भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र इसलिए नहीं है कि इसमें मतदाताओं की संख्या लगभग 100 करोड़ है जो कि दुनिया में सबसे बड़ी संख्या है बल्कि इसलिए है कि यह लोकतन्त्र मतदाताओं की सहभागिता से चलता है जिसे ‘सहभागी लोकतन्त्र’ कहा जाता है। इस लोकतन्त्र की विशेषता यह है कि इसमें प्रत्येक मतदाता की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सत्ता में भागीदारी होती है। संसदीय लोकतन्त्र में यह भागीदारी सत्तारूढ़ दल व विपक्ष के माध्यम से तय होती है। इस व्यवस्था में शासन केवल बहुमत के आधार पर चलने का नाम नहीं होता है बल्कि लोगों द्वारा चुने हुए सभी प्रतिनिधियों की सहभागिता से चलने की कला होती है। अतः भारत में मतदाताओं की महत्ता पर विशेष ध्यान देने का काम हमारे संविधान निर्माताओं ने किया और तय किया कि भारत के प्रत्येक वयस्क नागरिक को मतदाता बनाने का काम चुनाव आयोग करेगा जो कि सरकार से निरपेक्ष एक स्वतन्त्र संवैधानिक संस्था होगी। एक प्रकार से देखा जाये तो संविधान निर्माता लोकतन्त्र को पुख्ता करने की प्राथमिक जिम्मेदारी चुनाव आयोग को ही देकर गये। अतः भारत में इस संस्था का विशिष्ट स्थान है और विशेष महत्व है।
देश में मतदाता सूची का शुद्धिकरण देखने का कार्य इसी संस्था का है और आजादी के बाद से यह अपना कार्य पूरी निष्ठा के साथ कर रहा है। परन्तु वर्तमान में चुनाव आयोग द्वारा किया जा रहा गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण विवाद का विषय बना हुआ है और विभिन्न विरोधी राजनैतिक दल इसके विरुद्ध दिखाई पड़ते हैं। लोकतन्त्र में किसी भी मुद्दे या विषय पर मतभेद स्वाभाविक होते हैं परन्तु कुछ सैद्धान्तिक प्रश्न एेसे होते हैं जिन पर मतभेद नहीं हो सकते। मसलन मतदाता सूची तैयार करने और उसका शुद्धिकरण करने के चुनाव आयोग के अधिकार पर सवालिया निशान नहीं खड़ा किया जा सकता। बेशक व्यावहारिक तौर पर इस प्रक्रिया को करने के तरीके के बारे में सवाल उठाये जा सकते हैं मगर चुनाव आयोग के अधिकार को चुनौती नहीं दी जा सकती। हालांकि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में लम्बित है जिस पर सुनवाई चल रही है मगर भारत के लोकतन्त्र के मूलभूत सिद्धान्तों को चुनौती कैसे दी जा सकती है ? विपक्ष सवाल उठा रहा है कि गहन पुनरीक्षण के नाम पर चुनाव आयोग लाखों मतदाताओं के नाम सूची से कैसे काट सकता है? मूलतः यह प्रश्न ही बेमानी है क्योंकि संविधान ही चुनाव आयोग को अधिकार देता है कि वह केवल जायज भारतीय नागरिकों को ही मतदाता सूची में शामिल करे और ‘एक व्यक्ति एक वोट’ के सिद्धान्त पर चले। इसलिए मतदाता सूचियों में यदि किसी व्यक्ति का नाम दोहराया जाता है तो उसे काटना ही होगा और जो व्यक्ति स्वर्ग सिधार चुका है उसका नाम मतदाता सूची से हटाना ही होगा। इसके साथ ही जो लोग एक शहर या गांव से दूसरे स्थान को पलायन कर गये हैं उनके नामों का नियमन भी करना होगा।
