‘हर सफर से जुदा क्यों है ये सफर मुहब्बतों का
मंजिलें खामोश हैं यहां पर बड़ा शोर है रास्तों का….’
शेक्सपीयर होते तो उनके अहम पात्र के मुंह से शायद पहला संवाद यही सुनने को मिलता। आप से सबसे हैरान करने वाली रुखसती संदीप पाठक की रही। पंजाब की आप सरकार में कभी इनकी तूती बोलती थी। इन्हें आम आदमी पार्टी का ‘चाणक्य’ कहा जाता था, यह केजरीवाल को उतने ही प्यारे थे। पंजाब में आप को सत्ता दिलाने में इनकी एक महती भूमिका मानी जाती है। इनका कार्यकर्ताओं के संग संयोजन, इनका बूथ लेवल मैनेजमेंट और जमीनी स्तर तक के इनके चुनावी आंकड़ों को खंगालने की बाजीिगरी की आप शीर्ष भी कायल रहा है। अब अगर यह भाजपा में गए हैं तो अपने साथ आप की ढेरों अहम जानकारियां भी साथ ले गए हैं। भाजपा भी पंजाब में इनके बूथ मैनेजमेंट कौशल का लाभ लेना चाहेगी, इनके पास वोटरों के भी जबर्दस्त विश्लेषणात्मक आंकड़े हैं जो किसी भी दल को वहां चुनावी रणनीति बनाने में मदद कर सकते है। यह शिक्षाविद से राजनेता बने हैं और अप्रैल 2022 को पंजाब से आप के राज्यसभा सांसद चुने गए थे। संदीप आईआईटी दिल्ली में सहायक प्रोफेसर और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और एनआईटी में शोध सहयोगी रह चुके हैं। इनकी पढ़ाई-लिखाई कैंब्रिज से हुई है। रही बात अशोक मित्तल की तो पार्टी ने हाल में ही उन्हें राघव चड्ढा की जगह राज्यसभा में अपना उप नेता बनाया था। मित्तल लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के संस्थापक व कुलाधिपति भी हैं। पिछले कुछ समय से ये जिस तरह ईडी के रडार पर थे और इनके अलग-अलग प्रतिष्ठानों पर जिस तरह धड़ाधड़ ईडी के छापे पड़ रहे थे, उसने मित्तल को घुटनों पर ला दिया। रही बात क्रिकेटर हरभजन सिंह की तो वे पंजाब के सीएम भगवंत मान के अत्यधिक प्रिय थे, इन्हें राज्यसभा में भेजने में मान की एक प्रमुख भूमिका रही है। पर सूत्रों का मानना है कि पिछले दिनों जिस तरह से हरभजन की पत्नी की तरफ का रिश्तेदार एनआईए के निशाने पर आ गया, उसने इस पूर्व फिरकी गेंदबाज को ‘नो बॉल’ डालने पर मजबूर कर दिया। ट्राईडेंट समूह के मालिक राजेंद्र गुप्ता विशुद्ध रूप से एक कारोबारी हैं, जिनका एक्सपोर्ट कारोबार में एक बड़ा दखल है, सो एक बिजनेसमैन की तरह इन्होंने आप की जगह भाजपा का चुनाव आसानी से कर लिया।
क्या मान भी करेंगे हैरान?
