राहुल गांधी की कांग्रेस की राह !

Summary :

आजकल भारत के बौद्धिक क्षेत्रों में यह जोरदार बहस हो रही है क्या श्री राहुल गांधी फिर से अपनी पार्टी कांग्रेस को ‘नेहरू युग’ में ले जाना चाहते हैं? इसका उत्तर बहुत आसानी से ढूंढा जा सकता है क्योंकि उनकी दादी स्व. इन्दिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी को एकल नेता के प्रशस्ति गान के दौर में घसीट दिया था। 1969 में कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर पहला विभाजन करने के बाद इन्दिरा जी अपनी सरकार की जनोन्मुख नीतियों की वजह से सीधे आम जनता की शरण तो ली मगर इससे कांग्रेस पार्टी संगठात्मक रूप से केवल उनके…

आजकल भारत के बौद्धिक क्षेत्रों में यह जोरदार बहस हो रही है क्या श्री राहुल गांधी फिर से अपनी पार्टी कांग्रेस को ‘नेहरू युग’ में ले जाना चाहते हैं? इसका उत्तर बहुत आसानी से ढूंढा जा सकता है क्योंकि उनकी दादी स्व. इन्दिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी को एकल नेता के प्रशस्ति गान के दौर में घसीट दिया था। 1969 में कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर पहला विभाजन करने के बाद इन्दिरा जी अपनी सरकार की जनोन्मुख नीतियों की वजह से सीधे आम जनता की शरण तो ली मगर इससे कांग्रेस पार्टी संगठात्मक रूप से केवल उनके चमत्कारिक व्यक्तित्व के चारों तरफ ही घूमने लगी । कांग्रेस जनों ने इन्दिरा जी के प्रशस्ति गान को अपना धर्म बना लिया। इसका मुख्य कारण यह था कि कांग्रेस विभाजन के बाद जब इन्दिरा जी ने 1971 में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव कराये तो उनमें संयुक्त विपक्ष के मुकाबले उन्हें तूफानी सफलता मिली।
इन्दिरा जी ने अपने गुट की विभाजित कांग्रेस के संगठन में अपनी इच्छा के अनुसार राज्य स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक नियुक्तियां कीं और सभी कांग्रेसियों ने इस ​िस्थति को खुशी-खुशी न केवल कबूल किया बल्कि पार्टी में बड़ा नेता बनने के लिए खुद को इन्दिरा जी के निकटतम दिखाने का फार्मूला बना दिया। इससे पार्टी केवल इन्दिरा जी के निजी व्यक्तित्व और चमत्कार पर आश्रित होती चली गई और जमीन पर इसके संगठनात्मक ढांचे में आम जनता से सम्पर्क टूटता चला गया। जबकि इन्दिरा जी के शासनकाल में भारत ने घरेलू मोर्चे से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय मोर्चे तक उल्लेखनीय प्रगति की। इन्दिरा जी ने 1971 के चुनावों में जबरदस्त सफलता पाने के बाद सोवियत संघ से 20 साला रक्षा सन्धि की और उसके बाद इसी वर्ष के अन्त में पाकिस्तान से युद्ध लड़ कर उसे बीच से दो भागों में चीरते हुए बांग्लादेश का निर्माण करा कर पूरे एशिया में भारत की शक्ति और सामर्थ्य को सम्मान दिलाया और इसके बाद सिक्किम को भारतीय संघ का हिस्सा बनाकर दुनिया में इसका परचम अमेरिका और चीन के तीव्र विरोध के बावजूद ऊंचा फहराया और 1974 में परमाणु विस्फोट कर भारत को परमाणु शक्ति बना दिया। किन्तु कांग्रेस पार्टी को उन्होंने पूरी तरह व्यक्ति केन्द्रित मंडली में परिवर्तित कर दिया जिससे पार्टी केवल उनकी हत्या के बाद ही 1984 के लोकसभा चुनावों में रिकार्ड बहुमत प्राप्त करने के उपरान्त के चुनावों में कभी भी अपने बूते पर पूर्ण बहुमत नहीं जुटा सकी। हालांकि इसके कारण तत्कालीन राजनैतिक माहौल की वजह से और भी हो सकते हैं मगर कांग्रेस पार्टी का जनता से सम्बन्ध विच्छेद इसके मूल में रहा।
