पवित्र रिश्ते चाहे वे प्रेम या वैवाहिक बंधनों से जुड़े हों, उनमें कत्ल की खबरें आजकल आम बातें हो गई हैं। चैनलों और मीडिया पर रिश्तों के तार-तार होने तथा हत्याओं की सुर्खियां उभरती हैं तो मन विचलित हो जाता है। पावन प्रेम और रिश्तों को सींच कर आगे बढ़ने की भारतीय संस्कृति कहां खो गई है तथा युवा पीढ़ी को क्या हो गया है, यह सवाल सोच कर मन बहुत दुखी है।
युवा पीढ़ी के बीच यह कैसी मानसिकता जन्म ले चुकी है जो शादी के पवित्र बंधन को तोड़कर कत्ल की राह पर चल निकली है। सिया द्वारा अपने मंगेतर को अपने ब्वाॅय फ्रैंड के साथ मिलकर पहाड़ी से धक्का देकर मार डालने के पीछे घिनौनी मानसिकता की वजह क्या है, इसका जवाब ढूंढना होगा। आज समाज में रिश्तों का महत्व लगातार कम होता दिखाई दे रहा है। प्रेम, विश्वास, सम्मान और परिवार जैसे मूल्यों पर स्वार्थ, लालच, क्रोध और क्षणिक आकर्षण हावी होते जा रहे हैं। हाल के वर्षों में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं जहां प्रेम संबंधों, अवैध संबंधों या व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण हत्या जैसी जघन्य घटनाएँ हुईं। जब कोई व्यक्ति अपने ही जीवनसाथी, मंगेतर या परिवार के सदस्य के साथ विश्वासघात करता है और अपराध का रास्ता अपनाता है, तो यह केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं होती, बल्कि मानवता, रिश्तों और संस्कारों की भी हत्या होती है। ऐसा लगता है कि परिवारों व समाज से संस्कार खत्म हो रहे हैं, ऐसी घटनाएँ समाज के लिए गंभीर चेतावनी हैं। आखिरकार हमारा समाज कहां जा रहा है। रिश्तों को लेकर हत्या जैसी घटनाएं यह प्रश्न खड़ा करती हैं कि युवा पीढ़ी मानवता, मर्यादाओं तथा नैतिकता को पांव तले रौंदकर आगे बढ़कर क्या सिद्ध करना चाहती है?
क्या आधुनिकता के नाम पर हम नैतिकता और संस्कारों को भूलते जा रहे हैं? क्या युवा पीढ़ी धैर्य, संयम और जिम्मेदारी का महत्व नहीं समझ रही? इन प्रश्नों पर गंभीर चिंतन आवश्यक है। रिश्ते टूट रहे हैं तथा यह समाज के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। मेरा मानना है कि भारतीय संस्कृति में रिश्तों को अत्यंत पवित्र माना गया है। विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन माना जाता है। जब कोई व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए ऐसे रिश्तों को तोड़ता है, तो उसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। बच्चों में असुरक्षा बढ़ती है, परिवार बिखरते हैं और समाज में अविश्वास का वातावरण बनता है।
सवाल पैदा होता है िक आखिरकार संस्कारों की कमी क्यों महसूस हो रही है?मैं अक्सर कहा करती हूं कि संस्कार मनुष्य को सही और गलत का ज्ञान कराते हैं। जब परिवार, की युवा पीढ़ी नैतिक शिक्षा को न समझे तो व्यक्ति गलत रास्ते पर भटक सकता है। यह भी देखा गया है माता-पिता और बच्चों के बीच खुलकर बातचीत कम हो गई है। मोबाइल और सोशल मीडिया का अत्यधिक प्रभाव होने लगा है तथा कई लोग वास्तविक जीवन से अधिक विलािसता की दुनिया में जीने लगे हैं। केवल मात्र धन और सुख-सुविधाओं को ही सफलता का मापदंड मान लिया गया है। यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है। युवा पीढ़ी रिश्तों की संवेदनशीलता को समझ नहीं रही तथा फिल्मी दुनिया की तर्ज पर कुछ भी कर डालने को तैयार है। मैं सामाजिक तौर पर यह बात डंके की चोट पर बताना चाहती हूं। कि केवल परिवार ही सबसे पहली पाठशाला है। माता-पिता को बच्चों में ईमानदारी, करुणा, संयम और जिम्मेदारी के संस्कार डालने चाहिए। बच्चों की भावनाओं को समझना और उनसे मित्रवत व्यवहार करना आवश्यक है। विद्यालयों और कॉलेजों में केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण पर भी जोर दिया जाना चाहिए। महापुरुषों के जीवन, भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों की शिक्षा दी जानी चाहिए।
