नागरिकता का प्रमाण

Summary :

भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण नहीं मानने संबंधी दिए गए बयान के बाद गलियों, चौराहों से लेकर सत्ता के गलियारों तक एक बड़ी बहस शुरू हो चुकी है। सोशल मीडिया पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं कि अगर पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी नागरिकता का सबूत नहीं हैं तो ऐसे में भारत के नागरिक होने का असली सबूत क्या है? ​विदेश मंत्रालय ने पासपाेर्ट को सिर्फ यात्रा दस्तावेज माना है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि पासपोर्ट पूरी तरह से भारत सरकार द्वारा व्यापक पृष्ठभूमि जांच के बाद जारी किया जाता है,…

भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण नहीं मानने संबंधी दिए गए बयान के बाद गलियों, चौराहों से लेकर सत्ता के गलियारों तक एक बड़ी बहस शुरू हो चुकी है। सोशल मीडिया पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं कि अगर पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी नागरिकता का सबूत नहीं हैं तो ऐसे में भारत के नागरिक होने का असली सबूत क्या है? ​विदेश मंत्रालय ने पासपाेर्ट को सिर्फ यात्रा दस्तावेज माना है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि पासपोर्ट पूरी तरह से भारत सरकार द्वारा व्यापक पृष्ठभूमि जांच के बाद जारी किया जाता है, जिसमें किसी व्यक्ति की आवासीय स्थिति का पुलिस द्वारा सत्यापन शामिल है और यह स्पष्ट रूप से धारक को एक भारतीय के रूप में पहचानता है। राजनीतिज्ञों और सामाजिक हस्तियों ने भी बहुत सारे सवाल उठाए। आम नागरिक भी यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर वे अपनी नागरिकता कैसे साबित करेंगे। यह सवाल बिहार, पश्चिम बंगाल और कुछ अन्य राज्यों में निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) करवाए जाने के दौरान भी उठा था, तब आधार, पैन, ड्राइविंग लाइसैंस, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड इत्यादि को भी नागरिकता का प्रमाण नहीं माना गया था।
दरअसल पासपोर्ट आैर नागरिकता दो अलग-अलग बाते हैं। पासपोर्ट एक्ट की धारा-20 स्पष्ट रूप से कहती है कि केन्द्र सरकार भारत के बाहर के नागरिकों को भी भारत का पासपोर्ट दे सकती है, बशर्ते वो जनहित के ​िलए जरूरी हो। वैसे तो सरकार ज्यादातर भारतीयों को ही पासपोर्ट देती है लेकिन एक्ट की धारा-20 यह वि​शेष छूट देती है। भारत में नागरिकता मिलने के अलग-अलग प्रावधान हैं। 26 जनवरी, 1950 से 1 जुलाई, 1987 के बीच भारत में जन्मे हर व्यक्ति को नागरिकता मिली है। 1987-2003 के बीच माता-पिता में से एक के भारतीय नागरिक होने पर भी बच्चों को नागरिकता मिलती थी। 2003 के बाद जन्मे बच्चों के लिए दोनों माता-पिता भारतीय नागरिक हों या एक नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी न हो तो नागरिकता मिल सकती है। साथ ही विदेश में जन्मे बच्चे को भारतीय माता-पिता के आधार पर वंश से नागरिकता मिल सकती है, बशर्ते उसका जन्म एक साल के अंदर भारतीय दूतावास में रजिस्टर कराया गया हो। वहीं भारतीय मूल के लोगों के लिए कुछ खास स्थितियों में आवेदन करके रजिस्ट्रेशन के जरिए नागरिकता मिल सकती है। वहीं जो