आदित्य धर निर्देशित फिल्म ‘धुरंधर’ बॉक्स ऑफिस पर बवाल मचा रही है। इस फिल्म का फीवर दर्शकों के सिर चढ़कर बोल रहा है। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि इसने पहले हफ्ते में तो बमफाड़ कमाई की ही थी वहीं दूसरे वीकेंड पर तो इसने गर्दा ही उड़ा दिया और जबरदस्त उछाल दिखाते हुए पहले वीकेंड से ज्यादा कलेक्शन कर इतिहास ही रच दिया। धुरंधर अनछुए विषय पर बनी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर तो धमाल मचाया ही, सोये हुए भारतीयों को फिर जगा दिया और यहीं से लेफ्ट लिबरल लोगों की तकलीफ बढ़ गई कि क्यों पुराने जख्म कुरेदे गए या फिर पाकिस्तान को बैड लाइट में दिखाया गया लेकिन जो सच है, उसे छुपाना कैसा? यह फिल्म सिर्फ गनफाइट और धुआंधार एक्शन दिखाने के लिए नहीं बनी बल्कि इसमें उस दौर की राजनीति, डर, असुरक्षा और गुस्से की परतें भी हैं।
इसकी कहानी कंधार विमान अपहरण, 2001 संसद हमला और 26/11 मुंबई हमलों जैसी भू-राजनीतिक और आतंकी घटनाओं की पृष्ठभूमि पर आधारित गुप्तचर अभियानों को दर्शाती है। फिल्मकार आदित्य धर ने एक पुराने लेकिन प्रासंगिक विषय पर एक फिल्म बना डाली। यह कहानी है पाकिस्तान के कराची शहर की जहां का सबसे पुराना इलाका ल्यारी गैंगवार से दशकों से आतंकित रहा है। उसी ल्यारी में एक खूंखार डॉन होता था जिसका नाम था बाबू बलोच लेकिन वह बाबू डकैत के नाम से जाना जाता है। उसकी दहशत इतनी थी कि लोग उसका नाम सुनते ही कांपने लगते थे। बाबू बलोच को रहमान नाम के दूसरे बलोच ने मार गिराया और खुद वहां का बेताज बादशाह बन बैठा। रहमान डकैत बेहद क्रूर और निर्दयी था। इन्सानी जिंदगी की उसके पास कोई कीमत नहीं थी। उसके ही गैंग में धुरंधर यानी भारतीय एजेंट हमजा बलोच बनकर जा घुसा। इस फिल्म की कहानी में उन डकैतों की जिंदगी और एक आईएसआई एजेंट की मिलीभगत के सीन भी हैं। एक पुलिस अफसर असलम की भी कहानी है जो डकैतों को खत्म करने में लगा था। कई सालों तक कराची में उसका नाम गूंजता था। कहा जाता है कि बाद में जब तालिबान कराची में घुसे तो उन्होंने एसपी असलम को ही उड़ा दिया। बहरहाल इस फिल्म से लिबरल और कम्युनिस्टों को तकलीफ यह है कि इसमें कराची के मुसलमानों के बारे में सच-सच दिखाया गया। फ़िल्म की सबसे बड़ी सफलता यही है कि वह शोर में भी एक सन्नाटा रच देती है और विस्फोटों के बीच भी दर्शक के मन में एक प्रश्न छोड़ जाती है। देश की सुरक्षा का मूल्य क्या केवल दुश्मन की लाशों में मापा जा सकता है, या उन अपनों की ख़ामोश कुर्बानियों में, जिनकी कोई तस्वीर नहीं होती? अपनी सीमाओं और लंबे विस्तार के बावजूद, “धुरंधर” उस अदृश्य युद्ध का एक भारी, धुएं से भरा पर ज़रूरी दस्तावेज़ बन जाती है।
परदे पर जब अंधेरा घिरता है, कहीं बहुत भीतर एक धीमी-सी आवाज़ गूंजती है। असली धुरंधर वे नहीं होते जो दिखते हैं, बल्कि वे जो सब कुछ खोकर भी राष्ट्र की छाया बनकर चलते रहते हैं। यही इस फ़िल्म की असली अंतर्ध्वनि है और यही उसकी सबसे गहरी विजय। कराची का ल्यारी इलाका फिल्म में केवल एक जगह नहीं बल्कि एक मनोदशा की तरह रचा गया है। गली-गली फैला अंधेरा, दीवारों पर जमी घबराहटें, और हवा में घुली हुई बारूद की गंध—ये सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जहां इंसान होना ही एक जोखिम लगता है। यहीं उसका सामना होता है रहमान डकैत से, जिसे अक्षय खन्ना ने असाधारण संयम और आंतरिक निर्दयता के साथ जिया है। रहमान कोई