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राहुल की यात्रा और गठबंधन की गांठ

इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव के पहले विपक्षी खेमे में एक साथ कई गतिविधियां चल रही हैं। इनमें से दो गतिविधियां ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। एक है राहुल गांधी की मिजोरम से मुंबई तक की करीब 6700 किलोमीटर की भारत जोड़ो न्याय यात्रा जो 14 जनवरी से शुरू होकर 20 मार्च को खत्म होगी। दूसरी गतिविधि है विपक्षी दलों के महागठबंधन ‘इंडिया’ के भीतर तेजी से उभर रही वैचारिक गांठ की। ऐसे में राहुल की यात्रा क्या इतनी ताकत बटोर पाएगी कि नरेंद्र मोदी की सशक्त भाजपा के सामने टिक सके? जवाब भविष्य के गर्भ में है लेकिन मतदाताओं के मन में विश्लेषण तो शुरू हो ही चुका है।
यह कहने में कोई संकोच किसी को नहीं है कि कन्याकुमारी से कश्मीर तक की यात्रा के दौरान राहुल ने एक नई ऊर्जा समेटी, उनकी यात्रा के बाद कांग्रेस ने हिमाचल, कर्नाटक और तेलंगाना विधानसभा के चुनावों में जीत भी हासिल की। हालांकि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने सत्ता भी गंवाई। अब दूसरी यात्रा के लक्ष्य में निश्चय ही लोकसभा चुनाव है, राहुल गांधी की यह यात्रा 15 राज्यों से होकर गुजरेगी। इन राज्यों में लोकसभा की 357 सीटें हैं और आपको याद दिला दें कि 2019 के चुनाव में इनमें से 239 सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की थी। कांग्रेस की स्थिति का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इन 357 सीटों में से केवल 14 सीटों पर ही उसे सफलता मिली थी।
भारत जोड़ो यात्रा वाले राज्यों मणिपुर, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में तो कांग्रेस खाता भी नहीं खोल पाई थी। मेघालय, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में केवल एक-एक सीट ही उसके हिस्से आई। असम में 3 सीटें मिलीं। पश्चिम बंगाल में 2 तथा छत्तीसगढ़ में भी केवल 2 सीटों पर ही जीत मिली। राहुल गांधी ये जानते भी हैं कि कांग्रेस आज पहले जैसी शक्तिशाली नहीं है, न ही उनके पास वैसे साधन हैं न ही कैडर है। एक बार चर्चा में उन्होंने मुझसे कहा था कि मुझे सत्ता से कोई लगाव नहीं है और मैं हमारी ताकत जानता हूं। हम आज से काम करेंगे तो एक मुकाम पर पहुंचेंगे। मैं यदि यह सोचूं कि आज घी खाऊं और कल मोटा-ताजा हो जाऊं तो यह संभव नहीं है। मुझे लगता है कि उन्हें कोई जल्दबाजी नहीं है, वे बेस बना रहे हैं। भाजपा भी तो दो सीटों से दो तिहाई तक पहुंची है। राहुल भले ही योद्धा की तरह मैदान में हैं लेकिन उनके विरोधी यह कहने से नहीं चूकते हैं कि राहुल गांधी जितनी चुनौती देते हैं, नरेंद्र मोदी की भाजपा उतनी ही मजबूत होती जाती है।
तो क्या भाजपा यह चाहेगी कि लोकसभा चुनाव को भाजपा बनाम इंडिया गठबंधन की जगह मोदी बनाम राहुल के रूप में तब्दील कर दिया जाए? भाजपा यही चाहती है क्योंकि इंडिया गठबंधन एकजुट होकर चुनाव मैदान में कूद जाए तो भाजपा के लिए राह आसान नहीं होगी लेकिन गठबंधन की दिक्कत यह है कि उसे जोड़ने वाला कोई माकूल फेवीकॉल इस वक्त उपलब्ध नहीं है। गठबंधन में इतनी बड़ी-बड़ी गांठें उभर आई हैं कि जोड़ से ज्यादा जख्म दिखाई देने लगे हैं, सबकी अपनी डफली अपना राग है। इंडिया गठबंधन में सीटों को लेकर अभी कोई समझौता हुआ नहीं है लेकिन जेडीयू ने अरुणाचल (पश्चिम) से रूही तागुंग को मैदान में उतारने की घोषणा कर दी। दरअसल 2019 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने अरुणाचल में 15 उम्मीदवार खड़े किए थे और 7 पर जीत भी हासिल की थी, हालांकि सभी विधायक बाद में भाजपा में शामिल हो गए थे।
जेडीयू ने न केवल अरुणाचल प्रदेश में अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी बल्कि उसने बिहार में सीतामढ़ी से देवेश चंद्र ठाकुर को और संजय झा को दरभंगा से अपना उम्मीदवार बता दिया है। ऐसा माना जा रहा है कि इंडिया गठबंधन पर दबाव बनाने के लिए नीतीश कुमार ने यह हरकत की है, वे खुले रूप से कुछ कह नहीं रहे हैं लेकिन यह सबको मालूम है कि वे इंडिया गठबंधन के संयोजक बनना चाहते हैं और जीत मिल गई तो खुद को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर भी देखना चाहते हैं।
इधर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित कर दिया था और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने समर्थन भी कर दिया। लालू यादव भी नहीं चाहते कि नीतीश का कद बढ़े। लालू और नीतीश में ठनी हुई है, नए साल पर दोनों ने एक-दूसरे को बधाई नहीं दी, नए साल के पहले दिन ही राबड़ी देवी का जन्मदिन था, नीतीश ने उन्हें भी बधाई नहीं दी।
इधर पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल के बीच जंग जैसी स्थिति है। अधीर रंजन चौधरी ने तो यहां तक कह दिया है कि तृणमूल ईडी और सीबीआई से बचने के लिए नरेंद्र मोदी को खुश करने में लगी है। गठबंधन को लेकर गंभीर नहीं है, तृणमूल ने चेतावनी दी कि हम अलग चुनाव लड़ सकते हैं। उधर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने भी अपने उम्मीदवारों को हरी झंडी दिखानी शुरू कर दी है। हर ओर भ्रम की स्थिति दिखाई दे रही है। मुझे तो लगता है कि इंडिया गठबंधन को सशक्त करने की जितनी बातें हो रही हैं, उससे ज्यादा तो वो अशक्त होता जा रहा है। इधर राम मंदिर व हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण का लाभ भाजपा को मिलना है, यदि विपक्ष को भाजपा से मुकाबला करना है तो राहुल की यात्रा जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी इंडिया गठबंधन की एकता भी है। अभी जो हालात हैं, उसमें नरेंद्र मोदी की भाजपा से सत्ता छीनना दिवास्वप्न से ज्यादा और कुछ नहीं लगता।

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