‘यह अंततः हो ही गया। लंबे इंतज़ार के बाद मिस्र ने दुनिया को अपनी बहुप्रतीक्षित परियोजना “ग्रैंड इजिप्शियन म्यूज़ियम” का उपहार दिया है। जीईएम (GEM) के नाम से जाना जाने वाला यह संग्रहालय हाल ही में भव्य समारोह के बीच, अपनी प्रमुख विशेषताओं के प्रदर्शन के साथ, औपचारिक रूप से पूर्ण होकर उद्घाटित किया गया।
यह एक अत्यंत पुरानी परिकल्पना रही परियोजना है, जो अब साकार हुई है। ग्रैंड इजिप्शियन म्यूज़ियम दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा संग्रहालय है, जो एक ही सभ्यता को समर्पित है। इसमें एक लाख से अधिक मिस्री पुरावशेष संग्रहित हैं। ये केवल ऐतिहासिक वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि उस मिस्री बुद्धिमत्ता और ज्ञान की प्रतीक हैं, जिसे यह सभ्यता अपने भीतर समेटे हुए है। यह स्मारकों की कहानी भर नहीं, बल्कि उस विचारधारा का दस्तावेज़ है जो सह-अस्तित्व का संदेश देती है।
भारत में मिस्र के राजदूत कामेल ज़ायद गलाल ने संग्रहालय के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह मानवता के लिए एक संदेश है एक ऐसा संदेश जो बताता है कि इस धरती पर सभी के लिए स्थान है। उनके अनुसार, वर्तमान समय में जब दुनिया भू-राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से जूझ रही है, यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। इन सभी परिवर्तनों के बीच यदि कोई स्थिर तत्व है, तो वह है मिस्र। निस्संदेह, राजदूत और मिशन प्रमुख के रूप में कामेल ज़ायद गलाल अपना दायित्व निभा रहे हैं। उनके कार्य का एक महत्वपूर्ण पक्ष इस बहुचर्चित संग्रहालय के बारे में दुनिया को अवगत कराना और उसे लोकप्रिय बनाना हैऔर यही कार्य वे निरंतरता और पूरे जुनून के साथ कर रहे हैं। संग्रहालय की प्रमुख विशेषताओं पर बात करते हुए गलाल ने बताया कि इसका सबसे बड़ा आकर्षण बाल राजा तूतनखामुन की पूरी समाधि है, जिसे पहली बार एक साथ प्रदर्शित किया गया है। तूतनखामुन प्रदर्शनी के अलावा, 4,500 वर्ष पुरानी फिरौन खुफू की अंत्येष्टि नौका भी यहाँ प्रदर्शित है। यह प्राचीन काल की सबसे पुरानी और सर्वश्रेष्ठ संरक्षित नौकाओं में से एक मानी जाती है।करीब 5,00,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला यह संग्रहालय आकार में लगभग “70 फुटबॉल मैदानों” के बराबर बताया जाता है। इसका बाहरी हिस्सा चित्रलिपियों से सुसज्जित है और प्रवेश द्वार पिरामिड के आकार का है।
इसके अतिरिक्त, शक्तिशाली फिरौन रामेसेस द्वितीय का 3,200 वर्ष पुराना, 16 मीटर लंबा निलंबित ओबेलिस्क, प्राचीन राजाओं और रानियों की प्रतिमाओं से सजी भव्य सीढ़ियां इन सबके साथ यह संग्रहालय न केवल स्थापत्य का अद्भुत नमूना है, बल्कि प्राचीन इतिहास का अमूल्य भंडार भी है।
इस परियोजना की परिकल्पना पहली बार 1992 में की गई थी। निर्माण कार्य 2005 में शुरू हुआ और इस वर्ष इसका निर्माण पूर्ण होकर औपचारिक उद्घाटन किया गया।
ऐसे में यह आश्चर्यजनक नहीं है कि गलाल अपनी बातचीत का केंद्र इस संग्रहालय को ही बनाते हैं। विषय बदलने का संकेत देने पर वे प्रारंभ में थोड़ा संकोच करते हैं, लेकिन एक बार खुलने के बाद उनके पास साझा करने के लिए बहुत कुछ होता है उनका वैश्विक दृष्टिकोण, स्वयं को एक “प्राचीन मिस्री” के रूप में देखने की भावना, और भारत के साथ उनका गहरा जुड़ाव।
