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इकट्ठा चुनाव कराने का सवाल

भारत की भौगोलिक व सामाजिक विविधता को देखते हुए हमारे संविधान निर्माताओं ने जो राजनैतिक संरचना हमें सौंपी उसमें इस बात की गारंटी है कि भारत के प्रत्येक राज्य को अपनी राजनैतिक व्यवस्था उसके लोगों की इच्छानुसार कायम करने की छूट होगी। देश में विभिन्न क्षेत्रीय दलों का उदय इसी राजनैतिक इच्छा शक्ति का परिचायक कहा जा सकता है। केन्द्र व राज्यों के अधिकार की सूची का आवंटन भी इसी तथ्य का द्योतक है कि भारत संघीय व्यवस्था के भीतर राज्यों का ऐसा मजबूत संघ बना रहे जिसमें प्रत्येक राज्य की अपनी अलग सांस्कृतिक, सामाजिक व राजनैतिक पहचान बेखौफ तरीके से बनी रहे। 1967 तक पूरे देश में इसी प्रणाली के तहत लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव हर पांच साल तक एक साथ होते रहे। मगर इसी साल जब नौ राज्यों में पहली बार गैर कांग्रेसी विपक्षी दलों की संयुक्त सरकारों का दौर शुरू हुआ तो बीच में ही इन सरकारों के अपने वजन से ही गिरने के कारण मध्यावधि चुनावों का दौर शुरू हुआ और हर राज्य में इसके बाद अलग-अलग समय पर चुनाव होने लगे।
इसके साथ ही 1970 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की सरकार जब कांग्रेस में पहला विभाजन होने के बाद अल्पमत में आ गई तो लोकसभा के चुनाव भी समय से एक साल पहले 1971 के शुरू में सम्पन्न हुए। इसके बाद 1977 में जब पहली बार गैर कांग्रेसी जनता पार्टी की मोरारजी सरकार गठित हुई तो वह भी अपना कार्यकाल केवल दो वर्ष तक ही चला सकी। अतः 1980 में फिर मध्यावधि लोकसभा चुनाव हुए। इसके बाद 1996 तक हर पांच वर्ष बाद लोकसभा चुनाव हुए। मगर 1996 में केन्द्र में पहली बार साझा सरकार गठित हुई वह भी दो साल चली। अतः 1998 में फिर चुनाव हुआ। यह सरकार मुश्किल से 13 महीने चली अतः 1999 में पुनः चुनाव हुए। इसके बाद फिर ठहराव आया और हर पांच साल बाद चुनाव हो रहे हैं। यह ठहराव इसी बहुदलीय राजनैतिक प्रणाली की अन्तर्निहित व्यवस्था के तहत आया है। 1999 से 2014 तक केन्द्र में साझा सरकारों का दौर चला मगर राजनैतिक अस्थिरता नहीं बनी और वाजपेयी व मनमोहन सिंह सरकारों में शामिल विभिन्न राजनैतिक दलों ने अपनी जिम्मेदारी का परिचय देते हुए राजनैतिक स्थिरता को बनाये रखा। इससे राजनीति में बदलते समय के अनुसार परिपक्वता एक मायने में आयी कि गठबन्धन सरकारें भी मजबूती दे सकती हैं।
राज्यों में अगर हम देखें तो प. बंगाल में वामपंथियों की गठबंधन सरकार ही पूरे 34 साल तक चली। केरल में भी गठबन्धन सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करती हैं। मगर बिहार में हमने हाल ही में देखा कि किस प्रकार पांच साल में सरकारों का समीकरण बदला मगर मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ही रहे। नीतीश बाबू एक दल के स्थान पर दूसरे दल का सहयोग लेकर उसके साथ गठबन्धन बनाकर सरकार चलाते रहे मगर बीच में ही चुनाव कराने की जरूरत नहीं पड़ी। इससे लोकतन्त्र की आत्मा आहत हुई और लोगों को लगा कि उनके वोट की इज्जत नहीं हो रही है। यह सब लोकतान्त्रिक व्यवस्था के भीतर ही विधि सम्मत तरीके से हुआ। दरअसल लोकतन्त्र में जनता की अदालत सबसे बड़ी अदालत होती है और राजनैतिक दलों को इस अदालत में जाने से कभी भी डरना नहीं चाहिए क्योंकि हर समस्या का अन्तिम हल लोकतन्त्र में लोग ही देते हैं। लोकतन्त्र के असली मालिक भी लोग ही होते हैं और उन्हीं के एक वोट की ताकत से सरकारें बनती और बिगड़ती हैं। पूरी दुनिया में भारत और अमेरिका ऐसे देश हैं जहां हर साल किसी न किसी सदन के चुनाव होते रहते हैं। इनमें से अमेरिका दुनिया का सबसे प्राचीन लोकतन्त्र कहलाता है और भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र कहलाता है। इसकी जड़ में मूल कारण यही है कि लोग स्वयं अपने वोट की ताकत से अपने भाग्य का फैसला करते हैं।
भारत में यह बहस लम्बे अर्से से चल रही है कि लोकसभा व विधानसभा चुनाव एक साथ होने चाहिए। बल्कि अब तो स्थानीय निकाय चुनाव और ग्राम पंचायत चुनाव भी एक साथ कराये जाने की बहस छिड़ी हुई है। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि चुनावों पर पैसा कम खर्च होगा। मैं इसे कुतर्क की संज्ञा में रखता हूं कि असली मुद्दा चुनावों को सस्ता बनाये जाने का है। 1974 में जब जेपी आन्दोलन चला था तो चुनाव सुधार भी सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन का एक अव्यव थे। मगर इसके बाद इस विषय पर गंभीरता के साथ कोई काम नहीं हुआ और आज ग्राम पंचायत के चुनाव पर ही लाखों रुपए खर्च होते हैं। लोकसभा चुनावों में तो सैकड़ों करोड़ खर्च तक होने की बात कही जाती है। मगर 22वें विधि आयोग की राय बताई जाती है कि उसने एक साथ सभी चुनाव कराने के लिए तीन संविधान संशोधन किये जाने की बात कही है। वह सभी चुनावों के लिए एक मतदाता सूची की बात करता है।
इस तर्क में वजन है। यदि ऐसा संभव हो तो किया जाना चाहिए जिससे हर चुनाव में अलग से मतदाता सूची बनाने का बोझ कम हो लेकिन इसके लिए भी संविधान संशोधन की जरूरत पड़ेगी। कई तथ्य बहुत विचार करने के हैं जिसमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भारत में त्रिस्तरीय प्रशासन प्रणाली है जिसमें अब चौथी पंचायत प्रणाली भी जुड़ गई है। हमारा संविधान इस पूरी व्यवस्था का बोझ उठाने में सक्षम है और लोग भी हर चुनाव में अपना दायित्व निभाना जानते हैं। इसलिए सभी पक्षों पर बेबाक तरीके से विचार होना चाहिए।

आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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