जहां बुद्ध घर लौटते हैं

भारत के इतिहास में पहली बार तथागत बुद्ध के पवित्र अवशेष अपने स्थायी संरक्षण-स्थल से उस भूमि को आशीर्वाद देने निकले हैं जिसने सदियों की कठिनाइयों, ऊंचाइयों और आस्था के बीच धर्म को जीवित रखा। यह एक सभ्यता का अपने आप को नमन है।
किसी राष्ट्र के जीवन में कुछ ऐसे क्षण आते हैं जब इतिहास केवल खुद को दोहराता नहीं बल्कि और गहरा हो जाता है। इस बुधवार, जब तथागत बुद्ध के पवित्र अवशेष इस पैमाने पर सार्वजनिक श्रद्धा के साथ पहली बार भारत में लद्दाख की धरती पर उतरेंगे तो मैं खुद को सरकारी भाषा की ओर नहीं, बल्कि किसी बहुत पुरानी चीज़ की ओर (श्रद्धा की ओर) मुड़ते हुए पाता हूं।
सदियों से लद्दाख ने यह ज्योति संजोए रखी है। उन क्रूर सर्दियों में जो नदियों को जमा देती हैं, उन भू-राजनीतिक दबावों में जो मज़बूत से मज़बूत आत्माओं को भी आज़माते हैं, ऊंचाई की एकाकी दुनिया में और दूर-दराज़ के दर्रों की कठिनाइयों के बीच-लद्दाख के लोगों ने धर्म को ऐसी निष्ठा से जीवित रखा है जो हर संस्था और हर सरकार को नत-मस्तक कर दे। तो यह बिल्कुल उचित है कि भारत का पहला ऐतिहासिक सार्वजनिक प्रदर्शनी किसी महानगर के वातानुकूलित संग्रहालय में नहीं, बल्कि यहां (दुनिया की छत पर) हो रहा है, जहां आस्था ही जीवन की बनावट है।
तथागत के पवित्र अवशेषों की इस पावन प्रदर्शनी का आधिकारिक नाम भी एक घोषणा है: “संघर्ष के समय में शांति।” एक ऐसी दुनिया में जो युद्ध, विखंडन और बढ़ती दुश्मनी से जूझ रही है, ये शब्द उस सोच को चुनौती देते हैं जो संघर्ष को अनिवार्य मानती है, शक्ति को आक्रामकता से जोड़ती है, और अनिश्चितता का एकमात्र उत्तर बल में देखती है। बुद्ध ने ढाई हज़ार साल पहले इस चुनौती का जवाब दिया था। हम उनकी भौतिक उपस्थिति को वापस ला रहे हैं ताकि दुनिया को याद दिला सकें, वह उत्तर आज भी उतना ही प्रासंगिक है। गौतम बुद्ध के पवित्र अवशेष जिन्हें अत्यंत पवित्रता के साथ संरक्षित किया गया है पहली बार अपने स्थायी संरक्षण-स्थल से बाहर निकलकर इस पैमाने पर भारतीय भूमि पर दर्शन के लिए आ रहे हैं। जेड श्रेणी की सुरक्षा के साथ एक विशेष विमान में वे 29 अप्रैल को लेह पहुंचा और पंद्रह दिनों तक (1 से 15 मई तक) शुभ 2569वीं वेसाक बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर से आरंभ होकर, दुनियाभर के श्रद्धालुओं, भिक्षुओं, विद्वानों और तीर्थयात्रियों के लिए यह प्रदर्शनी सुलभ रहेगी। स्थान भी अपने आप में बहुत कुछ कहते हैं। महाबोधि अंतर्राष्ट्रीय ध्यान केंद्र, ऐतिहासिक लेह पैलेस का धर्म केंद्र, और जीवे-त्सल का शिक्षण स्थल वही पवित्र भूमि जहां परमपावन दलाई लामा ने अपनी शिक्षाएं दी हैं। अवशेष केवल लेह तक सीमित नहीं रहेंगे। 11 और 12 मई के बीच वे सुदूर ज़ांस्कर घाटी की यात्रा करेंगे। उस समुदाय तक बुद्ध की कृपा पहुंचाने के लिए, जिनकी बौद्ध परंपराएं उनके परिदृश्य की खाइयों जितनी गहरी हैं।