संसद के शीतकालीन सत्र का आज अन्तिम दिन है और इसमें चुनाव सुधारों के नाम पर गहन मतदाता पुनरीक्षण के मुद्दे पर खुली बहस हो चुकी है जिसमें विपक्षी पार्टियों को कुछ हासिल नहीं हुआ क्योंकि चुनाव आयोग की कार्य प्रणाली को संसद के घेरे में एक हद तक ही लिया जा सकता है। इसकी वजह यह है कि चुनाव आयोग यदि सूची के शुद्धिकरण का काम करता है तो वह पूरी तरह संवैधानिक है मगर इसके साथ ही चुनाव आयोग को यह भी देखना होता है कि सूची से एक भी जायज मतदाता का नाम न कटे। इस काम के लिए भी वह संवैधानिक रूप से बंधा हुआ है। अतः चुनाव आयोग जो काम कर रहा है वह एक पक्षीय नहीं है उसकी जिम्मेदारी यह भी बनती है कि वह भारत में हर साल 18 वर्ष की उम्र तक पहुंच रहे नागरिकों को भी मतदाता बनाये। गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य भी यही होना चाहिए। इस नजरिये से देखा जाये तो मतदाता सूचियों से नागरिकों के नाम कटने की खबरें ज्यादा आ रही हैं। प. बंगाल की ममता सरकार ने गहन पुनरीक्षण के खिलाफ मानों अभियान ही छेड़ा हुआ था और वह चुनाव आयोग को खुल कर चुनौती दे रही थीं कि यदि उनके राज्य में पुनरीक्षण का काम हुआ तो वह इसके खिलाफ जनान्दोलन तक खड़ा करेंगी। परन्तु चुनाव आयोग के संवैधानिक कार्य को वह नहीं रोक सकीं और आयोग ने प. बंगाल में पुनरीक्षण का पहला चरण पूरा किया जिसमें 58 लाख मतदाताओं के नाम फर्जी पाये गये। ममता दी फरमा रही थीं कि चुनाव आयोग सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का एक संभाग बनकर यह कार्य कर रहा है परन्तु उनके सारे दावे और आरोप गलत पाये जा रहे हैं क्योंकि चुनाव आयोग ने बिना भेदभाव के पुनरीक्षण का कार्य किया है और हिन्दू मुसलमान का भेद किये बिना अपने काम को अंजाम दिया है। विगत मंगलवार को राज्य की पुनरीक्षित मतदाता सूची का जो प्रारूप प्रकाशित किया गया है उसके अनुसार राज्य में अब मतदातों की संख्या 7 करोड़ 66 लाख से घट कर सात करोड़ आठ लाख रह गई है। इस प्रकार 58 लाख मतदाता कम हो गये हैं। इनमें सबसे ज्यादा मतदाता एेसे क्षेत्रों में कटे हैं जो हिन्दी भाषी और हिन्दू बहुल हैं मगर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम मतदाता घटे हैं।
इससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता सिद्ध होती है और उस पर लगाये जा रहे अनर्गल आरोपों की कलई खुलती है। देश के कुल 12 राज्यों (केन्द्र शासित क्षेत्रों समेत) में मतदाता सूची पुनरीक्षण का काम हो रहा है इनमें से पांच राज्यों प. बंगाल, राजस्थान, गोवा, लक्षदीप व पुडुचेरी में कुल एक करोड़ दो लाख मतदाता कम हुए हैं जो 7.6 प्रतिशत के करीब हैं। इससे पता चलता है कि देशभर की मतदाता सूचियों में फर्जी नाम कम नहीं हैं। विपक्ष को इस बारे में अब बहुत सोच-समझ कर ही आरोप लगाने चाहिए और चुनाव आयोग को अनावश्यक रूप से कटघरे में खड़ा नहीं करना चाहिए।
मतदाता सूची का शुद्धिकरण
Summary :
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र इसलिए नहीं है कि इसमें मतदाताओं की संख्या लगभग 100 करोड़ है जो कि दुनिया में सबसे बड़ी संख्या है बल्कि इसलिए है कि यह लोकतन्त्र मतदाताओं की सहभागिता से चलता है जिसे ‘सहभागी लोकतन्त्र’ कहा जाता है। इस लोकतन्त्र की विशेषता यह है कि इसमें प्रत्येक मतदाता की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सत्ता में भागीदारी होती है। संसदीय लोकतन्त्र में यह भागीदारी सत्तारूढ़ दल व विपक्ष के माध्यम से तय होती है। इस व्यवस्था में शासन केवल बहुमत के आधार पर चलने का नाम नहीं होता है बल्कि लोगों द्वारा चुने हुए…



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