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रेपो रेट का स्थिर रहना

वर्ष 2024 में आरबीआई की पहली मॉनेटरी पॉलिसी मीटिंग के नतीजे सामने आ चुके हैं। रिजर्व बैंक ने लगातार 6वीं बार रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया है। रेपो रेट को एक बार फिर 6.5 प्रतिशत पर बरकरार रखा गया है। आमतौर पर देखा जाता है कि जब रेपो रेट बढ़ता है तो ऋण महंगे हो जाते हैं और फिक्स डिपोजिट पर बैंक की ओर से बेहतर ब्याज दरों की पेशकश की जाती है। रेपो रेट में बदलाव न होने से ईएमआई नहीं बढ़ेगी। यह ऋणदाताओं के लिए राहत भरी खबर है।
अर्थशा​िस्त्रयों का अनुमान है कि आने वाले समय में रेपो रेट को घटाया जा सकता है। रेपो रेट घटने के बाद बैंकों में एफडी की बेहतर ब्याज दरों का कितना फायदा मिलेगा, इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता। मौजूदा समय को एफडी में निवेश करने के लिहाज से काफी अच्छा समझा जा रहा है। इस समय ज्यादातर बैंकों में एफडी के ब्याज उच्चतम स्तर पर हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की तरफ से आखिरी बार पिछले साल फरवरी में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ौतरी की गई थी। उस वक्त रेपो रेट को 6.25 फीसदी से बढ़ाकर 6.50 फीसदी किया गया था।
रिजर्व बैंक रेपो दर को इसलिए स्थिर रखा गया है क्योंकि एमपीसी का इरादा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रा स्फीति की दर को टिकाऊ ढंग से 4 फीसदी के अनिवार्य लक्ष्य के करीब रखने का है। मुद्रा स्फीति की दर काफी समय से तय लक्ष्य से ऊपर बनी रही है। रिजर्व बैंक की नजर महंगाई पर बनी रहती है। पिछले वर्ष अक्तूबर में मुद्रा स्फीति की दर 4.9 फीसदी के स्तर तक नीचे आने के बाद दिसम्बर में यह दोबारा 5.7 फीसदी हो गई थी।
एमपीसी का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में हेडलाइन मुद्रास्फीति औसतन 5.4 फीसदी रहेगी। हालांकि उसका यह भी अनुमान है कि 2024-25 में इस दर में कमी आएगी और यह औसतन 4.5 फीसदी रह सकती है जो लक्ष्य के करीब होगी। इस अनुमान को दो स्रोतों से खतरा हो सकता है। पहला है खाद्य कीमत। हालांकि रबी सत्र की बोआई में सुधार हुआ है लेकिन प्रतिकूल मौसम और जलाशयों का कम जल स्तर निकट भविष्य में उत्पादन पर असर डाल सकते हैं। दूसरी बात, लाल सागर क्षेत्र में इस समय उथल-पुथल के हालात हैं और पश्चिम एशिया में भूराजनीतिक तनाव की स्थिति है। यह आपूर्ति शृंखला को बाधित कर सकता है और कीमतों पर दबाव बना सकता है। इन जोखिमों के अलावा केंद्रीय बैंक काफी सहज स्थिति में नजर आ रहा है। चालू चक्र में दरों में 250 आधार अंकों की समेकित वृद्धि हुई और उसका असर व्यवस्था में अभी भी दिख रहा है जिससे मुद्रास्फीति में कमी लाने में मदद मिलनी चाहिए। रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति के लक्ष्यों को पाने के लिए नकदी के हालात का भी प्रबंधन कर रहा है।
आरबीआई ने जीडीपी ग्रोथ 7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। जबकि इससे पहले चालू वित्त वर्ष में जीडीपी 7.3 फीसदी की वृद्धि अनुमानित थी। मौद्रिक नीति समिति ने मुद्रा स्फीति को काबू रखने के ​िलए और आर्थिक वृद्धि को गति देने के ​िलए उदार रुख को वापिस लेने का रवैया बरकरार रखा है। आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार इस वर्ष भी बढ़ने की उम्मीद है। यह राहत की बात है कि भारत का वित्तीय क्षेत्र बहुत मजबूत है। बैंकों और एनबीएफसी के प्रदर्शन व आंकड़े मजबूत हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मांग में तेजी जारी है और शहरी खपत मजबूत बनी हुई है। अक्तूबर, दिसम्बर तिमाही में भारत का सेवा निर्यात मजबूत रहा है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 622.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो सभी विदेशी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। कुल मिलाकर भारतीय अर्थव्यवस्था आत्मविश्वास से भरी प्रगति कर रही है। आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने पेटीएम पेमैंट्स बैंक पर कार्रवाई करने के बारे में भी स्पष्ट कर दिया है कि उस पर 29 फरवरी के बाद जमा लेने या अन्य तरह के लेन-देन करने से भी इसलिए रोका गया है क्योंकि उसने निया​मकीय अनिवार्यताओं का पालन नहीं किया।

आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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