रिकार्ड मतदान और चुनाव !

Summary :

प. बंगाल के दूसरे चरण के मतदान में भी पिछले सभी रिकार्ड तोड़ते हुए मतदान करके इस राज्य की जनता ने यह दिखा दिया है कि लोकतन्त्र की जीवन्तता में उसके प्राण बसते हैं। इसके साथ ही पांच राज्यों में चुनाव पूरे हो गये हैं। बंगाल कई मायनों में भारतीय संस्कृति में अपनी अलग विशिष्टता रखता है जिसमें सबसे प्रमुख भाषाई अस्मिता है और यहां की शास्त्रीय सहअस्तित्व की पहचान है जिसके चलते बंगाल के लोग सभी प्रकार के वर्ग गत भेदभावों से ऊपर उठ कर केवल बंगाली माने जाते हैं । इसके साथ ही भारत में लोकतन्त्र की जड़ों…

प. बंगाल के दूसरे चरण के मतदान में भी पिछले सभी रिकार्ड तोड़ते हुए मतदान करके इस राज्य की जनता ने यह दिखा दिया है कि लोकतन्त्र की जीवन्तता में उसके प्राण बसते हैं। इसके साथ ही पांच राज्यों में चुनाव पूरे हो गये हैं। बंगाल कई मायनों में भारतीय संस्कृति में अपनी अलग विशिष्टता रखता है जिसमें सबसे प्रमुख भाषाई अस्मिता है और यहां की शास्त्रीय सहअस्तित्व की पहचान है जिसके चलते बंगाल के लोग सभी प्रकार के वर्ग गत भेदभावों से ऊपर उठ कर केवल बंगाली माने जाते हैं । इसके साथ ही भारत में लोकतन्त्र की जड़ों को जमाने में भी इस प्रदेश की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, क्योंकि यह राज्य स्वतन्त्रता सेनानियों का मस्तिष्क माना जाता था परन्तु लोकतन्त्र की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि आम मतदाता जब अपना गठबन्धन बनाता है तो बड़े-बड़े राजनीतिक गठबन्धन निष्फल हो जाते हैं। अतः लोकतन्त्र में जो नेता जनता को मूर्ख समझते हैं उनसे बड़ा मूर्ख कोई दूसरा नहीं होता। प. बंगाल में चल रहे चुनाव इस मायने में विशिष्ट कहे जायेंगे कि यहां देश की हिन्दुत्व परक राष्ट्रवादी पार्टी भाजपा आजादी के बाद से लेकर अब तक पहली बार अपने बूते पर सरकार बनाने की हुंकार भर रही है और पिछले 15 वर्षों से सत्ता पर काबिज क्षेत्रीय पार्टी तृणमूल कांग्रेस को उखाड़ने का सपना पाल रही है।
भाजपा का यह सपना कितना पूरा होगा इसका पता तो आगामी 4 मई को चलेगा परन्तु इतना निश्चित है कि भाजपा ने यह चुनाव पूरे दमखम व अपने सर्वस्व को दांव पर लगा कर लड़ा है। मगर इसका मतलब राजनीति में सर्वदा मनमाफिक परिणाम पाने से भी नहीं होता है। भारत के ताजा चुनावी इतिहास में ही इसके कई प्रमाण मौजूद हैं। इसकी एक वजह यह भी मानी जाती है कि क्षेत्रीय दलों के आगे राष्ट्रीय दल तभी टिक पाते हैं जब क्षेत्रीय स्तर पर ही उन्हें कोई संगी–साथी दूसरा क्षेत्रीय दल मिल जाता है। दूसरी तरफ ममता दीदी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी का जनाधार विरासत में मिली वह सौगात है जिस पर कभी कांग्रेस पार्टी का एकाधिकार हुआ करता था। राज्य में देश के दूसरे राष्ट्रीय दल कांग्रेस पार्टी के रसातल में जाने की असली वजह भी यही है, मगर ममता बनर्जी ने बंगाली जनता के बीच अपनी हैसियत कांग्रेस पार्टी के भीतर रहते हुए ही जमीन पर संघर्ष करते हुए तब से बनाई थी जब उन्होंने 1977 के लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी का विरोध किया था। इसके बाद से उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और 1984 में जादवपुर लोकसभा सीट से मार्क्सवादी पार्टी के दिग्गज नेता स्व. सोमनाथ चटर्जी को चुनाव हरा दिया (स्व.चटर्जी हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रहे श्री एन.