पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग इन दिनों सरकार के 7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ के आंकड़ों पर सवाल उठाने की वजह से चर्चा में हैं। हालांकि, बहुत कम लोग जानते हैं कि कभी वे सत्ता के गलियारों में काफी पसंदीदा अधिकारी हुआ करते थे। राजस्थान कैडर के 1983 बैच के आईएएस अधिकारी, गर्ग 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के कुछ समय बाद ही केंद्र में आ गए थे। जल्द ही उन्हें वर्ल्ड बैंक में भारत के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर का अहम पद दिया गया।
वॉशिंगटन में तीन साल बिताने के बाद, वे वित्त मंत्रालय में आर्थिक मामलों के विभाग में सचिव के तौर पर लौटे। मार्च 2019 में वित्त सचिव नियुक्त होने से पहले उन्होंने लगभग दो साल तक यह पद संभाला। मई 2019 में निर्मला सीतारमण के वित्त मंत्री बनने के तुरंत बाद ही सरकार के साथ उनके मतभेद शुरू हो गए। जाहिर है, पॉलिसी से जुड़े मुद्दों पर उनके बीच गंभीर मतभेद थे। उनके बीच पर्सनैलिटी को लेकर भी टकराव था; गर्ग ने सीतारमण की तुलना उनके पूर्ववर्ती अरुण जेटली से की और उन्हें कमतर आंका।
गर्ग और जेटली के बीच अच्छे संबंध थे और जेटली ही उन्हें वित्त सचिव बनाने के पीछे थे। गर्ग और सीतारमण के बीच मतभेद का एक बड़ा मुद्दा रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के सरप्लस डिविडेंड को सरकारी खजाने में ट्रांसफर करने का प्रस्ताव था। आखिरकार, पूर्व आरबीआई गवर्नर बिमल जालान की अध्यक्षता वाली एक्सपर्ट कमेटी ने इस प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी, हालांकि यह उस हद तक नहीं था जितना गर्ग चाहते थे। हालांकि, सीतारमण गर्ग से इतनी नाराज़ थीं कि वित्त मंत्री का पद संभालने के एक महीने के भीतर ही उन्होंने गर्ग का तबादला करवाने के लिए ज़ोर डाला। वे उस लड़ाई में कामयाब रहीं और जुलाई 2019 तक गर्ग का वित्त मंत्रालय से पावर मिनिस्ट्री (ऊर्जा मंत्रालय) में सचिव के तौर पर तबादला कर दिया गया।
अगले ही दिन, उन्होंने वॉलेंटरी रिटायरमेंट (स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति) के लिए आवेदन कर दिया। नवंबर 2020 में उन्होंने एक ब्लॉग लिखा कि उन्होंने वॉलेंटरी रिटायरमेंट इसलिए लिया क्योंकि सरकार का रिफॉर्म एजेंडा (सुधार का एजेंडा) पटरी से उतर रहा था। उन्होंने यह भी बताया कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ उनके संबंध अच्छे नहीं थे। 2023 में प्रकाशित उनकी किताब ‘वी ऑल्सो मेक पॉलिसी’ में और भी कई चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं। हाल ही में जारी जीडीपी ग्रोथ के आंकड़ों की गर्ग द्वारा की गई आलोचना पर अर्थशास्त्री बंटे हुए हैं।
हालांकि, पूर्व वित्त सचिव और उससे पहले आर्थिक मामलों के सचिव के तौर पर, उन्हें ज़रूर पता होगा कि जीडीपी के आंकड़े तय करते समय पर्दे के पीछे क्या होता है। इसलिए, केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल की तरह उन्हें ‘बिना नौकरी वाला मौकापरस्त’ कहकर खारिज करने के बजाय, गर्ग की आलोचना पर ज़्यादा गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए। राम मंदिर आैर नए सीईओ : राम मंदिर ट्रस्ट में दो नियुक्तियों ने संघ के हलकों में हैरानी पैदा कर दी है, क्योंकि मंदिर पर उनका मालिकाना हक जैसा अधिकार है।
एक नियुक्ति नए सीईओ रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा की है,, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वेस्टर्न एयर कमांड की कमान संभाली थी। दूसरी नियुक्ति पूर्व कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि को विहिप नेता चंपत राय की जगह महासचिव बनाना है। सीईओ के तौर पर अपने पहले ही दिन, मिश्रा की पत्रकारों से बहस हो गई जो उनसे टिप्पणी लेना चाहते थे। मिश्रा ने उन्हें चेतावनी दी कि उन्होंने उनकी पहचान कर ली है और उन्हें दोबारा परिसर में नहीं आने देंगे। स्वामी गोविंद देव गिरि खामोश हैं, लेकिन संघ के हलकों में चंपत राय के समर्थक उनकी नियुक्ति से नाराज़ हैं और उनके कामों पर बारीकी से नज़र रखने की तैयारी में हैं।
दिलचस्प बात यह है कि स्वामी पुणे के रहने वाले हैं और आरएसएस में महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण लॉबी के करीबी माने जाते हैं। क्या ये दो नए नियुक्त अधिकारी मंदिर और दान में चोरी के घोटाले को लेकर चल रहे विवाद को शांत करने में सफल होंगे? यूपी विधानसभा चुनाव के नज़दीक होने के कारण यह एक अहम सवाल है। क्या राघव चड्ढा की राज्यसभा सदस्यता पर आएगा संकट ? आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होने के बाद राघव चड्ढा राजनीतिक करियर असमंजस में फंस गया है। उन्हें सबसे ताज़ा झटका तब लगा जब चुनाव आयोग की ‘स्पेशल इंटेंसिव रिव्यू’ के तहत पंजाब की वोटर लिस्ट से उनका नाम हटा दिया गया।
यह एक बड़ा झटका है क्योंकि अगर वह वोटर लिस्ट में अपना नाम वापस नहीं जुड़वा पाते हैं, तो उनकी राज्यसभा सदस्यता रद्द होने का खतरा पैदा हो सकता है। वह वोटर लिस्ट में अपना नाम वापस लाने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं, लेकिन भाजपा के हलकों में अटकलें हैं कि उन्हें ज़रूरी समर्थन नहीं मिल सकता क्योंकि उन्होंने पार्टी के कुछ ताकतवर नेताओं को नाराज़ कर दिया है। अपनी बात कहने की काबिलियत की वजह से मीडिया और जेन जी के चहेते रहे चड्ढा का कद तेज़ी से गिरा है। पार्टी बदलने के बाद न सिर्फ़ सोशल मीडिया पर उनके आधे फ़ॉलोअर्स कम हो गए, बल्कि भाजपा ने जेन जी तक पहुंचने के लिए उनकी सेवाएं भी नहीं लीं।


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