रेखा गुप्ता को मिले ढेरों आशीर्वाद

लोकप्रिय मुख्यमंत्री जो जन-जन से जुड़ी हैं सबके दिलों में बसी हैं, उन्होंने पंजाब केसरी के सम्पादक अश्विनी जी की पुण्यतिथि पर आकर सच्ची श्रद्धांजलि दी। उन्होंने बुजुर्गों से सुख-दुख सांझा किये और अपने हाथों से उनकी जरूरत का सामान बांटा। बुजुर्गों के लिए सरकार की कई नीतियों और सहायता के बारे में बताया। बहुत से बुजुर्ग उनको अपने बीच में पाकर बहुत खुश थे और उन्हें ढेरों आशीर्वाद दे रहे थे। रेखा गुप्ता ने कईयों को गले से लगाया। रेखा गुप्ता जी ने अश्विनी जी को याद करते हुए इस मौके पर कहा कि कैसे वह उनके कॉलेज समय से लेकर पार्षद बनने तक बड़े भाई की तरह मार्गदर्शन करते थे। उन्होंने यह भी बताया कि अश्विनी जी अपने कर्मचारियों को अपने परिवार की तरह रखते थे। मैं आज भी यहां उन्हीं कर्मचारियों को देख रही हूं जो मेरे कॉलेज के समय से थे। जब मैं अपने कॉलेज की खबर लगवाने आती थी वही हरीश चोपड़ा, वही परविन्द्र शारदा, वही उपेन्द्र, वही भूषण जैन को देख रही हूं। पंजाब केसरी जिसको अपना बना लेता है फिर कभी नहीं छोड़ता। इतनी सतर्क मुख्यमंत्री को सुनकर अच्छा लगा। क्योंकि अक्सर सत्ता में आने के बाद और कुर्सी मिलने के बाद लोग अपने पुराने साथियों और मित्रों को भूल जाते हैं। परन्तु उनके यह संस्कार और सभ्यता बता रही थी कि आज भी वही मुख्यमंत्री हैं जो जनता की सेवा के लिए बनी हैं और जिस तरह से उन्होंने बुजुर्गों से आशीर्वाद लिये वो आशीर्वाद तो जरूर लगेंगे और उनका भविष्य और भी उज्ज्वल होगा। स्व. शीला दीक्षित और स्व. सुषमा स्वराज जी के बाद यह तीसरी मुख्यमंत्री बनी, जो युवा, महिला और बड़े-बुजुर्गों के दिलों को छू रहीं हैं। अश्विनी जी एक नेक इंसान थे, जो हमेशा सबकी मदद के लिए तैयार रहते थे। उनकी पुण्यतिथि पर कोशिश रहती है कि जरूरतमंद लोगों की जितनी मदद की जाए उतनी कम है। उससे वो भी स्वर्ग में बैठे खुश होंगे। ऐसे नेक कार्य में बहुत से लोग जुड़ते हैं, क्योंकि ऐसे कार्यक्रम का निमंत्रण नहीं होता, सूचना होती है। जो दिल से चाहे वो स्वयं आए अपने हाथों से सेवा करे। क्योंकि जरूरतमंद बुजुर्गों के चेहरे पर जब मुस्कान-आती है तो सबको बहुत संतोष मिलता है। इस उम्र में बुजुर्गों को सहारे की बहुत जरूरत होती है। उनकी सेहत खराब होती है, आर्थिक रूप से बहुत कमजोर होते हैं, अपने भी साथ छोड़ देते हैं।
यह तो वो बुजुर्ग हैं, जिनको कोई पूछने वाला नहीं या जिनके घर में कोई नहीं था। घर के सदस्य हैं तो उन्हें खाने, पहनने के लिए नहीं मिलता या वो लोग हैं जिनके बच्चे हमारे पास आते हैं और कहते हैं कि महंगाई बहुत है, हम अपने माता-पिता को नहीं रख सकते। कोई ओल्ड होम का रास्ता बता दीजिए। कितनी विडम्बना है जिन मां-बाप ने सारी उम्र मेहनत करके उनको पाला, सारी जमा पूंजी भी लगा दी। आज उनके बच्चों के पास उनको खिलाने के लिए रोटी नहीं, दवाई के पैसे नहीं, उनको रखने के लिए उनके पास स्थान नहीं। तो ऐसे लोगों