सरमा और सर्वोच्च न्यायालय

Summary :

स्वतन्त्रता के बाद भारत ने जब स्वयं को धर्म या पंथ निरपेक्ष देश घोषित किया तो उसके सामने इस्लाम धर्म की बुनियाद पर बना वह पाकिस्तान देश था जो उसी को काट कर अलग किया गया था और मुस्लिम लीग की इस बुनियाद पर तामीर किया गया था कि हिन्दू और मुस्लिम दो अलग-अलग संस्कृतियां हैं जिनमें आपस में कहीं सामंजस्य का भाव नहीं है। मगर हमारे स्वतन्त्रता सेनानियों ने मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना के इस द्विराष्ट्रवाद के सिद्धान्त का न केवल विरोध किया, बल्कि यह सिद्ध करने की भी कोशिश की कि हिन्दोस्तान विभिन्न मत-मातान्तरों का…

स्वतन्त्रता के बाद भारत ने जब स्वयं को धर्म या पंथ निरपेक्ष देश घोषित किया तो उसके सामने इस्लाम धर्म की बुनियाद पर बना वह पाकिस्तान देश था जो उसी को काट कर अलग किया गया था और मुस्लिम लीग की इस बुनियाद पर तामीर किया गया था कि हिन्दू और मुस्लिम दो अलग-अलग संस्कृतियां हैं जिनमें आपस में कहीं सामंजस्य का भाव नहीं है। मगर हमारे स्वतन्त्रता सेनानियों ने मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना के इस द्विराष्ट्रवाद के सिद्धान्त का न केवल विरोध किया, बल्कि यह सिद्ध करने की भी कोशिश की कि हिन्दोस्तान विभिन्न मत-मातान्तरों का एेसा देश है जिसकी धरती पर सदियों से परस्पर विचार विभिन्नता रहने के बावजूद लोग आपस में मिलजुल कर रहते आये हैं। स्वतन्त्रता के राष्ट्रीय आन्दोलन में सभी मतों के लोगों के एक साथ आने के बावजूद 1947 में भारत का मजहब के आधार पर बंटवारा हो गया लेकिन भारत ने खुद को धर्म निरपेक्ष राष्ट्र के रूप में ही मान्यता दी और यह सुनिश्चित किया कि इस देश में रहने वाले मुस्लिम नागरिकों को भी हिन्दू नागरिकों के समान ही बराबर के अधिकार मिलें। हमारे संविधान में यह पुख्ता व्यवस्था की गई और सुनिश्चित किया गया कि देश के सभी समुदायों के बीच आपसी भाईचारा कायम करने हेतु व्यापक उपाय किये जायें।
समाज में धर्म, जाति, क्षेत्र, जन्म या लिंग के आधार पर नफरत फैलाने को अपराध की श्रेणी में रखा गया और एेसे कार्यों को राष्ट्रीय एकता व अखंडता को नुक्सान पहुंचाने वाला कहा गया। किन्ही दो सम्प्रदायों या समुदायों के बीच वैमनस्य या नफरत फैलाने के कृत्य को अत्यधिक संजीदगी के साथ लिया गया। इसकी वजह यही थी कि समाज में नफरत फैलने की वजह से देश कमजोर होता है जिसका असर समूची विकास प्रक्रिया पर पड़ता है। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि देश के लोगों को सरकारें मजबूत बनाने का प्रयास करें और यह कार्य तभी हो सकता है जब समाज में आपसी सद्भाव व भाईचारा हो। भारत ने किसी भी धर्म को अपना राज्यधर्म घोषित नहीं किया और इसे नागरिकता का आधार नहीं बनाया, बल्कि यह व्यवस्था की कि भारत के जिस भी भू भाग पर जिस किसी भी धर्म को मानने वाला व्यक्ति रहता है, वही इसका सम्मानित नागरिक है। संविधान के इस प्रावधान ने भारत में रहने वाले प्रत्येक धर्म के व्यक्ति को स्वतन्त्र भारत में सशक्त बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। यही वजह है कि आज आजादी के लगभग 78 वर्ष बाद हम जीवन के हर क्षेत्र में हर समुदाय के व्यक्ति को आगे बढ़ते हुए पाते हैं परन्तु पिछले कुछ वर्षों से देश में समाज में विद्वेष फैलाने वाले वक्तव्यों या हेट स्पीच की बाढ़ आयी हुई है जिसका संज्ञान 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने लेते हुए आदेश दिया था कि प्रत्येक राज्य की पुलिस को एेसे बयानों का स्वयं संज्ञान लेना चाहिए और दोषियों के खिलाफ उचित कानून सम्मत कार्रवाई करनी चाहिए। हम यह भी देख रहे हैं कि किसी भी राज्य में चुनाव के आते ही किस प्रकार देश के सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाओं की कतार लग जाती है और विभिन्न राजनैतिक दल न्यायालय के माध्यम से अपना हिसाब-किताब बराबर करने पर आमादा हो जाते हैं। हाल ही में असम के मुख्यमन्त्री श्री हेमन्ता बिस्वा सरमा के एक वीडियो व वक्तव्यों को लेकर उनके विरोधियों की तरफ से सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई। इस याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने यह कहते हुए सुनवाई करने से इन्कार कर दिया कि पहले यह मामला असम के उच्च न्यायालय में ले जाया जाना चाहिए क्योंकि उच्च न्यायालयों के पास भी एेसे मामलों में फैसला करने के व्यापक व पर्याप्त अधिकार हैं। असली सवाल यह है कि किसी भी राज्य का कोई भी मसला सीधे सर्वोच्च न्यायालय लाकर क्या हम उस स्थापित न्याय प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं करते हैं जिसके माध्यम से न्याय पाने को सुगम बनाया गया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकान्त की अध्यक्षता में गठित तीन सदस्यीय पीठ ने श्री सरमा के विरुद्ध दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों व अन्य के द्वारा दायर याचिका पर कहा कि जब भी कहीं चुनाव आते हैं तो सर्वोच्च न्यायालय को राजनैतिक अखाड़े में तब्दील करने की कोशिशें की जाती हैं। न्यायमूर्तियों की राय में सीधे सर्वोच्च न्यायालय आने से क्या उच्च न्यायालयों के नैतिक बल में ह्रास नहीं होता है ?
न्यायमूर्तियों का कहना था कि उच्च न्यायालय भी संवैधानिक न्यायालय होते हैं और उनके पास हमसे ज्यादा ही अधिकार होते हैं अतः एेसी स्थिति को कैसे सहन किया जा सकता है। बेशक किसी भी नागरिक को अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सर्वोच्च न्यायालय में आने का अधिकार होता है मगर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि राजनैतिक दृष्टि से हानि-लाभ पहुंचाने वाले मुद्दों को भी सीधे सर्वोच्च न्यायालय लेकर आया जाये। श्री सरमा संवैधानिक पद पर हैं और असम के मुख्यमन्त्री हैं अतः बेहतर होता यदि उनके खिलाफ हेट स्पीच के मामले को पहले उच्च न्यायालय में ही ले जाया गया होता लेकिन पिछले कुछ समय से हर मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर कर दी जाती हैं। इससे एेसी याचिकाओं को मीडिया में अच्छा– खासा प्रचार भी मिल जाता है जिसका हानि-लाभ राजनैतिक दृष्टि से भी आंका जाता है। जब हमारी न्याय प्रणाली में यह व्यवस्था है कि उच्च न्यायालय भी संवैधानिक मसलों पर अपना फैसला दे सकते हैं तो फिर सीधे सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमों की संख्या क्यों बढ़ाई जाये जबकि इस न्यायालय में कुल 33 न्यायाधीश ही होते हैं। इस बारे में न्यायमूर्ति सूर्यकान्त ने भी टिप्पणी की है। अतः हमें वह रास्ता अपनाना चाहिए जिससे न्याय भी जल्दी मिले और संविधान की अनुपालना भी हो। हेट स्पीच के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस संबंध में स्पष्ट नियम और निर्देशों की जरूरत है जिसका पालन सभी राज्य और राजनीतिज्ञ करें।

Aditya Chopra

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