“यह भारत की आत्मा, उसकी सभ्यता और उस शाश्वत संदेश का उत्सव है जो वह एक टूटती हुई दुनिया को देती है।” वह भूमि जिसने ज्योति को कभी बुझने नहीं दिया। यह समझने के लिए कि लद्दाख इस अवसर के लिए सही घर क्यों है, पहले लद्दाख को समझना होगा। यह केवल मठों और पहाड़ों का एक नाटकीय परिदृश्य नहीं है, चाहे वह परिदृश्य कितना भी मनोरम हो। यह धर्म का एक जीवित विश्वविद्यालय है। हेमिस मठ की शांत ऊंचाइयों से जिसका वार्षिक उत्सव समूचे हिमालयी संसार से तीर्थयात्रियों को खींचता है। अलची के प्राचीन भित्तिचित्रों तक, जो 10वीं सदी में बने और आज भी भक्ति की प्रतिभा से जीवंत हैं; दिस्कित की विशाल मैत्रेय बुद्ध प्रतिमा से जो श्योक नदी की ओर अनंत करुणा की दृष्टि से देखती है थिकसे के बहुस्तरीय ज्ञान तक, जिसकी तुलना अक्सर तिब्बत के महान मठों से की जाती है लद्दाख हज़ार वर्षों से अधिक समय से बौद्ध दर्शन, कला, पांडुलिपि परंपरा और जीवंत साधना के सबसे असाधारण भंडारों में से एक रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने लद्दाख को बौद्ध संस्कृति और आध्यात्मिकता के एक जीवंत केंद्र के रूप में निरंतर वर्णित किया है। उन्होंने लद्दाख के लोगों की लचीलेपन और देशभक्ति की। विशेषकर कठिन सीमा परिस्थितियों अक्सर बात की है, उनकी आध्यात्मिक शक्ति को राष्ट्रीय संकल्प और एकता से जोड़ते हुए। उन्होंने स्पष्ट किया है कि लद्दाख में विकास उसकी अनूठी संस्कृति और पर्यावरण के संरक्षण के साथ-साथ चलेगा। जैसा कि प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया है: लद्दाख न केवल अत्यंत रणनीतिक महत्व की भूमि है, बल्कि बुद्ध की शिक्षाओं का एक जीवंत केंद्र भी है। पवित्र अवशेषों की यह यात्रा एक आध्यात्मिक आशीर्वाद भी है और बौद्ध विरासत को संजोने में लद्दाख की सदियों पुरानी भूमिका, तथा राष्ट्र की सेवा में यहां के लोगों के साहस और समर्पण की पहचान भी। अहिंसा, करुणा और आंतरिक जागृति पर बुद्ध की शिक्षाएं किसी एक समुदाय, संप्रदाय या परंपरा की संपत्ति नहीं हैं।
चाहे वह गेलुग हो, द्रुकपा, काग्यू, या लद्दाख में फलती-फूलती कोई भी अन्य महान परंपरा, धर्म का सार एक ही रहता है: करुणा का, प्रज्ञा का, सद्भाव का मार्ग।
प्रदर्शनी के हिस्से के रूप में बड़ी संख्या में भिक्षुओं की एक विशाल बौद्ध जाप-सभा की योजना है, जिसे आयोजक Guinness World Records में दर्ज कराना चाहते हैं जो इस भूमि की उस भक्ति के पैमाने का एक सटीक प्रतीक है जिसे वह जगाती है। संस्कृति मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ, और लद्दाख के स्थानीय संगठन-गोम्पा एसोसिएशन, बौद्ध एसोसिएशन और उपराज्यपाल श्री विनय कुमार सक्सेना के नेतृत्व में केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन ने उसी एकता के साथ मिलकर काम किया है जो स्वयं अवशेषों की शिक्षा में निहित है। बुद्ध के आशीर्वाद से लद्दाख के हर घर में शांति आए, सभी समुदायों में सद्भाव हो और सभी प्राणियों को आध्यात्मिक जागृति मिले और यह पवित्र प्रदर्शनी हम सभी को-चाहे हमारी आस्था कुछ भी हो, चाहे हम जहां भी खड़े हों -याद दिलाए कि मनुष्य की सबसे गहरी आकांक्षा हमेशा एक ही रही है: बिना पीड़ा पहुंचाएं जीना, ज्ञान के साथ कार्य करना और दुनिया को उससे थोड़ा अधिक शांत छोड़ जाना जितनी हमें
मिली थी।
बुद्धं शरणं गच्छामि।
धम्मं शरणं गच्छामि।
संघं शरणं गच्छामि।

   – गजेन्द्र सिंह शेखावत
केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री, भारत सरकार

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