सी. चटर्जी के सुपुत्र थे )। इसके बाद वह 90 के दशक की शुरूआत तक कांग्रेस में ही रहीं मगर इसी दौरान उन्होंने कोलकाता में हुए कांग्रेस अधिवेशन के समानान्तर अपने समर्थकों का एक सम्मेलन करके उसे तृणणूल कांग्रेस सम्मेलन का नाम दिया और बाद में इसी नाम से अपनी अलग पार्टी गठित कर ली। जिसके बाद उन्होंने राज्य में सत्ता पर काबिज वामपंथी पार्टियों से लोहा लेना शुरू किया और 2011 में उनकी सत्ता पलट कर रख दी। यह सब लिखने का मन्तव्य केवल इतना है कि ममता दीदी की विरासत का अन्दाजा देश की नई पीढ़ी हो सके, क्योंकि प. बंगाल के विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय चर्चा का विषय बने हुए हैं। ये चुनाव हमें बता रहे हैं कि विधानसभा चुनावों के लिए भी कितने बड़े बन्दोबस्त की जरूरत हो सकती है क्योंकि राज्य में केन्द्रीय सुरक्षा बलों के ढाई लाख से अधिक जवान चुनाव आयोग ने चुनावी ड्यूटी पर लगाये हुए हैं। इसे देखकर यह भी कहा जा सकता है कि ये चुनाव राज्य की ममता सरकार के प्रति अविश्वास के भाव से हो रहे हैं। चुनाव आयोग के क्रियाकलापों को देखकर यही कहा जा सकता है क्योंकि इसने चुनावों की घोषणा होने के बाद ही राज्य के 483 प्रशासनिक अधिकारियों का तबादला कर दिया था।
इन चुनावों में जिस प्रकार सभी राजनीतिक पार्टियों का भाषाई मर्यादा का बांध टूटा है उसे हम स्वस्थ लोकतन्त्र के लिए हितकारी नहीं कह सकते हैं, विशेष कर बंगाल के सन्दर्भ में क्योंकि यहां के चुनावों में सैद्धान्तिक बौद्धिकता प्रभावी रहती आई है। पूरे मामले को यदि गौर से देखें तो भारतीय जनता पार्टी हमें अपने सिद्धान्तों पर जमी हुई नजर आती है। यह सिद्धान्त प्रखर हिन्दू राष्ट्रवाद का है। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि बंगाल हिन्दू राष्ट्रवाद की जनक धरती भी रहा है। यह एेतिहासिक तथ्य है कि 1857 के प्रथम स्वातन्त्र्य समर के बाद जब सर सैयद अहमद ने हिन्दू व मुस्लिम आधार पर द्विराष्ट्रवाद का सिद्धान्त दिया था तो उससे पहले ही 1955 के लगभग एक बंगाली विद्वान ने इस विचार की अभिव्यक्ति एक पत्र में छपे अपने अंग्रेजी लेख में की थी (इसका जिक्र प्रख्यात राजनीति वैज्ञानिक डा. इश्तियाक अहमद ने अपनी जिन्ना पर लिखी पुस्तक में किया है) अतः भाजपा की विरासत का आधार भी इस राज्य में है जिसकी वजह से इस पार्टी के संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी इसी राज्य से हुए। बेशक 1951 से पहले उनकी पार्टी हिन्दू महासभा थी जिसकी बंगाल में ही 1906 में जन्मी मुस्लिम लीग से कड़ी अदावत थी। 1947 में पाकिस्तान बनने पर बंगाल के विभाजन की मांग भी सबसे पहले हिन्दू महासभा ने ही की थी जिसका समर्थन बाद में कांग्रेस पार्टी ने किया था, मगर आजादी के बाद यह राज्य हिन्दू–मुस्लिम एकता का सिरमौर भी अपनी बांग्ला संस्कृति की वजह से ही बना। इसके बावजूद इस राज्य में छह से आठ प्रतिशत वोट सदैव हिन्दुत्ववादी ताकतों का बना रहा। भाजपा ने पिछले 2021 के चुनावों में इसे बढ़ाकर 38 प्रतिशत कर दिया और वामपंथियों को हाशिये पर धकेल दिया। अतः भाजपा यदि इन चुनावों में ममता दीदी को हराने की बात कर रही है तो इसे हमें गंभीरता से लेना होगा। जहां तक चुनावी मुद्दों का सवाल है तो इन चुनावों में सबसे बड़ा मुद्दा खुद चुनाव आयोग ही बना हुआ है जिसने 91 लाख बंगाली मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से उड़ा डाले हैं।

Aditya Chopra

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