चीखता-चिल्लाता अपराधी नहीं, वह शांत, योजनाबद्ध और अपने भीतर ठंडा पड़ा हुआ ज्वालामुखी है। उसकी आंखों में क्रूरता नहीं, बल्कि एक ठहरी हुई समझदारी है-जैसे उसने हिंसा को रोमांच नहीं बल्कि रोज़मर्रा की आवश्यकता मान लिया हो। जब हमज़ा उसके बेटे की जान बचाता है, तब वह केवल एक कृपा-पात्र नहीं बनता बल्कि उस शत्रु के घर का हिस्सा बन जाता है, जिसके भीतर उसे चुपचाप विस्फोट करना है। ल्यारी, कराची का एक क्षेत्र है। ‘ल्यारी’ नाम ‘ल्यार’ से आया है, जो कब्रिस्तानों में उगने वाले पेड़ को कहा जाता है। 2000 के दशक में गैंगवार के दौरान ल्यारी में कई कब्रें बनीं। इसी शहर ने रहमान डकैत का भी जन्म, उदय और अंत देखा। 1990 के दशक में रहमान डकैत ने हथियारों, ड्रग तस्करी और उगाही के सहारे अपना साम्राज्य बनाया था। साल 2000 की शुरूआत तक उसने ल्यारी में ड्रग तस्करी, जबरन वसूली और जुआ रैकेट पर पूरा कंट्रोल हासिल कर लिया था। फिल्म ने पाकिस्तान में हड़कंप मचा दिया है। फिल्म के रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर इस पर खूब चर्चा हो रही है लेकिन खासकर पाकिस्तान में ल्यारी इलाके में पुलिस अधिकारी चौधरी असलम की इमेज को लेकर लोगों में नाराजगी है। पाकिस्तान की सरकार ने इस पर नाराजगी जताते हुए फिल्म ‘मेरा ल्यारी’ अगले महीने रिलीज करने की घोषणा की है। इस फिल्म के जरिए पाक सरकार यह मैसेज देना चाहती है कि ल्यारी हिंसा का गढ़ नहीं, बल्कि संस्कृति और साहस का प्रतीक है। सिंध के मंत्री शरजील इनाम मेमन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बयान जारी करके कहा कि ‘धुरंधर’ में ल्यारी को गलत तरीके से दिखाया गया है। उन्होंने कहा कि ल्यारी केवल अपराध और हिंसा नहीं है, बल्कि यह शांति, प्रतिभा और गर्व की मिसाल है। ‘मेरा ल्यारी’ फिल्म असली ल्यारी की कहानी बताएगी। शरजील इनाम मेमन के बयान से साफ है कि पाकिस्तान अपनी अन्तर्राष्ट्रीय इमेज को लेकर परेशान है। ‘धुरंधर’ में ल्यारी में दिखाए गए गैंगवार और अपराध की दुनिया ने पाकिस्तान को परेशान कर दिया है। पाकिस्तान सरकार का ‘मेरा ल्यारी’ बनाने का कदम साफ इशारा करता है कि ‘धुरंधर’ ने उसे असहज कर दिया है।
यह फिल्म सिर्फ दुश्मन देश पर अंगुली नहीं उठाती, बल्कि यह भी दिखाती है कि किस तरह अंडरवर्ल्ड को राजनीति आैर सत्ता के संरक्षण में पनपने का मौका मिलता है। फिर चाहे वो कराची का ल्यारी हो या भारत का मुम्बई शहर हो। रहमान की जिन्दगी जुर्म और सियासत का आइना है, जो अंडरवर्ल्ड ही नहीं बल्कि राजनीति, पुलिस और सत्ता की मिलीभगत की पहचान बन गया था। ल्यारी की गलियों में आज भी ंयह सवाल जिंदा है कि रहमान डकैत, अपराधी था या सिस्टम की ही पैदाइश?
धुुरंधर : पाकिस्तान का काला सच!
Summary :
आदित्य धर निर्देशित फिल्म ‘धुरंधर’ बॉक्स ऑफिस पर बवाल मचा रही है। इस फिल्म का फीवर दर्शकों के सिर चढ़कर बोल रहा है। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि इसने पहले हफ्ते में तो बमफाड़ कमाई की ही थी वहीं दूसरे वीकेंड पर तो इसने गर्दा ही उड़ा दिया और जबरदस्त उछाल दिखाते हुए पहले वीकेंड से ज्यादा कलेक्शन कर इतिहास ही रच दिया। धुरंधर अनछुए विषय पर बनी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर तो धमाल मचाया ही, सोये हुए भारतीयों को फिर जगा दिया और यहीं से लेफ्ट लिबरल लोगों की तकलीफ बढ़ गई कि…



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