पश्चिम एशिया का संकट बहुत खतरनाक स्थिति में पहुंच चुका है। अमेरिका और ईरान युद्ध से दुनिया पहले ही सहमी हुई है, तो दूसरी तरफ हूती विद्रोहियों के कूदने से तनाव और भी ज्यादा बढ़ गया है। पूरा मामला अब अरब वर्ल्ड में शिया बनाम सुन्नी होता दिखाई दे रहा है। हूती विद्रोहियों के हमलों में सऊदी अरब के टैंक और जहाज तबाह हो रहे हैं। तेल ठिकानों को नुक्सान पहुंच रहा है। हूती विद्रोहियों ने मुसलमानों के पवित्र शहर मक्का की ओर भी हमले किए हैं। सऊदी अरब को अमेरिका से मिले एफ-15 जेट को भी मलबा बना डाला है। विद्रोहियों ने जिस तरह क्लाउड एआई का इस्तेमाल कर सऊदी ठिकानों को निशाना बनाया उससे साफ है कि वे नवीनतम प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर कितने खूंखार हो चुके हैं। हूती विद्रोही नजदीक के हमलों में राइफलों का नहीं बल्कि रॉकेट लांचरों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके पास अति आधुनिक ड्रोन मौजूद हैं।
हूती विद्रोहियों ने तेल सप्लाई के बाबअल मंदेब स्ट्रेट वाले रूट पर कब्जा कर लिया है। ईरान ने पहले ही होर्मुज स्ट्रेट को बंद किया हुआ है। उससे न केवल सऊदी अरब बल्कि पूरी दुनिया की चिंताएं बढ़ गई हैं। सऊदी अरब बिल्कुल अकेला पड़ चुका है। पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ इस शर्त पर मक्का समझौता किया था कि हमला होने पर दोनों मिलकर लड़ेंगे। किसी एक देश पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा लेकिन हूती लड़ाकों के हमलों के बाद पाकिस्तान ने सऊदी अरब को धोखा देते हुए मदद से साफ इंकार कर दिया। तुर्किये ने भी सऊदी अरब की कोई मदद नहीं की। अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी सऊदी अरब को बड़ा झटका दिया। पश्चिम मीडिया की रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका ने हूती विद्रोहियों के साथ एक सीक्रेट डील की है। इस डील के तहत हूती विद्रोही अमेरिकी जहाजों पर हमले नहीं करेंगे। सऊदी अरब मदद के लिए पुकार रहा है लेकिन कोई उसकी मदद के लिए नहीं आ रहा।
अरब वर्ल्ड को भी यह समझ में आ रहा है कि अमेरिका किसी का सगा नहीं है। शिया और सुन्नी की दुश्मनी का लंबा इतिहास है। 1980 और 90 के दौर में सुन्नी देश यमन में शिया मुसलमानों के एक समुदाय जैदी शिया समुुदाय के बीच एक धार्मिक और राजनीतिक आंदोलन उभरा जो बाद में हूती मूवमेंट बना। इसके पश्चात् यह यमन का राजनीतिक और सैन्य संगठन और उसके बेटे बदरूदीन अल हूती ने बनाया था। यमन आंदोलन करने वाले शिया हूती लड़ाके सुन्नी देश सऊदी अरब के कट्टर दुश्मन कैसे बन गए। दरअसल सुन्नी देश यमन में हूती मूवमेंट की शुरुआत इस आरोप से हुई कि यमन सरकार उन्हें राजनीतिक और आर्थिक तौर पर पीछे कर रही है। साथ ही उन्हें सऊदी अरब से यमन में फैल रहे वहाबी और सलाफी धार्मिक प्रभाव से भी आपत्ति थी। जैसे जैसे हूती मूवमेंट तेज होने लगा यमन के तत्कालीन राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह ने आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हुसैन अल हूती को गिरफ्तार करने की कोशिश की। साल 2004 में यमन की सालेह सरकार ने मिलिट्री ऑपरेशन शुरू कर दिया, जिसमें आंदोलन की अगुवाई कर रहे हुसैन अल हूती मारे गए लेकिन आंदोलन खत्म होने के बजाय और मजबूत हो गया। साल 2004 से 2010 के बीच यमन सरकार और हूती लड़ाकों के बीच 6 बार युद्ध हुआ। इसी बीच इस लड़ाई में सऊदी अरब ने एंट्री की। साल 2009 में सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ लड़ाई में यमन को सैन्य मदद देनी शुरू की।
