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राजनाथ की कश्मीर पर संवेदनशीलता

आतंकवाद कहीं भी हो सुरक्षा बलों को बहुत ही कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को समाप्त करने के लिए सेना और अन्य सुरक्षा बलों ने बहुत ही सराहनीय काम किया है। सेना के जवानों ने लगातार अपनी शहादतें देकर जम्मू-कश्मीर में शांति स्थापना के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। पीर पंजाल की पहाड़ियों को आतंकियों ने अपना​ ठिकाना बना रखा है। एलओसी और पाक अधिकृत कश्मीर सहित 225 किलोमीटर का क्षेत्र पीर पंजाल घाटी में ही आता है। पहले घुसपैठ करने वाले पाकिस्तानी आतंकवादी गांव में शरण लेते थे लेकिन अब वे पीर पंजाल के पहाड़ों या जंगल में स्थित गुफाओं और कंद्राओं में छिप रहे हैं। आतंकियों के सफाये में पीर पंजाल रेंज बड़ी चुनौती बना हुआ है। इसी वजह से जवानों की शहादत हो रही है। इस मुहिम में अब तक इस वर्ष 27 जवानों को शहादत देनी पड़ी। राजौरी के कोट रंका का केसरी हिल इलाका भी आतंकियों की शरणगाह बना हुआ है। इन इलाकों की भौगोलिक स्थिति काफी जटिल है। इन इलाकों में पिछले कुछ महीनों में आतंकी चार-पांच वारदातों को अंजाम दे चुके हैं। सैन्य बल जितनी कुशलता से अपने कार्यों को अंजाम दे रहे हैं, उन्हें पूरा देश देखकर गर्व महसूस कर रहा है लेकिन कभी-कभी कहीं न कहीं चूक भी हो जाती है।
हाल ही में राजौरी में किए गए घात लगाकर हमले में सेना के चार जवानों को शहादत देनी पड़ी, वह हमारे लिए असहनीय है लेकिन उसके बाद पूछताछ के लिए उठाए गए 12 लोगों में से तीन लोगों का मृत पाया जाना अपने आप में गम्भीर घटना है। इन्हीं हालातों के बीच केन्द्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जम्मू-कश्मीर पहुंच कर सुरक्षा स्थिति की समीक्षा तो की ही, वहीं उन्होंने सेना को हिदायत भी दी कि राष्ट्र की सुरक्षा करते समय ऐसी चूक नहीं होनी चाहिए जिससे देश के किसी भी नागरिक को ठेस पहुंचे। राजनाथ सिंह अनुभवी एवं परिपक्व राजनीतज्ञ हैं और मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘हम किसी भी युद्ध को जीत लेंगे और आतंकवाद का भी खात्मा करेंगे लेकिन हमें लोगों का दिल भी जीतना है और सेना के कंधों पर यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है।’’ राजनाथ सिंह के दौरे से पहले सेना अध्यक्ष जनरल मनोज पांडे ने भी सेना को हिदायत दी थी कि सेना ऑपरेशन्स के दौरान पूरी तरह से प्रोफैशनल रवैया अपनाए। उनकी यह सलाह बेहद अहम है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने मृत नागरिकों के परिवारों से भी मुलाकात की और उन्हें न्याय दिलाने का भरोसा भी जताया।
जम्मू-कश्मीर प्रशासन पहले ही मृत नागरिकों के परिवारों को मुआवजा और नौकरी देने की घोषणा कर चुका है। सेना ने कुछ अधिकारियों को हटाकर जांच भी शुरू कर दी है। जम्मू-कश्मीर अभी भी नाजुक दौर से गुजर रहा है। अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद से कश्मीर में बदलाव का नया दौर शुुरू हुआ है। कश्मीरी आवाम राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ रहा है। बाजार गुलजार हो उठे हैं। लोग बेखौफ रात के वक्त घूमने-फिरने लगे हैं। पर्यटकों की बढ़ती संख्या से स्थानीय अर्थव्यवस्था काे मजबूती मिल रही है। ऐसे में आतंकवादी असंतोष का कोई ऐसा मौका तलाश रहे हैं ताकि वह उसका फायदा उठा सकें। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आतंकवादियों ने अपने ठिकानों के आसपास एक स्पोर्ट सिस्टम भी तैयार किया हुआ है। स्लीपर सैल उनकी सहायता का काम कर रहे हैं। उनके इस तंत्र को तोड़ने के लिए सुरक्षा बलों को तलाशी भी लेनी पड़ती है और पूछताछ के लिए ग्रामीणों को हिरासत में भी लेना पड़ता है। इसी क्रम में सुुरक्षा बलों से चूक भी हो जाती है। आतंकवादियों का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समर्थन करने वाले भी आतंकवादी घटनाओं के जिम्मेदार होते हैं। मानवाधिकार संगठन ऐसे लोगों के मानवाधिकारों का ढिंढोरा तो पीटते हैं लेकिन जब सेना के जवानों को गाेलियां मारी जाती हैं तब उनके मानवाधिकारों की बात कोई नहीं करता।
पूरे देश ने इस बात को महसूस किया है कि जब मुठभेड़ों के बाद हमारे जवान भीड़ के हमलों का​​ शिकार हुए तो उनके मानवाधिकारों के संरक्षण की बात किसी ने नहीं उठाई। पथराव करने वालों के खिलाफ आत्मरक्षा के लिए कार्रवाई करने पर भी सैनिकों के खिलाफ मामले दर्ज किए जाते रहे। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कट्टरपंथी धाराओं का प्रभाव पूरी तरह खत्म करने तक हम आतंकवाद को समाप्त नहीं कर सकते। अब क्योंकि जम्मू-कश्मीर में चुनाव प्रक्रिया शुरू की जानी है और आतकंवादी ताकतें सुरक्षा बलों को बदनाम करने, कश्मीरी आवाम को उनके खिलाफ भड़काने के साथ-साथ हमले तेज कर सकते हैं। इसलिए सुरक्षा बलों को बेहद सावधानी से काम करना होगा। आतंवादी ताकतों के खिलाफ एक्शन के लिए नई रणनीति बनाकर काम करना होगा।

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