लक्ष्य विहीन युद्ध सर्वदा सर्वत्र विनाश ही लेकर आता है। यही वजह है कि पश्चिम एशिया में चल रहे ईरान-इजराइल व अमेरिका युद्ध ने पूरे विश्व की शान्ति-व्यवस्था को अपनी चपेट में ले लिया है और दुनिया के विभिन्न देश ऊर्जा संकट का सामना कर रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि यह युद्ध अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की उस सनक की वजह से शुरू हुआ जिसमें वह दुनिया के तमाम ऊर्जा स्रोतों पर अपने देश का प्रभुत्व चाहते हैं। इसी कारण से ट्रम्प इस युद्ध के दौरान अपने लक्ष्यों को हर घंटे के हिसाब से परिवर्तित करते रहे और दुनिया को बताते रहे कि वह ईरान के खतरनाक परमाणु इरादों व आतंकवादी सत्ता तन्त्र से पूरे पश्चिम एशिया को बचाना चाहते हैं किन्तु उनका यह लक्ष्य सत्य की बुनियाद पर टिका हुआ नहीं था क्योंकि ईरान के पास परमाणु बम न होने की पुष्टि दुनिया की नियामक एजेंसियां पहले ही कर चुकी थीं। अब इस युद्ध को शुरू हुए 24 दिन से ज्यादा का समय हो चुका है और इस दौरान ईरान से लेकर इजराइल व अन्य खाड़ी के अरब देशों तक में भयंकर विनाश हो चुका है। ऐसे लक्ष्य विहीन युद्ध का कभी एक आयाम नहीं हो सकता क्योंकि ईरान ने अपने ऊपर हमले का जवाब देने के लिए उन देशों को भी नहीं छोड़ा जिनमें अमेरिकी सैनिक अड्डे विद्यमान हैं। ऐसे देशों में खाड़ी क्षेत्र के वे ही देश हैं जिनमें पेट्रोलियम कच्चे तेल व ईंधन गैस का उत्पादन होता है अतः युद्ध की विभीषिका से दुनिया में ऊर्जा संकट होना स्वाभाविक ही था। परन्तु अब श्री ट्रम्प को सूझी है कि समस्या का समाधान बातचीत से भी निकाला जा सकता है अतः उन्होंने अगले पांच दिनों के लिए ईरान के बिजली संयन्त्रों पर किये जाने वाले हमले को टाल दिया है। यही वजह ट्रम्प के कथित शांति प्रयासों के बावजूद ईरान और इजराइल ने एक-दूसरे पर 25वें दिन भी बमबारी जारी रखी। इससे स्थिति ट्रम्प के नियंत्रण से भी बाहर जा सकती है।
ट्रम्प ने इससे पहले ईरान को धमकी दी थी कि यदि 48 घंटे के भीतर उसने अपने कब्जे वाले होर्मुज जलडमरूमध्य के समुद्री रास्ते को वैश्विक वाणिज्यिक यातायात के लिए न खोला तो उसके बिजली उत्पादन संयन्त्रों को बमबारी करके नष्ट कर दिया जायेगा। इसके जवाब में ईरान ने भी चेतावनी दे दी थी कि वह खाड़ी के विभिन्न देशों में स्थित अमेरिकी शिरकत वाले तेल उत्पादन संयन्त्रों को नष्ट कर देगा। जिससे इस युद्ध की लक्ष्य हीनता ही प्रकट होती थी। मगर इसी बीच ट्रम्प ने घोषणा कर दी कि ईरान व उनके बीच कुछ अन्य देशों के माध्यम से बातचीत हो रही है जिसके सिरे चढ़ जाने पर युद्ध के बादल छंट सकते हैं। ईरान व अमेरिका के बीच सेतु बनने की भूमिका में जो देश सामने आये हैं वे तुर्की, मिस्र व पाकिस्तान हैं। इससे भारतवासियों को हैरानी हो सकती है कि पाकिस्तान जैसा देश भी बिचौलिया बनने का प्रयास कर रहा है जिसके बारे में कुछ दिन पहले ही अमेरिका की गुप्तचर विभाग की मुखिया तुलसी गाबार्ड ने कहा था कि पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम भी अमेरिका के लिए खतरा है। इससे ट्रम्प की उस झुंझलाहट का पता भी चलता है जो इस दिशाविहीन युद्ध की वजह से उनको जकड़े हुए हैं क्योंकि पाकिस्तान को तो स्वयं आतंकवादी देशों की शृंखला में खड़ा किया जा सकता है जिसकी गवाह वह घटना है जो 26 दिसम्बर 2008 को भारत के मुम्बई शहर में हुई थी। इस दिन पाक से आये आतंकवादियों ने मुम्बई शहर पर आतंकवादी हमला करते हुए 167 देशी-विदेशी नागरिकों की हत्या कर दी थी। इसके बाद भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करने के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया था और एक इस्लामी देश तक भी उसकी मदद को नहीं आया था। अतः पाकिस्तान के शान्ति के लिए बिचौलिया बनने की भूमिका पर सन्देह प्रकट करने के वाजिब कारण हैं।
