सांप ने नहीं, सिस्टम में घुसे सांपों ने डंसा है

Summary :

गढ़चिरोली के धानोरा तालुका में स्थित जपतलाई आवासीय आश्रम स्कूल में सांप के डंसने से तीन बच्चियों की मौत से मन बुरी तरह आहत था कि एक खौफनाक जानकारी से दिल दहल गया है। जानकारी यह है कि प्रगत प्रांत कहे जाने वाले महाराष्ट्र की आश्रमशालाओं में दो साल के भीतर 584 विद्यार्थियों की मौत हुई है, विश्वास नहीं होता लेकिन ये आदिवासी विकास विभाग के ही आंकड़े हैं। जब कोई विदेशी हमारे देश को सपेरों और मदारियों का देश कहकर टिप्पणी करता है तो मेरा खून खौलता है लेकिन जब हालात ऐसे हों तो खून भी खौलता है और…

गढ़चिरोली के धानोरा तालुका में स्थित जपतलाई आवासीय आश्रम स्कूल में सांप के डंसने से तीन बच्चियों की मौत से मन बुरी तरह आहत था कि एक खौफनाक जानकारी से दिल दहल गया है। जानकारी यह है कि प्रगत प्रांत कहे जाने वाले महाराष्ट्र की आश्रमशालाओं में दो साल के भीतर 584 विद्यार्थियों की मौत हुई है, विश्वास नहीं होता लेकिन ये आदिवासी विकास विभाग के ही आंकड़े हैं।

जब कोई विदेशी हमारे देश को सपेरों और मदारियों का देश कहकर टिप्पणी करता है तो मेरा खून खौलता है लेकिन जब हालात ऐसे हों तो खून भी खौलता है और मन चीखता भी है। गढ़चिरोली के धानोरा तालुका में स्थित जपतलाई आवासीय आश्रमशाला में सांप के डंसने से तीन बच्चियों की मौत के बाद बाकी आश्रमशालाओं की छानबीन शुरू हुई तो ये खौफनाक आंकड़ा सामने आया। 384 विद्यार्थियों की मौत सरकारी आश्रमशालाओं में हुई तो 200 विद्यार्थियों की मौत अनुदानित आश्रमशालाओं में हुई है। इनमें 273 विद्यार्थियों की जान इलाज के अभाव या गंभीर बीमारियों के कारण गई है।

मगर उससे ज्यादा हृदयविदारक यह है कि 55 विद्यार्थियों ने खुदकुशी की है और सांप डंसने का मामला तो दिल दहलाने वाला है ही! पिछले दो वर्षों में 28 विद्यार्थियों की जान जहरीले सांपों के काटने से गई है। इनमें 22 बच्चे सरकारी आश्रमशालाओं के थे और छह अनुदानित आश्रमशालाओं के। यानी गुनाहों में सब शामिल हैं, वो सब गरीब आदिवासी बच्चे थे और उन्होंने भविष्य का एक सुनहरा सपना देखा होगा। उस सुनहरे सपने में माता-पिता भी सहभागी रहे होंगे लेकिन सारे सपने अधूरे रह गए।

मेरा मानना है कि विद्यार्थियों को सांपों ने नहीं बल्कि व्यवस्था में कुंडली मार कर बैठे सांपों ने डंसा है, गढ़चिरोली का मामला देखें तो जब सांप आश्रमशाला में घुसा तो वहां 70 से ज्यादा बच्चियां फर्श पर सो रही थीं, क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी आश्रमशाला में बच्चों को जमीन पर सुलाया जाए ? और वह भी तब जब उस आश्रमशाला को सरकार अनुदान दे रही हो और संचालन ऐसे व्यक्ति की संस्था के पास हो जो खुद मंत्री रह चुका हो, सांसद रह चुका हो।