बहुत सियासी शोर बरपा है कि अगर भाजपा पंजाब में आप के 62 विधायक तोड़ने में सफल हो जाती है तो फिर यह खेल दल-बदल कानून की परिधि से बाहर का हो जाएगा। सनद रहे कि पंजाब विधानसभा में कुल 117 विधायक हैं, जिसमें आप के 92 तो भाजपा के महज़ दो ही विधायक हैं। पर भाजपा के लिए यह खेल इतना आसान नहीं होगा, एक तो भगवंत मान ने अपने विधायकों पर चौकसी बढ़ा दी है। दूसरा अपनी हर मीटिंग में अपने विधायकों से कमोबेश यही बात कहते हैं कि ’पंजाब में अभी भाजपा का कोई भविष्य नहीं, सिख समुदाय वैसे भी भाजपा को पंसद नहीं करता, सो ऐसे में जो भी भाजपा के साथ जाएगा राजनैतिक रूप से उसका सफाया हो जाएगा।’ वहीं भाजपा के रणनीतिकार भी इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि अगर भाजपा आप तोड़ कर पंजाब में सरकार भी बना लेती है तो पंजाब के लोगों में इसका क्या संदेश जाएगा, क्योंकि अगले ही वर्ष पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं। वैसे भी इस हालिया टूट का पंजाब विधानसभा चुनाव पर कोई खास असर पड़ने वाला नहीं है, क्योंकि भाजपा की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि पंजाब में उसके पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है, भाजपा ने एक बार मन बनाया था कि वह फिर नवजोत सिंह सिद्धू को साथ ले लें, पर वह सिद्धू और उनकी पत्नी के बड़बोलेपन से परेशान हैं। अगर आने वाले चुनाव में पंजाब में चारकोणीय (कांग्रेस-आप-अकाली-भाजपा) लड़ाई होती है तब भी इसका बड़ा फायदा कांग्रेस व आप को ही मिलता दिख रहा है, क्योंकि अभी भी भाजपा पंजाब में हिंदुओं की पहली पसंद की पार्टी नहीं बन पाई है, यह स्पेस वहां कांग्रेस व आप ने भर दिया है। यही वज़ह है कि अब पंजाब में कुछ करने से पहले भाजपा को सौ बार सोचना होगा।
पहले फेज की बंपर वोटिंग से किसका फायदा?
पश्चिम बंगाल में पहले चरण के 152 सीटों पर 92 फीसदी से भी ज्यादा का बंपर मतदान हुआ है, इससे भगवा खेमे में खुशी की लहर दौड़ गई है। ज्यादातर भाजपा नेताओं के दावे हैं कि ’वे इन 152 में से 85-90 सीटें जीत रहे हैं।’ 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को पश्चिम बंगाल में कुल 77 सीटें आई थीं, जिसमें से तो 61 सीटें इसी फेज से थी। इस फेज में जिन इलाकों में जो वोट पड़े हैं उसमें मुस्लिम बहुल इलाके बस मुर्शिदाबाद, मालदा के हैं। दूसरे फेज के 142 सीटों पर जो मतदान होने हैं उसमें मुस्लिम बहुल इलाकों की भरमार है। इन 142 में से भाजपा के पास अभी मात्र 16 सीटे हैं, अगर भाजपा की सीटें इस फेज में बढ़ कर दुगुनी भी हो जाती हैं तो यह संख्या 32-35 के आसपास पहुंचती है। अगर पहले फेज की संभावित सीटें 90 और इस फेज की 35 सीटाें को मिला भी दिया जाए तो भाजपा का कुल आंकड़ा सवा सौ सीटों को पार नहीं कर पा रहा है। वहीं 2021 में ममता के पास 213 सीटें थीं, ममता का तब वोट शेयर 48 फीसदी तो भाजपा का 39 फीसदी। इस बार बंगाल में भाजपा बनाम तृणमूल की सीधी लड़ाई है, कांग्रेस व कम्युनिस्ट जैसे दलों के खातों में मुश्किल से 5-6 सीटें जा सकती हैं। यानी फिर भी ममता सरकार बना सकने लायक बहुमत के करीब अपने दम पर पहुंच सकती है, 170-175 सीटों के आंकड़ों के साथ।
क्या बंगाल में जाति चलेगी?
