हिंसा का प्रतिकार

Summary :

पश्चिम बंगाल की राजनीति का रक्तचरित्र आजादी के बाद से ही लोगों ने देखा। जहां हिंसा ही सत्ता का संस्कार बना और सियासत खून से सनी हुई। सत्ता जरूर बदलती रही लेकिन सियासत का रक्तचरित्र नहीं बदला। पहले कम्युनिस्टों ने पश्चिम बंगाल में सत्ता संभाली। तब से ही क्रूर वर्ग संघर्ष और वर्ग शत्रुओं के विनाश की वकालत के साथ कम्युनिस्टों ने राजनीतिक हिंसा की संस्कृति को जन्म दिया। कम्युनिस्टों के लम्बे शासन के बाद शासन तृणमूल की नेता ममता बनर्जी के हाथ में आया लेकिन राजनीतिक हिंसा का सिलसिला बंद नहीं हुआ। आजादी के बाद के शुरूआती दशकों में…

पश्चिम बंगाल की राजनीति का रक्तचरित्र आजादी के बाद से ही लोगों ने देखा। जहां हिंसा ही सत्ता का संस्कार बना और सियासत खून से सनी हुई। सत्ता जरूर बदलती रही लेकिन सियासत का रक्तचरित्र नहीं बदला। पहले कम्युनिस्टों ने पश्चिम बंगाल में सत्ता संभाली। तब से ही क्रूर वर्ग संघर्ष और वर्ग शत्रुओं के विनाश की वकालत के साथ कम्युनिस्टों ने राजनीतिक हिंसा की संस्कृति को जन्म दिया।

कम्युनिस्टों के लम्बे शासन के बाद शासन तृणमूल की नेता ममता बनर्जी के हाथ में आया लेकिन राजनीतिक हिंसा का सिलसिला बंद नहीं हुआ। आजादी के बाद के शुरूआती दशकों में सियासी हिंसा की जद में सत्ता पक्ष की विपक्ष की आवाज को निर्ममता से दबाने की रणनीति थी। 34 वर्ष के वामपंथी शासन के अंत के बाद लोगों को उम्मीद थी कि मां, माटी और मानुष के नारे पर सत्ता में आई तृणमूल की सरकार परिवर्तन लाएगी लेकिन सिंडिकेट राज ने अपनी जड़ें और मजबूत बना लीं और इलाकों पर अधिपत्य जमाने की मानसिकता पनपती गई और हजारों लोग राजनीतिक हिंसा का शिकार होते गए।

पश्चिम बंगाल में पहली बार भाजपा की शुभेन्दु अधिकारी के नेतृत्व में बनी सरकार के बाद यह सवाल सबके सामने है कि क्या राज्य की राजनी​ति में बलव आएगा। शुभेन्दु अधिकारी के सत्ता में आने के बाद बदले हुए सियासी घटनाक्रम में उम्मीदें तो काफी हैं लेकिन ऐसा दिखाई पड़ता है कि राज्य में बदलाव नहीं, बदले का दौर शुरू हो चुका है। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी स्पष्ट किया था कि यह समय बदले का नहीं बदलाव का है जिसका उद्देश्य राजनीतिक हिंसा को समाप्त कर राज्य में विकास, सुरक्षा और सुशासन का नया दौर शुरू करना है लेकिन जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस के नेताओं पर हमले और विरोध देखा जा रहा है उससे बदले का नया दौर शुरू होने के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं।

पश्चिम बंगाल विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष आशीष बनर्जी द्वारा पार्टी कार्यालय में की गई आत्महत्या को लेकर कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। आशीष बनर्जी रामपुर हाट सीट से पांच बार विधायक चुने गए थे जब ममता बनर्जी के नेतृत्व में पहली बार टीएमसी सरकार बनी तब वह राज्य में कृषि मंत्री बने थे और बाद में वह ​विधानसभा के डिप्टी स्पीकर भी बने। सुसाइड नोट में 70 वर्षीय आशीष बनर्जी ने लिखा है कि राजनीति में आना उनकी सबसे बड़ी भूल थी। पूर्व टीएमसी विधायक ने यह भी लिखा कि वह कभी किसी भ्रष्टाचार में शामिल नहीं थे और उनकी छवि खराब करने की कोशिश की गई। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने में नाकाम रहे।