लोग विदेशी हैं और अवैध प्रवासी नहीं हैं और वे लगातार 12 सालों से भारत में रह रहे हैं, तो सरकार उन्हें अपने आप ही शपथ दिलवा कर नागरिकता दे देती है। कानून यह मानकर चलता है कि पासपोर्ट तभी जारी होगा जब स्टेट यह सुनिश्चित कर ले कि आवेदक भारतीय नागरिक है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि पासपोर्ट जब गैर भारतीय नागरिकों को जारी ही नहीं किया जाता है तो फिर जिनके पास पासपोर्ट है, उनके भारतीय होने पर संदेह क्यों है?
भारत में नागरिकता प्रमाणित करने के लिए अधिकारिक तौर पर कोई कागज नहीं दिया जाता। संविधान के अनुसार भारत में पैदा होने वाला शख्स भारतीय नागरिक है। भारत में जन्मे जन्म प्रमाण पत्र के जरिये यह साबित कर सकते हैं कि उनका जन्म भारत में हुआ था और इस ​िलहाज से वो भारतीय नागरिक है। जन्म प्रमाण पत्र, ग्राम पंचायत, नगर पालिका या नगर निगम आदि से जारी किया जाता है, तो फिर झगड़ा किस बात का है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि अगर पासपोर्ट या मतदाता पहचान पत्र महज एक दस्तावेज है तो सरकार क्या यह ऐसे लोगों को भी जारी कर रही है, जिनके भारतीय नागरिक को लेकर वह पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। विदेश मंत्रालय का तर्क अपने आप में बेहद अजीब और विरोधाभासी लगता है। ऐसे में तो किसी भी भारतीय की नागरिकता पर संदेह व्यक्त किया जा सकता है। दूसरी ओर सच यह भी है कि विदेश मंत्रालय का तर्क कानूनी रूप से सही है, क्योंकि पासपोर्ट 1967 के पासपोर्ट एक्ट के तहत जारी होता है। जबकि नागरिकता 1955 के सिटीजनशिप एक्ट के तहत नियंत्रित होती है। एक कानून दस्तावेज को नियंत्रित करता है तो दूसरा कानूनी स्थिति को, लेकिन कानून और आम लोगों की समझ एक जैसी नहीं होती। ज्यादातर भारतीयों के लिए पासपोर्ट सबसे भरोसेमंद दस्तावेज है। कुछ मामलों में अदालतों ने भी पासपोर्ट को नागरिकता साबित करने का अंतिम दस्तावेज नहीं माना है। 2013 में एक व्यक्ति और तीन अन्य अभियुक्तों ने पासपोर्ट के साथ जन्म प्रमाण पत्र और आधार कार्ड के जरिये अपनी नागरिकता सा​िबत करने की कोशिश की थी लेकिन मुुम्बई हाईकोर्ट ने उन्हें राहत देने से इंकार कर ​िदया था। इन पर अवैध प्रवासी होने का आरोप था। उन्होंने खुद भारतीय साबित करने के लिए पासपोर्ट जो बाद में रद्द कर दिए गए थे, आधार कार्ड और जन्म प्रमाण पत्र पेश किए थे।
अगर नागरिकता गलत दावे या गलत जानकारी के आधार पर हासिल की गई हो तो क़ानूनी रूप से सरकार के पास यह अधिकार बना रहता है कि वह पासपोर्ट को जब्त या रद्द करे लेकिन इतनी जांच और पड़ताल के बाद जारी होने वाले पासपोर्ट को भी नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं माना जा सकता है तो फिर कौन सा दस्तावेज़ बचता है? विदेशों में नागरिकों को ​िव​िशष्ट प्रमाण पत्र जारी किए जाते हैं। जिनसे लोगों को अपनी नागरिकता ​सिद्ध करने के​ लिए तरह-तरह के दस्तावेजों का सहारा नहीं लेना पड़ता। बेहतर यही होगा कि केन्द्र सरकार नागरिकता प्रमाण पत्र के तौर पर अपने नागरिकों को​ विशिष्ट पहचान पत्र जारी करे और अपने नागरिकों का नेशनल रजिस्टर या​िन एनआरसी तैयार करे।

Aditya Chopra

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