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रामनवमी पर भी दंगे!

भगवान राम के जन्म या प्राकटयोत्सव महोत्सव पर जिस प्रकार की हिंसा देश के कुछ स्थानों पर देखने में आयी है वास्तव में वह राम की मर्यादा का मर्दन करने के समान ही देखी जायेगी क्योंकि राम भारत का ऐसा शब्द है जिसमें समस्त ब्रह्मांड का सत्य समाया हुआ है

भगवान राम के जन्म या प्राकटयोत्सव महोत्सव पर जिस प्रकार की हिंसा देश के कुछ स्थानों पर देखने में आयी है वास्तव में वह राम की मर्यादा का मर्दन करने के समान ही देखी जायेगी क्योंकि राम भारत का ऐसा शब्द है जिसमें समस्त ब्रह्मांड का सत्य समाया हुआ है और यह अर्थ है प्रसन्नता, आनन्द, उत्साह व हर्ष । अतः राम के साकार स्वरूप के उपासकों के लिए भी यह आवश्यक है कि वे अपने इष्ट देव के जन्म दिवस को मनाते समय उनकी दिव्यता में किसी भी प्रकार के हिंसक अस्त्रों के प्रदर्शन से दूर रहें बल्कि पूरी तरह परहेज रखें। हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार राम के रूप में भगवान विष्णु का सातवां मनुज अवतार था जो धरती से अन्याय व अधर्म व पाप को समाप्त करने के लिए हुआ था। अतः हिंसक हथियारों का प्रदर्शन उनके जन्म दिवस के अवसर पर करने वाले लोग राम नाम की मर्यादा पर ही बट्टा लगाने का काम करते हैं और यदि सीधे शब्दों में लिखा जाये तो राम नाम को बदनाम करते हैं। वास्तव में भारत के लिए राम शब्द मजहब से ऊपर सांस्कृतिक शब्द है जो इस देश की लोकधारा में समाया हुआ है और यह लोकधारी आपसी भाईचारे, प्रेम व सौहार्द की है। यदि एेसा न होता तो किस प्रकार राम नाम का जाप साकार आराधना करने वालों के अलावा निराकार ब्रह्म के उपासकों की जिव्हा पर भी रहता। राम को तभी मर्यादाहीन बना दिया जाता है जब उनके नाम पर द्वेष या घृणा अथवा नफरत को फैलाने का उपक्रम किसी भी वर्ग या समुदाय द्वारा किया जाता है। 
भारत तो विभिन्न संस्कृतियों व मान्यताओं के समागम का देश है और ऐसा देश है जिसमें इस्लाम के ‘हजरत इमाम हुसैन’ की शहादत को नमन करने वाले ‘हुसैनी ब्राह्मण’ भी रहते हैं।  आजकल रमजान का महीना चल रहा है और इस दौरान इसी ब्राह्मण समुदाय के लोग भी शिया मुसलमानों की तरह अपने अलग से ‘ताजिये’ निकालेंगे। रामनवमी के जुलूस की तुलना कुछ लोग मुहर्रम के जुलूसों से जिस तरह कर रहे हैं उन्हें न तो हिन्दू संस्कृति के बारे में कुछ ज्ञान है और न वे ईश्वर के मनुज अवतारों की लीला के बारे में कुछ जानते हैं। ईश्वर का अवतार युग धर्म (समयकालीन कर्त्तव्य) की स्थापना के लिए ही होता है। भगवान राम ने एक राजा के घर में जन्म लिया मगर रावण को परास्त करने के लिए उन्होंने राजसी सेना का सहारा नहीं लिया बल्कि जनशक्ति या जन-सेना का साथ लिया। जिन्होंने महाकवि निराला का ‘राम की शक्ति पूजा’ काव्य पढ़ा है वे भली-भांति जानते होंगे कि राम ने रावण को परास्त करने के लिए जन चेतना मूलक उपायों को ही अपनाया। राम की यही सबसे बड़ी शक्ति थी जिसके भरोसे उन्होंने रथ पर सवार महासंग्रामी रावण की सेना का मुकाबला युद्ध भूमि में विरथी अर्थात पैदल रहते हुए ही किया। गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा कि ‘रावण रथी विरथी रघुबीरा’। सन्त कबीर दास जो निराकार ब्रह्म के उपासक थे और पंडितों व महन्तों के कर्मकांड को पाखंड मानते थे उन्हें भी उनके गुरु स्वामी रामानन्द ने  ‘राम’  नाम का ही उपदेश दिया और उन्होंने तब जाकर लिखा कि 