श्री राहुल गांधी इस धारा को उलटने की मुद्रा में लगते हैं जिसकी वजह से वह नेहरू युग की कांग्रेस के मानकों को अपना आदर्श बनाते हुए दिखाई दे रहे हैं परन्तु यह कार्य आसान नहीं है क्योंकि उनकी टक्कर एेसी पार्टी भारतीय जनता पार्टी से है जिसका सैद्धान्तिक आदर्श विशुद्ध राष्ट्रवाद है और सांस्कृतिक एकात्मता है जिसमें हिन्दुत्व समाहित है। राहुल गांधी के लिए यह चुनौती बहुत बड़ी है क्योंकि भाजपा देश की स्वतन्त्रता के बाद जन्मी पार्टी है और इसके लोकप्रिय होने की मुख्य वजह कांग्रेस के लम्बे शासन की खामियां हैं। परन्तु लोकतन्त्र में अन्ततः जन विमर्श ही काम करता है और नेता वही बनता है जिसके गले से जनता की आवाज की प्रतिध्वनी निकलती है। इसलिए यह बेवजह नहीं है कि राहुल गांधी नेहरू युग के समाजवादी दौर में लौट जाना चाहते हैं क्योंकि आर्थिक उदारीकरण की नीति के चलते भारत के कल्याणकारी राज की संवैधानिक स्थापना के मानक तार-तार हो चुके हैं। मगर इसके लिए स्वयं कांग्रेस पार्टी भी कम दोषी नहीं है क्योंकि 1991 से लेकर 1996 तक के उसके राज में ही सार्वजनिक कम्पनियों को सफेद हाथी की संज्ञा दी गई थी और पूरी अर्थव्यवस्था को पूंजी मूलक बनाकर सरकार की सामाजिक जिम्मेदारी कार्पोरेट जगत पर डाल दी गई थी।
इसके जवाब में भारतीय जनता पार्टी ने देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अलख जगाकर जो जन विमर्श खड़ा किया वह कमोबेश रूप से भारत की जनता की उन इच्छाओं का प्रज्वलन थी जो 1947 में देश का बंटवारा होने के बाद समाजवादी नीतियों के चलते सुप्त हो गई थीं। इस सन्दर्भ में यह नहीं भूला जाना चाहिए कि अंग्रेज भी कांग्रेस पार्टी को राष्ट्रवादी पार्टी कहा करते थे। अतः राहुल गांधी जब इस दौर में नारी स्वतन्त्रता का उद्घोष करते हुए मनु स्मृति का हवाला देते हैं तो वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विरुद्ध विमर्श गढ़ते हुए भारतीय जनमानस को वंशानुगत रूढि़यों व परंपराओं से विद्रोह करने का आह्वान करते हैं क्योंकि उत्तर भारत में फैली खाप पंचायतें इसकी सबसे बड़ी प्रवाहक हैं। यहीं से राहुल गांधी के विरोध की धारा बहने की प्रबल संभावना भी बनती है जिससे भारत के ग्रामीण व शहरी समाज में विभाजन की रेखा खिंचती है।
नेहरू की वैज्ञानिक सोच के राहुल गांधी की सोच बहुत करीब लगती है क्योंकि भारत के आजाद होने से कुछ समय पूर्व ही प. नेहरू ने लन्दन के एक अंग्रेजी अखबार में लेख लिख कर कहा था कि भारत कभी भी गरीब देश नहीं रहा। परन्तु राहुल गांधी को अपनी पार्टी कांग्रेस में ही उन विरोधाभासों की तरफ भी देखना होगा जो आज भी सतह पर दिखाई देते हैं। इस सन्दर्भ में उनकी पार्टी के अध्यक्ष श्री मल्लिकार्जुन खड़गे का उत्तराखंड के शहर हल्द्वानी में किया गया वह अपमान है जो वहां के कुछ कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों ने उस रामलीला मैदान का शुद्धीकरण करके किया जहां श्री खड़गे ने एक जनसभा को सम्बोधित किया था। श्री खड़गे एक दलित नेता हैं।
विगत 15 अगस्त को अपनी स्वतन्त्रता की 80वीं वर्षगांठ मना चुके भारत की सामाजिक सोच में यदि आज भी जातिवाद के जहर से उपजी जन्मगत ऊंच-नीच की निकृष्ट मानसिकता व्याप्त है तो जातिगत जनगणना करा कर राहुल गांधी देश को किस वैज्ञानिक युग में प्रवेश करा सकेंगे? श्री खड़गे ने तो अपनी व्यथा केवल राज्यसभा में ही व्यक्त नहीं की थी बल्कि कांग्रेस पार्टी की कार्यसमिति में भी की और कहा कि खुद कांग्रेस पार्टी के लोगों ने भी उनकी इस पीड़ा को मीडिया के माध्यम से आम जनता में उजागर करने का गंभीर प्रयास नहीं किया। अतः राहुल गांधी को पहले कांग्रेस में व्याप्त मनुवादियों को ही संभालना होगा।

Team Desk