रैंकिंग का प्रभाव भले ही प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न दे, लेकिन यह बेहद गहरा होता है। ये तय करती हैं कि देशों को किस नजरिए से देखा जाएगा, निवेश कहां जाएगा और नीतिगत प्राथमिकताएं कैसे तय होंगी। पर्यटन क्षेत्र में World Economic Forum का Travel & Tourism Development Index (TTDI) सबसे अधिक चर्चित सूचकांकों में से एक है। सरकारें इसे गंभीरता से ट्रैक करती हैं, निवेशक इसे भरोसे के संकेतक के रूप में देखते हैं और मीडिया बिना अधिक सवाल उठाए इसके निष्कर्षों को आगे बढ़ा
देता है।
2024 की रैंकिंग को ध्यान से देखने पर एक स्पष्ट पैटर्न सामने आता है। शीर्ष 30 में से 26 स्थान उच्च आय वाले देशों के पास हैं, जिनमें अकेले यूरोप के 19 देश शामिल हैं। ये वही देश हैं जो पहले से ही वैश्विक पर्यटन पर हावी हैं-पर्यटन GDP का तीन-चौथाई से अधिक हिस्सा और महामारी के बाद की लगभग 70% वृद्धि इन्हीं से आती है। यह सूचकांक इस असंतुलन को चुनौती देने के बजाय उसे दोहराता हुआ नजर आता है। इस प्रकार, जो प्रक्रिया ‘बेंचमार्किंग’ के रूप में प्रस्तुत की जाती है, वह कहीं न कहीं मौजूदा असमानताओं को और मजबूत करने का माध्यम बन जाती है। इसका कारण सूचकांक की संरचना में ही निहित है। TTDI 17 अलग-अलग स्तंभों को समान महत्व देता है, मानो सभी संकेतक समान गति और समयावधि में विकसित होते हों। वास्तविकता इससे अलग है। हवाई कनेक्टिविटी, रेल नेटवर्क, होटल क्षमता और शहरी अवसंरचना जैसे संकेतक दशकों-कभी-कभी सदियों-के निवेश का परिणाम होते हैं। विकसित अर्थव्यवस्थाएँ स्वाभाविक रूप से इन क्षेत्रों में आगे रहती हैं।
भारत की स्थिति इस संदर्भ में एक स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती है। 39वें स्थान पर, वैश्विक औसत से ऊपर और समान अर्थव्यवस्थाओं में अग्रणी होने के बावजूद, भारत की रैंकिंग 2019 के बाद गिरी है-जबकि इस दौरान विमानन क्षमता, डिजिटल अवसंरचना और पर्यटन संसाधनों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। यह एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण संकेत देता है-प्रगति को स्वीकार किया जाता है, लेकिन वह हमेशा रैंकिंग में ऊपर जाने में परिवर्तित नहीं होती। इसके साथ एक और चुनौती जुड़ी है-आकार की। TTDI के लगभग 15 संकेतक प्रति व्यक्ति (per capita) आधार पर हैं।
इसके अलावा, इस सूचकांक में धारणा-आधारित सर्वेक्षणों का भी बड़ा हिस्सा है, खासकर व्यापारिक उत्तरदाताओं के दृष्टिकोण पर आधारित। ये धारणाएं अक्सर विकसित देशों के मानकों पर टिकी होती हैं। ऐसे में वे देश, जो अलग लागत-गुणवत्ता संतुलन में काम करते हैं, उन मानकों पर आंके जाते हैं जो उनके संदर्भ को पूरी तरह नहीं दर्शाते। यह प्रदर्शन की कमी नहीं, बल्कि अपेक्षाओं के असंतुलन का परिणाम होता है। यहां तक कि वे स्तंभ भी, जो तटस्थ दिखते हैं-जैसे प्राकृतिक और सांस्कृतिक संसाधन-भी बाहरी कारकों से प्रभावित होते हैं। दृश्यता इसमें अहम भूमिका निभाती है।
डिजिटल उपस्थिति, ब्रांडिंग और वैश्विक पहचान किसी संसाधन के मूल्यांकन को उतना ही प्रभावित करते हैं जितना उसकी वास्तविक समृद्धि। जो विरासत वैश्विक स्तर पर कम प्रचारित है, वह अक्सर कम आंकी जाती है, चाहे उसकी गहराई कितनी भी हो।
यदि वैश्विक रैंकिंग को बदलती दुनिया में प्रासंगिक बने रहना है, तो उन्हें संरचनात्मक बढ़त और नीतिगत प्रयास, आकार और दक्षता, तथा धारणा और वास्तविक प्रदर्शन के बीच स्पष्ट अंतर करना होगा। तभी वे आज की वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से दर्शा पाएंगी और नीति-निर्माण के लिए अधिक उपयोगी बनेंगी।
भारत सहित उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी यह अवसर है कि वे इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी करें, ताकि वैश्विक ढांचे केवल यह न दिखाएं कि देश कहां खड़े हैं, बल्कि यह भी कि वे किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
क्योंकि अंततः सवाल केवल रैंक का नहीं है-सवाल यह है कि जिन मापदंडों पर हम भरोसा करते हैं, क्या वे वास्तव में उन परिणामों के अनुरूप हैं जिन्हें हम हासिल करना चाहते हैं। यदि हां, तो रैंकिंग मार्गदर्शक बन सकती हैं। यदि नहीं, तो वे केवल अतीत की सुसज्जित छवि बनकर रह जाएंगी, भविष्य का संकेत नहीं।
वैश्विक पर्यटन रैंकिंग पर पुनर्विचार
Summary :
वैश्विक रैंकिंग का प्रभाव भले ही प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न दे, लेकिन यह बेहद गहरा होता है। ये तय करती हैं कि देशों को किस नजरिए से देखा जाएगा, निवेश कहां जाएगा और नीतिगत प्राथमिकताएं कैसे तय होंगी। पर्यटन क्षेत्र में World Economic Forum का Travel & Tourism Development Index (TTDI) सबसे अधिक चर्चित सूचकांकों में से एक है। सरकारें इसे गंभीरता से ट्रैक करती हैं, निवेशक इसे भरोसे के संकेतक के रूप में देखते हैं और मीडिया बिना अधिक सवाल उठाए इसके निष्कर्षों को आगे बढ़ा देता है। 2024 की रैंकिंग को ध्यान से देखने पर एक स्पष्ट…


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