‘‘पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ भया न पंडित कोय
ढाई आखर प्रेम का पढ़ै सो पंडित होय।’’
अतः हमें सर्वप्रथम राम की मर्यादा का ही ध्यान रखना चाहिए और रामनवमी जैसे पवित्र पर्व को मनाते समय हिंसक अस्त्रों का प्रदर्शन कदापि नहीं करना चाहिए। क्योंकि राम की रावण पर विजय जनोत्साह का कारक थी और जिस शब्द का अर्थ ही प्रेम है वह किसी भी अन्य समुदाय के प्रति किस प्रकार द्वेष पैदा करने का कारण बन सकता है। राम शब्द तो भारत में गिले- शिकवे दूर करने का माध्यम रहा है परन्तु इस शब्द पर किसी एक ही वर्ग या समुदाय का एकाधिकार भी कभी नहीं हो सकता है क्योंकि निराकार ब्रह्म के उपासक हिन्दू भी राम को निराकार ब्रह्म के रूप में स्वीकारते हैं। वे मूर्तिपूजक बेशक न हों मगर राम की महत्ता को स्वीकार करते हैं और मानते हैं कि राम नाम ही संसार में आनन्द और प्रसन्नता देने वाला है। राम का उत्तेजना से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि साकार रूप में भी भगवान राम राजा दशरथ के पुत्र के रूप में शालीनता और सौम्यता की प्रतिमूर्ति बने रहे जबकि उनका विरोधी रावण महाज्ञानी होने के बावजूद क्रूरता और घमंड का प्रतीक बना रहा।
 भारत के लोग भली-भांति जानते हैं कि जब भी राम का नाम लिया जाता है तो उससे सौम्यता व विनय की प्रतिध्वनि ही निकलती है मगर उनके नाम पर दंगा करके हम स्वयं को राम से विमुख कर लेते हैं और उनके नाम को ही बदनाम कर डालते हैं। क्या कारण हो सकता है कि रामनवमी पर कोलकाता के उपनगर हावड़ा में रामनवमी के अवसर पर निकाले गये जुलूस में बन्दूकों और तलवारों का प्रदर्शन किया जाये और बड़ोदरा में दूसरे समुदाय को उकसाने वाले नारे लगाये जायें या सम्भाजी नगर (औरंगाबाद) में भी उत्तेजना पैदा करने वाला कार्य किया जाये। क्या एेसा करने से ही हम स्वयं को हिन्दू साबित कर देंगे? हर हिन्दू सबसे पहले भारतीय है और भारत की एकता उसका परम धर्म है। यही नियम मुस्लिम समाज के लोगों पर भी लागू होता है। क्योंकि मजहब हमारा निजी मामला है। कोई नागरिक नास्तिक भी हो सकता है मगर एेसा होने से उसके संवैधानिक अधिकार कम नहीं हो जाते। हम उस देश में रहते हैं जिसकी मान्यता के अनुसार ब्रह्म एक है मगर उसे पाने के रास्ते हजार हैं। अतः राम के नाम पर घृणा फैलाने वालों को राम ही क्षमा करें अतः उन्हें अपने कर्मों की माफी भी राम से ही मांगनी चाहिए जैसा सिखों के दूसरे गुरु रामदास जी महाराज ने कहा है, 
‘‘मेरे राम एह नीच करम हर मेरे 
गुणवन्ता हर-हर दयाल , 
कर किरपा, बखश अवगुण सब मेरे।’’

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