भारत में अपने अनुभव को लेकर वे कहते हैं, “मेरे मित्र कहते हैं कि आप भारत में रहते थे, लेकिन मैं उनसे असहमत हूँ। मैं कहता हूँ कि मैं भारत में नहीं रहा, बल्कि मैंने भारत को जिया हैऔर यही बड़ा अंतर है। किसी देश में रहना और किसी देश को जीना, दोनों अलग बातें हैं।”गलाल का भारत से जुड़ाव उनके जीवन के शुरुआती वर्षों से है, क्योंकि उनका बचपन मुंबई में बीता। इसलिए जब वे राजदूत के रूप में दोबारा भारत लौटे, तो उन्होंने अपनी पत्नी को अपने स्कूल तक जाने वाली संकरी गलियों में घुमाया। उन्हें वहां के लज़ीज़ नाश्तों और चटनी की खुशबू आज भी याद है। अपने संस्मरण साझा करते हुए गलाल ने कहा, “मैं दस वर्ष की उम्र में यहाँ आया था और एक वयस्क के रूप में मेरी पहली स्मृतियां भारत से जुड़ी हैं। मैं मंदिरों में गया, इन गलियों में चला, गेंद पकड़ने की कोशिश में अक्सर गिरा, धूल और गर्मी को महसूस किया और कुछ दुकानों पर जाकर चटनी की महक को फिर से जिया। यह मानो अपनी यादों के बीच टहलने जैसा था।” पिछले चार दशकों में क्या बदला इस प्रश्न पर वे भावुक होते हुए कहते हैं, “लोग वही हैं। किसी का डीएनए बदला नहीं जा सकता और इस मायने में भारत बिल्कुल नहीं बदला है। जिन लोगों को मैं छोड़कर गया था, वर्षों बाद लौटने पर वही लोग मुझे फिर मिले।” हालांकि वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि भारत का आर्थिक परिदृश्य काफ़ी बदला है। “भारत का आर्थिक विकास उल्लेखनीय रहा है। आप दक्षिण एशिया और वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन चुके हैं और इस पर आपको गर्व होना चाहिए। यही वह परिवर्तन है जिसे मैंने देखा, लेकिन भारतीय समाज का मूल स्वभाव आज भी वही है,” वे कहते हैं।
भारत और मिस्र के मज़बूत संबंधों को रेखांकित करते हुए गलाल यह भी स्वीकार करते हैं कि द्विपक्षीय रिश्तों में एक समय “ठहराव” आया था। “भारत और मिस्र को लगभग एक ही समय स्वतंत्रता मिली भारत को 1947 में और मिस्र को 1952 में। पंडित जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति नासिर, दोनों के पास एक स्पष्ट दृष्टि थी। लेकिन नब्बे के दशक में दोनों देश अपने-अपने क्षेत्रीय और घरेलू मामलों पर अधिक केंद्रित हो गए थे। दक्षिण एशिया में हो रहे घटनाक्रमों पर भी हमारा ध्यान था, शायद यही उस ठहराव का कारण रहा,” वे बताते हैं।
वर्ष 2014 को एक बड़े मोड़ के रूप में वर्णित करते हुए गलाल कहते हैं, “2014 में हमारे द्विपक्षीय संबंधों में नाटकीय बदलाव आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी, दोनों ऐसे समय सत्ता में आए जब उनके देश आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहे थे। इसके बावजूद वे महत्वाकांक्षी थे, उनके पास एक स्पष्ट दृष्टि थी, जिस पर उन्होंने काम किया और सफल हुए।” उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि “दोनों देशों और दोनों नेताओं” के बीच संबंध अत्यंत निकट हैं।मिस्र में चीन के बढ़ते प्रभाव से भारत के लिए प्रतिस्पर्धात्मक माहौल बनने के सवाल पर गलाल ने कहा, “मैं इसे प्रतिस्पर्धा के रूप में नहीं देखता। भारत के लिए भी जगह है, चीन के लिए भी और अन्य सभी के लिए भी ताकि हम मिलकर काम कर सकें।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि मिस्र का चीन के साथ सहयोग है, “यह एक ऐसा सहयोग है जिसे हम महत्व देते हैं और आगे बढ़ाना चाहते हैं।”आतंकवाद और धार्मिक उग्रवाद के विषय पर गलाल ने कहा कि यह पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है। “हमें इस बात पर केंद्रित रहना चाहिए कि किसी भी निर्दोष नागरिक को कोई नुकसान न पहुँचेऔर यही वह साझा सोच है जो हमें भारत के साथ जोड़ती है।”
मिस्र की सौगात
Summary :
‘यह अंततः हो ही गया। लंबे इंतज़ार के बाद मिस्र ने दुनिया को अपनी बहुप्रतीक्षित परियोजना “ग्रैंड इजिप्शियन म्यूज़ियम” का उपहार दिया है। जीईएम (GEM) के नाम से जाना जाने वाला यह संग्रहालय हाल ही में भव्य समारोह के बीच, अपनी प्रमुख विशेषताओं के प्रदर्शन के साथ, औपचारिक रूप से पूर्ण होकर उद्घाटित किया गया। यह एक अत्यंत पुरानी परिकल्पना रही परियोजना है, जो अब साकार हुई है। ग्रैंड इजिप्शियन म्यूज़ियम दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा संग्रहालय है, जो एक ही सभ्यता को समर्पित है। इसमें एक लाख से अधिक मिस्री पुरावशेष संग्रहित हैं। ये केवल ऐतिहासिक वस्तुएं नहीं हैं,…


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