2015 में भी सऊदी अरब ने यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य अभियान चलाया क्योंकि उसे डर था कि यमन में ईरान के समर्थन वाले हूती सत्ता में आ सकते हैं तब से ही दोनों की दुश्मनी गहरी हो गई। सऊदी अरब हूती विद्रोहियों का मुकाबला नहीं कर पा रहा है। वह पूर्ण युद्ध से बच रहा है। यमन के सैन्य संघर्ष में उलझ कर सऊदी अरब मानवीय और आर्थिक नुक्सान उठा चुका है। सऊदी अरब वर्तमान में अपने आधुनिकीकरण और आर्थिक सुधारों पर ध्यान केन्द्रित कर रहा है और वह लंबा युद्ध झेलने की स्थिति में नहीं है। हूती विद्रोहियों के हमले से सऊदी अरब के तेल बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को बड़ा खतरा है। यदि सऊदी अरब फिर से युद्ध में उलझा तो उसे तेल, पर्यटन और बिजनेस में बहुत नुक्सान होगा। पश्चिम एशिया तनाव दो मोर्चों पर बढ़ रहा है। होर्मुज स्ट्रेट और अल मंदेब स्ट्रेट पर ईरान और हूती विद्रोहियों के कब्जे से तेल सप्लाई अवरुद्ध हो रही है, जिससे तेल ही नहीं यूरोप और एशिया के बीच होने वाले दूसरे एक्सपोर्ट और इंपोर्ट की लागत भी बढ़ जाएगी। क्योंकि ऐसा होने पर यूरोप की ओर एशिया जाने और वहां से आने वाले जहाजों को अफ्रीका के चारों तरफ घूमकर जाना पड़ेगा। अभी जहाज बाब अल मंदेब स्ट्रेट से होते हुए लाल सागर और स्वेज नहर पार करके यूरोप पहुंचते हैं। ये रास्ता बंद होने पर उन्हें अफ्रीका के दक्षिणी किनारे केप ऑफ गुड होप से होकर जाना पड़ेगा। इससे जहाजों को करीब 7 हजार किलोमीटर का एक्स्ट्रा सफर तय करना होगा। यही नहीं अभी के मुकाबले जहाजों को दूरी तय करने में भी 25 से 30 दिन ज्यादा लगेंगे। इससे फ्यूल और शिपिंग का खर्चा काफी ज्यादा बढ़ जाएगा। इसके साथ ही जरूरी सामान पहुंचने में देरी हो सकती है। जिससे पेट्रोल डीजल और दूसरी इंपोर्ट होने वाली चीजों की कीमत बढ़ सकती है। जिसका सीधा असर भारत में महंगाई पर भी पड़ सकता है और कच्चे तेल के दाम तो पहले ही 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचते दिख रहे हैं। युद्ध से न अमेरिका पीछे हट रहा है न ईरान। शिया और सुन्नी संघर्ष ने इस आग में और घी डाल दिया है और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ना तय है।
पश्चिम एशिया का संकट खतरनाक
Summary :
पश्चिम एशिया का संकट बहुत खतरनाक स्थिति में पहुंच चुका है। अमेरिका और ईरान युद्ध से दुनिया पहले ही सहमी हुई है, तो दूसरी तरफ हूती विद्रोहियों के कूदने से तनाव और भी ज्यादा बढ़ गया है। पूरा मामला अब अरब वर्ल्ड में शिया बनाम सुन्नी होता दिखाई दे रहा है। हूती विद्रोहियों के हमलों में सऊदी अरब के टैंक और जहाज तबाह हो रहे हैं। तेल ठिकानों को नुक्सान पहुंच रहा है। हूती विद्रोहियों ने मुसलमानों के पवित्र शहर मक्का की ओर भी हमले किए हैं। सऊदी अरब को अमेरिका से मिले एफ-15 जेट को भी मलबा बना डाला…


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