वार्ता के बारे में अभी तक जिस प्रकार की खबरें मिल रही हैं उनके अनुसार इस बातचीत में ईरानी संसद (मजलिस) के अध्यक्ष मोहम्मद बाकर ईरान की ओर से अपना पक्ष रख रहे हैं हालांकि आधिकारिक तौर पर वह इसे स्वीकार नहीं कर रहे हैं परन्तु दुनिया के विश्वस्त सूचना सूत्र यह कह रहे हैं कि इसी सप्ताह के भीतर अमेरिका व ईरान के बीच इस्लामाबाद में एक बैठक हो सकती है जिसमें अमेरिका के अन्य दो अधिकारियों के साथ इसके उपराष्ट्रपति भी भाग ले सकते हैं। इस खबर के बाद जिस तरह अन्तर्राष्ट्रीय तेल बाजार में कच्चे तेल के भावों में 8 प्रतिशत के लगभग गिरावट आयी और दुनिया भर के शेयर बाजारों में चहचाहट बिखरी उससे अन्दाजा लगया जा सकता है कि युद्ध से वैश्विक अर्थव्यवस्था किस हद तक प्रभावित हुई है। यह भी कहा जा रहा है कि ट्रम्प से पाकिस्तानी फौज के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने भी कई बार बातचीत की जिससे यह पता लगता है कि ट्रम्प अब युद्ध रोकने के लिए कितने बेताब हैं। दरअसल इस युद्ध को रुकवाने के लिए ट्रम्प पर खाड़ी के उन तेल उत्पादक देशों का भारी दबाव है जहां अमेरिकी सैनिक अड्डे हैं। इस युद्ध के कारण उनकी अर्थव्यवस्था 24 दिन के भीतर ही चौपट होती जा रही है जबकि ईरान की ओर से पहले यह कहा गया था कि वह युद्ध रोकने की शर्तों में यह भी शामिल करना चाहता है कि अमेरिका सभी ऐसे देशों से अपने सैनिक अड्डे समाप्त करेगा। ईरान ने हिन्द महासागर में स्थित अमेरिकी-ब्रिटिश सैनिक अड्डे डिएगो गार्सिया पर हमला करके नाटो देशों के सामरिक समूह को भी यही संकेत दिया कि उसकी मिसाइल मारक क्षमता यूरोपीय देशों तक को अपने निशाने पर ले सकती है। परन्तु यह भी तथ्य है कि अमेरिकी सामरिक शक्ति के समक्ष ईरान बहुत कमजोर धरातल पर खड़ा है और वह एक सीमा तक ही युद्ध की मार को झेल सकता है अतः उसकी ओर से भी यदि शान्ति के मार्ग पर चलने की कोशिश की जा रही है तो इसे सकारात्मक रूप में लिया जाना चाहिए। जहां तक भारत का सम्बन्ध है तो प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी संसद में घोषणा कर चुके हैं कि भारत शान्ति व मानवता के पक्ष में खड़ा हुआ है।
युद्ध में शांति की खोज?
Summary :
लक्ष्य विहीन युद्ध सर्वदा सर्वत्र विनाश ही लेकर आता है। यही वजह है कि पश्चिम एशिया में चल रहे ईरान-इजराइल व अमेरिका युद्ध ने पूरे विश्व की शान्ति-व्यवस्था को अपनी चपेट में ले लिया है और दुनिया के विभिन्न देश ऊर्जा संकट का सामना कर रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि यह युद्ध अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की उस सनक की वजह से शुरू हुआ जिसमें वह दुनिया के तमाम ऊर्जा स्रोतों पर अपने देश का प्रभुत्व चाहते हैं। इसी कारण से ट्रम्प इस युद्ध के दौरान अपने लक्ष्यों को हर घंटे के हिसाब से परिवर्तित…


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