को हर महीने हम आर्थिक सहायता देते हैं। (जो कोरोना के बाद हर तीन महीने की इक_ी देते हैं) जो लोगों द्वारा सहायता के रूप में आती है। यही नहीं सम्पन्न लोगों द्वारा जरूरतमंद बुजुर्गों को एडोप्ट भी कराया जाता है। एडॉप्शन का मतलब है उनको घर नहीं लेकर जाना, उनकी दवाई और खाने का खर्च दो, ताकि वो अपने बच्चों के साथ रह सकें। एडॉप्शन 1000, 2000, 3000, 5000 महीना एक बुजुर्ग है। किसी ने अपनी क्षमता के अनुसार 1, 2, 10, 50 या 100 बुजुर्ग एडोप्ट किए हुए। ऐसे बूंद-बूंद से घड़ा भरता है। जो लोग इनकी सहायता के लिए आगे आते हैं उनको ढेरों आशीर्वाद मिलते हैं। हमारे पास एक तलवार परिवार जिनकी तीसरी पीढ़ी अपने दादा के साथ मिलकर सहायता करती है। ऐसे बहुत से लोग हैं जो सहायता के लिए आगे आते हैं। इस बार जिन्होंने सहयोग दिया उनका तहेदिल से धन्यवाद। पानीपत से घृतिका हरजाई, आजादपुर सब्जी मंडी के व्यापारी, रुबीना सैफी, शशि महाजन-कुलदीप सिंह विष्टï, रणदीप सिंह चण्डोक, रोटी बैंक के राजकुमार भाटिया, अजय-अनिल चौधरी, अशोक भाटिया, डॉ. सतीश चन्द्रा,लुधियाना से नविता जयरथ, लुधियाना से राम मौंगा, गोल्डी एम एम पाल सिंह, बीकानेर स्वीटस राजौरी गार्डन की चेयरपर्सन चंदा अग्रवाल, मारियो बिस्कुट की चेयरपर्सन निर्मल सिंघला, राजीव कश्यप, ममता-मनोज अरोड़ा, विनिता- एस के गुप्ता, मीना बंसल, ऊषा गुप्ता, पुष्पा मुप्ता, करुणा गोयल, ऊषा गोयल, अनिल भाई चूड़ीवाला, बीनू चौहान, रेखा ग्रोवर, चन्द्र कुमार तलवार, बजाज, घई, अरोड़ा की तरफ से बहुत आशीर्वाद। परिवार इन सबका तहेदिल से धन्यवाद।
जब बुजुर्ग अपनी मनपसंद का खाना खा रहे थे और थैले भर-भर कर सामान लेकर जा रहे थे बहुत ठंडी में कम्बल, स्वैटर, शाल, गर्म पानी की बोतलें, राशन, छडिय़ां, दर्द नाशक तेल तो जो उनके चेहरे पर खुशी थी, सुकून था वो देखने लायक था। मुझे लगता है इससे सच्ची श्रद्धांजलि हो ही नहीं सकती। जब अश्विनी जी जीवित थे वह बुजुर्गों को अपने हाथों से बांटते थे। इस बार उनके अनेक रूप थे उनके तीनों बेटे, तीनों बहुएं और दोनों पौत्र उनके रूप में सबकी सेवा कर रहे थे और बांट रहे थे। सबसे भावुक समय था जब उनका पौत्र आर्यवीर और आर्यन ने शुरू से लेकर अंत तक अपने हाथों से खाना खिलाया और अश्विनी जी की भांजी पानीपत से सेवा करने आई। मैं चाहती हूं हर परिवार, हर सम्पन्न परिवार आगे आए और बुजुर्गों की सेवा करके बच्चों में भी संस्कार दें। कार्यक्रम को सफल बनाने में सभी सहयोगियों, शाखाध्यक्षों का भरपूर योगदान रहा। सेवा समर्पण दिवस के मौके पर ब्ल्यूकार्डधारी सदस्यों की नेत्र सुरक्षा एवं बी.पी. जांच हुई। तारा संस्थान व डॉ.अशोक झिंगन की टीमों का विशेष योगदान रहा। जिसमें सैंकड़ों सदस्यों ने जांच कराके फ्री दवाईयां व चश्में लिए। इसके अलावा 9 बुजुर्ग जो मोतियांबिंद से ग्रस्त थे उनका नि:शुल्क ऑप्रेशन के लिए चयनित किये गए। सेवा परम धर्म है।

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