नई पीढ़ी को इस शिक्षा की स्वीकार्यता की परख होनी भी जरूरी है। प्रशासनिक तौर पर हत्या और अन्य गंभीर अपराधों पर त्वरित और कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। जब अपराधियों को शीघ्र दंड मिलता है, तो समाज में डर और अनुशासन बना रहता है। इसके साथ ही सोशल मीडिया का उपयोग ज्ञान और सकारात्मकता के लिए होना चाहिए। परिवार और समाज को युवाओं को इसके सही उपयोग के प्रति जागरूक करना होगा।
यदि किसी रिश्ते में समस्या है, तो उसका समाधान बातचीत, परामर्श और कानूनी तरीके से किया जाना चाहिए। क्रोध में लिया गया निर्णय जीवन बर्बाद कर देता है। बच्चों को बहुत ज्यादा आजादी देना और कोई भी वह निर्णय खुद लेने की प्रवृत्ति से बचना भी चाहिए। परिणाम सबके सामने है कि किस प्रकार सिया व चेतन चौधरी ने केतन अग्रवाल की हत्या करके मानवता को शर्मसार किया। समाज केवल तमाशबीन बनकर नहीं रह सकता। हमें सामूहिक रूप से नैतिक वातावरण बनाना होगा। धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को लोगों में अच्छे संस्कारों का प्रचार करना चाहिए।
हमारी संस्कृति “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश देती है। यहां रिश्तों को निभाना सिखाया जाता है, तोड़ना नहीं। यदि हम अपने बच्चों को प्रेम, सम्मान और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाएँगे, तो समाज अधिक सुरक्षित और संस्कारित बनेगा। हत्या, विश्वासघात और रिश्तों का टूटना किसी भी सभ्य समाज के लिए दुखद स्थिति है। ऐसी घटनाएँ हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि हमें अपने मूल्यों और संस्कारों की ओर लौटना होगा। आधुनिकता आवश्यक है, लेकिन नैतिकता उससे भी अधिक आवश्यक है। मैं यही कहूंगी कि हर व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि जीवन अनमोल है और किसी भी परिस्थिति में हिंसा स्वीकार्य नहीं हो सकती। परिवार, विद्यालय, समाज और सरकार यदि मिलकर कार्य करें, तो ऐसे अपराधों को काफी हद तक रोका जा सकता है। मानवता, नैतिकता तथा संस्कार हर सूरत में जीवित रहने चाहिए, तभी समाज सुरक्षित रहते हुए आदर्श का उदाहरण बन सकता है। जीवन चलने का ही नहीं खूबसूरती से जीने का भी दूसरा नाम है। भारत की संस्कृति सच्चे प्रेम, तथा श्रीकृष्ण के पवित्र प्रेम व श्रीराम की मर्यादाओं से पाल पोस कर आगे बढ़ी है तथा इसे बचाना हम सबका कर्त्तव्य है।
तार-तार होते रिश्ते
Summary :
पवित्र रिश्ते चाहे वे प्रेम या वैवाहिक बंधनों से जुड़े हों, उनमें कत्ल की खबरें आजकल आम बातें हो गई हैं। चैनलों और मीडिया पर रिश्तों के तार-तार होने तथा हत्याओं की सुर्खियां उभरती हैं तो मन विचलित हो जाता है। पावन प्रेम और रिश्तों को सींच कर आगे बढ़ने की भारतीय संस्कृति कहां खो गई है तथा युवा पीढ़ी को क्या हो गया है, यह सवाल सोच कर मन बहुत दुखी है। युवा पीढ़ी के बीच यह कैसी मानसिकता जन्म ले चुकी है जो शादी के पवित्र बंधन को तोड़कर कत्ल की राह पर चल निकली है। सिया द्वारा…


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