आरएसएस और मुस्लिम मिलन एक जटिल और बहुआयामी विषय है। इसमें ऐतिहासिक अविश्वास भी है और संवाद की संभावनाएं भी, जैसा कि आजकल हो रहा है। भारत जैसे बहुलतावादी देश में स्थायी समाधान का मार्ग संवाद, संवैधानिक मूल्यों और आपसी सम्मान से ही निकल सकता है। 2002 में आरएसएस से प्रेरित मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना संघ नेता के सुदर्शन, मौलाना जमील अहमद इलयासी और उनके पुत्र उमैर इलियासी व अन्य मुस्लिम नेताओं के सौजन्य से हुई, जिसका उद्देश्य राष्ट्रवाद और सामाजिक समरसता के मुद्दों पर मुस्लिम समाज से संवाद बढ़ाना है। कई अवसरों पर आरएसएस प्रमुखों ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों और उलेमा से भेंट की है।
मोहन भागवत ने विभिन्न मंचों पर यह कहा कि भारत में रहने वाले सभी लोग सांस्कृतिक रूप से एक ही राष्ट्र का हिस्सा हैं।
वे मदरसे भी गए और मुसलमानों के विरुद्ध एक भी ग़लत शब्द नहीं बोला। बावजूद इसके कि अधिकतर मुस्लिम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को मुस्लिम विरोधी और साम्प्रदायिक समझते चले आ रहे हैं, संघ ने जिस प्रकार से मुस्लिम वर्ग के हित में जो कार्य किए हैं उससे सभी को अचंभा भी हुआ है और खुशी भी,विशेष रूप से मुस्लिमों को! मुसलमानों में आजादी के बाद कुछ राजनीतिक वर्गों द्वार यह दुर्भावना, भ्रांति और बदगुमानी फैलाई गई कि हिंदू महासभा, संघ, जनसंघ, आरएसएस और इनसे जुड़े सभी संगठन, मुसलमानों के दुश्मन हैं और इनको समाप्त करना चाहते हैं, जो कि बिल्कुल ग़लत धारणा थी, मगर मुस्लिमों के कुछ स्वयंभू नेताओं ने अपनी दुकानों को चमकाने हेतु क़ौम को इस प्रकार भड़काया और भटकाया कि उसके और मुस्लिमों के मध्य एक खाई पैदा हो गई।
2014 के चुनाव से पूर्व इस बात का प्रचार किया गया कि नरेंद्र मोदी मुसलमानों के विरुद्ध ऐसे ही दंगे भड़का देंगे, जैसे गुजरात में! आरएसएस और मुस्लिम मिलन का विषय भारत की सामाजिक-राजनीतिक चर्चा में लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है।
यह संबंध टकराव, संवाद, पहल और आपसी अविश्वास इन सभी चरणों से गुज़रा है, मगर फिर भी मुस्लिमों की एक छोटी संख्या ने न केवल भाजपा को वोट दिया बल्कि सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के इस कथन को भी सराहा कि भारत मुस्लिमों के सहयोग के बिना जगत गुरु नहीं बन सकता। एक बार उन्होंने यह भी कहा कि हम मुसलमानों के बिना भारत की कल्पना भी नहीं कर सकते। संघ के सौजन्य से दो ऐसी पुस्तकें प्रकाशित हुईं कि कोई विश्वास नहीं कर सकता कि संघ ऐसा करेगा।
इस सरकार के दौर में सबको चकित करने वाली पहली ऐसी पुस्तक थी, “वैचारिक पहल: एक व्यावहारिक समन्वय”, जिसके लेखक ख्वाजा इफ्तेखार अहमद हैं और जिसका विमोचन स्वयं सरसंघ चालक ने यह कह कर किया था कि अपने जीवन में मुस्लिम-संघ के बीच सेतु बनाने वाली किसी मुस्लिम द्वारा यह पहली ऐसी पुस्तक है। पुस्तक के प्रकाशित होते ही हिंदुओं और मुस्लिमों में न केवल पुल बने, बल्कि मुसलमानों के एक बड़े तबके में संघ और उनके के बीच ग़लत फ़हमियां दूर होने लगी हैं और मुस्लिम संघ से जुड़ कर राष्ट्र निर्माण के कार्य में धूम से लगे हुए हैं। इसी संदर्भ में संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता, याजवेंद्र यादव ने भी एक बड़े मारके की पुस्तक लिखी है, “भारतीय मुस्लिमों की गौरव गाथाएं” यह एक महत्वपूर्ण कृति है जिसमें भारत के मुस्लिम समाज के उन महान व्यक्तित्वों और योगदानों को रेखांकित किया गया है जिन्होंने राष्ट्र निर्माण, स्वतंत्रता संग्राम, शिक्षा, साहित्य, विज्ञान, सेना और सामाजिक सुधार में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।
इसमें राष्ट्र रक्षा को समर्पित वीर सैनिकों, कला-साहित्य और खेल जगत की विभूतियों के साथ-साथ सामाजिक सुधारकों को भी स्थान दिया गया है, जिन्होंने समाज में फैली भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया। राम मंदिर, अयोध्या के संदर्भ में भी पुस्तक उन आवाज़ों को सामने लाती है जो शांतिपूर्ण समाधान और आपसी सद्भाव की पक्षधर थे।
पुस्तक में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज़ादी तक मुस्लिम क्रांतिकारियों और नेताओं की भूमिका का उल्लेख है, जैसे, बहादुर शाह ज़फ़र, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, हकीम अजमल खान, सर मुहम्मद इक़बाल, अशफाक उल्ला खां, सर सैयद अहमद खां, अशफाकुल्लाह खान, मौलाना हसरत मोहानी। मुस्लिम समाज के मुख्य चेहरे, जैसे, मिर्जा ग़ालिब, एपीजे अब्दुल कलाम, मुहम्मद अजहरुद्दीन आदि, जिसका विमोचन संघ के वरिष्ठ नेता, इंद्रेश कुमार ने किया था।
इन पुस्तकों के द्वारा ही नहीं, बल्कि अपने ट्रैक रिकॉर्ड द्वारा भी संघ ने ख़ास तौर से प्रमाणित किया है कि किस प्रकार से उसकी कार्य प्रणाली में मुस्लिम वर्ग को शामिल किया जा रहा है। संवाद का सिलसिला लगातार चल रहा है और उसके खुशगवार नतीजे सामने आ रहे हैं।
आरएसएस और मुस्लिमों में बनते सेतु
Summary :
आरएसएस और मुस्लिम मिलन एक जटिल और बहुआयामी विषय है। इसमें ऐतिहासिक अविश्वास भी है और संवाद की संभावनाएं भी, जैसा कि आजकल हो रहा है। भारत जैसे बहुलतावादी देश में स्थायी समाधान का मार्ग संवाद, संवैधानिक मूल्यों और आपसी सम्मान से ही निकल सकता है। 2002 में आरएसएस से प्रेरित मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना संघ नेता के सुदर्शन, मौलाना जमील अहमद इलयासी और उनके पुत्र उमैर इलियासी व अन्य मुस्लिम नेताओं के सौजन्य से हुई, जिसका उद्देश्य राष्ट्रवाद और सामाजिक समरसता के मुद्दों पर मुस्लिम समाज से संवाद बढ़ाना है। कई अवसरों पर आरएसएस प्रमुखों ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों…


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