उनकी मौत के बाद यह सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या उन पर लगाए गए कथित भ्रष्टाचार के आरोपों और राजनीतिक दबाव को लेकर उन्होंने मौत को गले लगाया? जनसेवा के उनके लम्बे रिकार्ड के बावजूद उन्हें जिस उत्पीड़न और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा उससे राजनीतिक दुश्मनी की मानवीय कीमत पर विचार जरूर करना होगा। तृृणमूल कांग्रेस के दो फाड़ होने के बाद बागी गुट के नेताओं और सत्तारूढ़ दल के समर्थकों ने टीएमसी के नेताओं का सड़कों पर विरोध करना शुरू किया।

उन पर पत्थर, अंडे और हमले शुरू ​किए। उससे राजनीतिक वातावरण विषाक्त हो रहा है। आशीष बनर्जी हमेशा सार्वजनिक जीवन में शुचिता और सदगी के लिए जाने जाते थे। वह वीरभूमि के सबसे ईमानदार और शिक्षित नेताओं में से माने जाते थे। राजनीति में आने से पहले उन्होंने लम्बे समय तक पढ़ाया है। उन्होंने कई छात्रों को मुफ्त में पढ़ाया और उनसे करीबी रिश्ता रखा। उन्होंने चिट्ठी में बार-बार कहा कि वह किसी भी तरह के भ्रष्टाचार में शामिल नहीं थे –चाहे वह नौकरी, पैसे या रिश्वत लेने का मामला हो।

उन्होंने कभी पैसे के बदले कोई फायदा पहुंचाने का वादा नहीं किया। हालांकि, अपने राजनीतिक करियर के दौरान वह कई लोगों के संपर्क में रहे लेकिन उन्होंने कभी पैसे के लिए कोई काम नहीं किया। कॉलेज में पढ़ाते समय भी उन्होंने कभी किसी अनुचित सुविधा का फायदा नहीं उठाया। अपने परिवार के लिए लिखे आखिरी खत में उन्होंने लिखा कि राजनीति में आना एक गलती थी और वह राजनीतिक बदले की भावना का शिकार हो गए थे। उन्होंने अपने परिवार वालों से कहा कि वे कभी राजनीति में न आएं और भाइयों के बीच मजबूत रिश्ते बनाए रखने पर जोर दिया जिससे पता चलता है कि परिवार में कोई झगड़ा नहीं था।

चिट्ठी के आखिर में उन्होंने लिखा कि उनकी मौत के लिए किसी को भी जिम्मेदार न ठहराया जाए। कभी इस देश में राजनीतिज्ञों का बहुत सम्मान था। उनका एक-एक शब्द सुनने के लिए बाजार थम जाते थे लेकिन वर्तमान में राजनीतिज्ञों को भ्रष्टाचार और घोटालों का प्रायः मान लिया गया है। राजनीति में कुछ ऐसे लोग अभी भी हैं जो जीवनभर भ्रष्टाचार से दूर रहे हैं लेकिन समस्या यह है कि भारतीय लोकतंत्र में जनमानस से लेकर संवैधानिक संस्थानों तक हर जगह भ्रष्टाचार का बोलबाला है।

कहते हैं भ्रष्टाचार के चक्रव्यूह में फंसकर ईमानदार भी भ्रष्ट हो जाता है या फिर वह खामोश हो जाता है। राजनीति में विरोध राजनीतिक होना चाहिए न कि चरित्र हनन की हद तक पहुंचने वाला विरोध होना चाहिए। आशीष बनर्जी की आत्महत्या भ्रष्टाचार के चक्रव्यूह में फंसे एक ईमानदार अभिमन्यु की मौत का प्रतीक है। ऐसी स्थिति में तो देश की युवा पीढ़ी राजनीति में आने से खौफ खाने लगेगी। ऐसी हिंसा की राजनीति का प्रतिकार करना बहुत जरूरी है अन्यथा ईमानदार लोग राज​नीति से अलग-थलग हो जाएंगे।

Aditya Chopra

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