आमतौर पर बंगाल चुनाव में जाति के आधार पर वोट नहीं पड़ते हैं। पर इस बार यहां भगवा कोशिशें इस बात को लेकर जोर से हुई हैं। पश्चिम बंगाल की 294 में से 68 सीटें अनुसूचित जाति व 16 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं, दोनों मिला कर इन सीटों का आंकड़ा 84 पर आकर ठहरता है, चूंकि चुनाव के पहले फेज में आरक्षित सीटों का घनत्व ज्यादा था सो भाजपा के लिए भी इन 84 सीटों के मायने कहीं ज्यादा बड़े थे। आमतौर पर भाजपा को ’शहरी भारत’ की पार्टी माना जाता है, पर बंगाल में यह परिपाटी किंचित उलट है, वहां भाजपा ग्रामीण इलाकों में ज्यादा पॉपुलर है, बंगाल में भाजपा ने गांवों से निकल कर शहरों तक का सफर तय किया है। सो, नॉर्थ बंगाल में भाजपा का फोकस राजवंशी और मतुआ समुदाय पर रहा। भाजपा ने शायद पहली बार बंगाल में जाति का कार्ड खेला, और ऊंची जातियों के पुरुषों में भी अपना असर छोड़ने में कामयाब रही। इस चुनाव में यह भी दिखा कि वामदलों के वोट, कैडर और उसके प्रभाव क्षेत्रों पर भाजपा ने मजबूती से पैर जमा लिए। सो, यह पूरा चुनाव ही ममता बनाम भाजपा हो गया, स्थानीय मुद्दे चुनावी मैन्यु से नदारद हो गए।
क्या तेजस्वी से लालू का मोहभंग हो रहा है?
लालू यादव के परिवार में कुछ ठीक नहीं चल रहा है, इसकी शुरूआत रोहिणी आचार्य के घर छोड़ने से हुई है, लालू दुखी हैं, उन्हें लग रहा है कि तेजस्वी अपनी अलग ठसक में है, वे परिवार को एकजुट नहीं रख पा रहे हैं। कहते हैं तेज प्रताप ने भी तेजस्वी की वज़ह से ही घर छोड़ दिया था, यह बात राबड़ी देवी को भी खाई जा रही है। वह चाहती है कि परिवार एक होकर रहे। अभी पिछले दिनों लालू यादव से उनके पुराने दिनों के ही साथी नेतागण आकर मिले थे, इन सबकी सामूहिक शिकायत बस संजय यादव को लेकर थी, इनका कहना था कि ’अगर संजय यादव ही पार्टी चला रहे हैं तो उन्हें औपचारिक रूप से पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष क्यों नहीं बना देते?’ अब लालू को भी कहीं न कहीं यह लगने लगा है कि तेज प्रताप को एक मौका और क्यों नहीं मिलना चाहिए, राबड़ी ने भी ज़िद ठान रखी है कि दोनों भाईयों को एक करो। सो, लालू के चाहने और कहने पर ही पिछले दिनों तेज प्रताप की मुलाकात चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ हुई और उनसे बिहार के भविष्य के रोड मैप को लेकर चर्चा हुई, पीके ने भी माना कि ’अगर वाकई बिहार में भाजपा से लोहा लेना है तो न सिर्फ लालू परिवार को एकजुट होना पड़ेगा, बल्कि राज्य की भाजपा विरोधी पार्टियों को भी एक साथ आना होगा।’
संदीप पाठक ‘आप’ भी…
Summary :
‘हर सफर से जुदा क्यों है ये सफर मुहब्बतों का मंजिलें खामोश हैं यहां पर बड़ा शोर है रास्तों का….’ शेक्सपीयर होते तो उनके अहम पात्र के मुंह से शायद पहला संवाद यही सुनने को मिलता। आप से सबसे हैरान करने वाली रुखसती संदीप पाठक की रही। पंजाब की आप सरकार में कभी इनकी तूती बोलती थी। इन्हें आम आदमी पार्टी का ‘चाणक्य’ कहा जाता था, यह केजरीवाल को उतने ही प्यारे थे। पंजाब में आप को सत्ता दिलाने में इनकी एक महती भूमिका मानी जाती है। इनका कार्यकर्ताओं के संग संयोजन, इनका बूथ लेवल मैनेजमेंट और जमीनी स्तर तक…


Download Android App
Download iOS App



