संसद, सांसद और संविधान

भारत का लोकतन्त्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र इसलिए कहलाता है क्योंकि इसमें संसद को सर्वोच्च मानते हुए भी स्वतन्त्र न्यायपालिका को इसके द्वारा बनाये गये कानूनों को संविधान की कसौटी पर कसने की छूट दी गई है। संसद में चुना गया प्रत्येक सांसद भी अपने मूलभूत मानवीय अधिकारों के हनन के प्रश्न पर न्यायपालिका की शरण में जा सकता है। संसद का गठन इसके संसद सदस्यों द्वारा किया जाता है जिन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से देश की आम जनता ही चुनती है। लोकसभा में प्रत्यक्ष मतदान द्वारा और राज्यसभा में परोक्ष मतदान द्वारा इसके सदस्यों का चुनाव किया जाता है। इन सदस्यों में सत्ता पक्ष व विरोधी पक्ष दोनों के ही सांसद होते हैं और दोनों ही जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन सांसदों के अपने-अपने सदनों में विशेषाधिकार भी बराबर होते हैं। इन अधिकारों के संरक्षण का दायित्व दोनों सदनों के सभापतियों या अध्यक्षों को मिला होता है। मगर ये सदन चलाने के नियम-कायदे होते हैं जिन्हें स्वयं सासदों ने ही बनाया होता है।
मूलभूत प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ के सामने यह आया है कि क्या किसी सांसद को किसी सदन से अश्चितकाल तक के लिए बर्खास्त किया जा सकता है? निश्चित रूप से संसद सर्वाधिकार सम्पन्न होती है और अपने सदस्यों के आचरण से लेकर व्यवहार तक व नीति-नियम सम्बन्धी अनुपालन तक के बारे में संसद के भीतर ही किसी भी सदस्य के बारे में फैसला किया जा सकता है परन्तु मुख्य न्यायाधीश की पीठ में स्वयं न्यायमूर्ति श्री डी.वाई. चन्द्रचूड़ द्वारा यह टिप्पणी किया जाना कि किसी सांसद विशेष कर विपक्ष के सांसद की सदस्यता को बर्खास्त किया जाना बहुत गंभीर विषय है क्योंकि इसे विपक्ष की आवाज बन्द करने के समरूप देखा जा सकता है। मगर उस हालत में न्यायपलिका किस प्रकार संसद के अन्दरुनी मामलों में हस्तक्षेप कर सकती है जबकि संविधान के अनुसार विधायिका के सदन के भीतर किये गये कार्य को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। संसद के दोनों सदनों के सभापतियों को संसद की भीतरी कार्यवाही के मामले में न्यायिक अधिकार भी मिले होते हैं। इन अधिकारों का प्रयोग सभापतियों द्वारा किया जाता है। अतः राज्यसभा से आम आदमी पार्टी के सांसद श्री राघव चड्ढा की अनिश्चितकाल के लिए बर्खास्तगी न्यायिक समीक्षा में रखी गई परन्तु उनकी बर्खास्तगी सदन के भीतर सदस्यों का मत जानने के बाद की गई जिसे बहुमत का समर्थन मिला परन्तु मुख्य न्यायाधीश का यह कहना कि बहुत मायने रखता है कि किसी विपक्षी सदस्य की बर्खास्तगी इस न्यायिक अदालत के समक्ष बहुत बड़ी चिन्ता का विषय है क्योंकि इसमें विपक्ष की आवाज को शान्त कराने की मंशा छिपी हुई है।
सवाल यह भी महत्वपूर्ण है कि जब विपक्ष किसी सदन में अल्पमत हो तो अपनी असहमति व्यक्त करने के लिए वह कौन सा लोकतान्त्रिक तरीका अपनाये? जाहिर है कि उसकी सत्तारूढ़ दल की नीतियों में निष्ठा नहीं है और वह उन नीतियों का विरोध करने के लिए सदन के भीतर ऐसा रास्ता अपनाना चाहता है जिससे उसके विरोध का स्वर अलग से सुनाई पड़े। इस क्रम में वह एेसे रास्ते अपना सकता है जो लोकतान्त्रिक व्यवस्था के भीतर मान्य माने जाते हों और उनसे किसी प्रकार हिंसा की कोई संभावना न हो। राज्यसभा के इतिहास में हमने देखा है कि इसमें स्व. राजनारायण जैसे समजावादी नेता भी हुए जो अपना विरोध का स्वर ऊंचा रखने की गरज से सदन के भीतर ही धरने पर बैठ जाया करते थे और कभी-कभी असामान्य दिखने वाले कार्य भी कर बैठते थे। सभापति उन्हें मार्शलों की मदद से सदन के बाहर करवा दिया करते थे। वाजपेयी शासनकाल के दौरान जब लालू प्रसाद यादव राज्यसभा में आये तो उन्होंने भी कई बार राजनारायण का रास्ता चुना और वह भी सदन में ही कई बार धरने पर बैठे।
संसदीय लोकतन्त्र में सदन की कार्यवाही में बाधा पहुंचाना भी एक लोकतान्त्रिक हथियार है। इस हथियार का प्रयोग कांग्रेस के शासनकाल में तत्कालीन विपक्षी सांसद भी जमकर करते रहे हैं। अतः संसदीय प्रणाली में बीच का रास्ता ही श्रेयस्कर माना जाता है क्योंकि अपनी जगह यह भी उतना ही सत्य है कि संसद पर पहला अधिकार विपक्ष का ही होता है। इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के सामने महाराष्ट्र के शिन्दे गुट के शिवसेना विधायकों और राष्ट्रवादी कांग्रेस के अजीत पवार के बागी गुट के विधायकों की सदस्यता मामला भी आया। दोनों ही मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष राहुल नार्वेकर को आदेश दिया कि वह शिवसेना के विधायकों की सदस्यता के बारे में 31 दिसम्बर तक और राष्ट्रवादी कांग्रेस के 41 बागी विधायकों की सदस्यता के बारे में 31 जनवरी तक अंतिम फैसला करें। क्योंकि वह विधायकों की सदस्यता के मुद्दे को मन मुताबिक लम्बे समय तक टाल नहीं सकते हैं। विधायकों की सदस्यता का मुद्दा सदन के भीतर हुई कार्यवाही से अलग है। इसका सम्बन्ध दल बदल कानून और संविधान की दसवीं अनुसूचि से है। अतः यह मामला न्यायिक दायरे में लाया जा सकता है। कोई भी कानून लागू करने के लिए होता है । अतः राहुल नार्वेकर के सामने सवाल बड़ा स्पष्ट है कि शिवसेना के विधायकों व राष्ट्रवादी कांग्रेस के अजीत पवार गुट के विधायकों ने इस दल बदल कानून का उल्लंघन किया है अथवा नहीं। इस मामले में राहुल नार्वेकर को यह देखना है कि जब शिवसेना व राष्ट्रवादी कांग्रेस के विधायकों के गुट मूल पार्टी से अलग हुए तो उनकी कानूनी स्थिति क्या थी?

आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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