संचालन पूर्व सांसद और पूर्व मंत्री मारोतराव कोवासे का चैरिटेबल ट्रस्ट कुपरलिंगो एजुकेशनल एंड कल्चरल डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट कर रहा था। अरे हां, कितना जोरदार नाम है ना! आदिवासी आश्रमशाला का ऐसा रंगीन नाम रखा है जैसे कि सारी दुनिया के विद्यार्थी यहां पढ़ रहे हों। और हां, इस बात पर भी ध्यान दीजिए कि अधिकारी भले ही किसी और समाज के हों लेकिन आदिवासियों के विकास के लिए संचालित होने वाली संस्थाएं उसी समाज से आने वाले नेतृत्वकर्ताओं को इसलिए दी जाती हैं क्योंकि वे अपने समाज का दर्द समझते हैं। मगर यहां तो अधिकारी और राजनीतिज्ञों की मिलीभगत से बंदरबांट हो रहा है।

इन नेतृत्वकर्ताओं और अधिकारियों को अपने बच्चों का भविष्य बनाने की तो खूब चिंता रहती है, अपने बच्चों को अंबानी-अडानी बनाना चाहते हैं लेकिन वे यह नहीं सोचते कि आदिवासियों के बच्चों को भी सपना देखने का हक है, वे क्या सोचते हैं? वे सोचते हैं कि आदिवासियों के हकों का पैसा मार कर अपने बच्चों का भविष्य बनाएं! शर्म भी नहीं आती इन्हें। गद्दारी कर रहे हैं ये। यही कारण है कि विभिन्न योजनाओं के माध्यम से हजारों-हजार करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में हालात खराब हैं।

गढ़चिरोली, नंदुरबार, मेलघाट हो या फिर पालघर या रायगढ़ का आदिवासी इलाका, हर जगह बंदरबांट चल रही है। व्यवस्था में नाग की तरह बैठे लोग बच्चों का भोजन तक हजम कर जाते हैं, दाल के नाम पर पानी परोसा जाता है। सवाल है कि डर कहां चला गया? गढ़चिरोली की घटना के बाद पुलिस ने ट्रस्ट के अध्यक्ष मारोतराव कोवासे, उनके सचिव, स्कूल के प्रिंसिपल और दो वार्डन के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया है, उन्हें निलंबित किया गया है लेकिन पुराने मामले बताते हैं कि निलंबन आखिर एक दिन खत्म हो जाता है।

मुख्यमंत्री जी आप सख्त से सख्त ऑडिट कराइए और कितना भी बड़ा आदमी हो, उस पर एक्शन लीजिए, घटना होने के बाद हम लोग एक्शन लेते हैं, मगर अभी तो आपको पता चल गया है कि ग्रामीण इलाकों में आश्रमशालाएं कैसे चलती हैं? अस्पताल कैसे चलते हैं, इनका ऑडिट करवाइए, जिन्हें हक देना चाहते हैं, उन्हें हक नहीं मिल रहा है तो यह तो घोटालेबाजों का घोर पाप है, जो आदिवासियों का हक मार रहे हैं वे पापी हैं, समाज का खून चूसकर पैसा कमाने वालों को और क्या कहूं? मुख्यमंत्री जी चाहे कुछ भी हो जाए यह सब रोकना होगा।

पूरे सिस्टम को साफ करना होगा, ये वो लोग हैं जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत अभियान के बीच बाधा बने हुए हैं, इन्हें रास्ते से हटाइए। हंगामा है क्यों बरपा? विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक को लेकर पिछले सप्ताह हंगामा बरपा था, अंततः सरकार ने इस विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया, महत्वपूर्ण सवाल है कि हंगामा क्यों बरपा? आंकड़े बताते हैं कि भारत के एनजीओ को हर साल औसतन 18,580 करोड़ रु. का विदेशी चंदा मिलता है, इनमें सबसे ज्यादा चंदा अमेरिका देता है, फिर ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों का नंबर आता है, चंदे को लेकर सरकार के अपने कंसर्न हैं और उसे लगता है कि पारदर्शिता जरूरी है क्योंकि कुछ एनजीओ चंदे का दुरुपयोग करते हैं।

एनजीओ को लग रहा है कि सरकार नकेल कस रही है, एक अमेरिकी सांसद राइली मूर को लगता है कि यदि यह बिल पास हो गया तो भारत में ईसाई संगठनों को बहुत दिक्कत होगी, अब जेपीसी बताएगी कि किसकी चिंता कितनी वाजिब है, इंतजार कीजिए।

विजय दर्डा