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प्राण-प्रतिष्ठा से श्रीराम युग का शुमारम्भ

22 जनवरी 2024 को अयोध्या की प्राचीन नगरी में एकता, श्रद्धा, भक्ति और समरसता का अविस्मरणीय संगम देखा गया। जहां देश के प्रत्येक कोने से, भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमियों से सहस्रों राम-भक्त भव्य राम मंदिर में श्री रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के साक्षी बनने के लिए एकत्र हुए। श्री रामलला के आगमन के नाद से भारत वर्ष में ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व में एक नवोत्साह की लहर का संचार हुआ।
भारत के इतिहास में इस तरह का भव्य आयोजन कदाचित ही हुआ होगा जिसमें सूक्ष्म स्तरीय योजना एवं वृहद स्तरीय समायोजन का अनोखा मेल देखने को मिला। अयोध्या में भारत और सनातन सभ्यता की प्रत्येक ध्वनि, प्रत्येक भावना और प्रत्येक परम्परा को प्रभु श्रीराम के छत्र में प्रतिछाया मिली। लक्षद्वीप और अंडमान के एकांत द्वीपों से लद्दाख के सुदूर पर्वतों तक, मिज़ोरम एवं नागभूमि के हरित वनों से लेकर मरुभूमि की रेत तक, भारत के 28 राज्य एवं 8 केंद्र शासित प्रदेश इस महा-आयोजन के साक्षी बने और भारत की सभी भाषाओं ने कहा कि ‘राम सभी के हैं।’
आमंत्रित महानुभावों में 10 रुपए से लेकर करोड़ों तक का दान करने वाले सभी दानदाता वर्गों का प्रतिनिधित्व था, राष्ट्र और सनातन सभ्यता के विभिन्न उद्गम स्थलों से निकलने वाली 131 प्रमुख और 36 जनजातीय, नवीन एवं प्राचीन धार्मिक परम्पराओं का प्रतिनिधित्व था। इनमें सभी अखाड़े, कबीरपंथी, रैदासी, निरंकरी, नामधारी, निहंग, आर्य समाज, सिंधी, निम्बार्क, पारसी धर्मगुरु, बौद्ध, लिंगायत, रामकृष्ण मिशन, सत्राधिकर, जैन, बंजारा समाज, मैतेई, चकमा, गोरखा, ख़ासी, रामनामी आदि प्रमुख परम्पराएं सम्मिलित थी। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन-जाति, घुमंतू समाज के प्रमुख जनों का भी प्रतिनिधित्व था। विभिन्न मत-पंथ जैसे इस्लाम, ईसाई, पारसी का भी यहां प्रतिनिधित्व था।
रामलला के पक्ष में निर्णय लेने वाले ज़िला न्यायाधीश श्री नय्यर के परिवार के साथ-साथ तत्कालीन ड्यूटी कांस्टेबल अब्दुल बरकत, जिन्होंने गवाही दी थी, उनके परिवार को भी आमंत्रित किया गया था। रामलला के विरुद्ध मुक़दमा लड़ने वाले परिवार के साथ तत्कालीन अधिकारियों के परिवारों को भी निमंत्रण दिया गया था। राम जन्मभूमि आंदोलन का नेतृत्व करने वाले और इस आंदोलन में बलिदान हुए भक्तों के परिवार के सदस्य, राम जन्मभूमि की न्यायिक प्रक्रिया में सहभागी अधिवक्तागण भी इस आयोजन में सम्मिलित हुए। भारत की माननीय राष्ट्रपति और माननीय उपराष्ट्रपति के साथ पूर्व राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री भी इस कार्यक्रम में आमंत्रित थे। भारत की सुरक्षा में तत्पर तीनों सेनाओं के सेवानिवृत्त सेनाध्यक्ष और परमवीर चक्र विजेता भी यहां थे और भारत को चंद्रमा तक ले जाने वाले इसरो के वैज्ञानिकों से लेकर भारतीय कोविड-वैक्सीन बनाने वाले वैज्ञानिक भी यहां थे। उच्चतम न्यायालय के तीन पूर्व मुख्य न्यायाधीश सहित अनेक पूर्व न्यायाधीश, सेवानिवृत्त प्रशासनिक पुलिस एवं अन्य अधिकारी, विभिन्न देशों में रहे भारत के राजदूतों से लेकर बुद्धिजीवी, शिक्षाविद, नोबेल पुरस्कार, भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्मश्री और मैग्सेसे पुरस्कार के साथ-साथ साहित्य एकेडमी पुरस्कार से सम्मानित महानुभाव भी सम्मिलित हुए। प्रख्यात अधिवक्ता, चिकित्सक, सीए, समाचार पत्रों और टीवी चैनल्स के संचालक/सम्पादक, प्रख्यात सोशल-मीडिया इंफ्ल्युएंसर्स आदि के साथ-साथ देश के बड़े औद्योगिक परिवार भी इस कार्यक्रम में उपस्थित थे।
मुख्य पूजा में 15 यजमान बैठे थे, जिनमें सभी जातियों-वर्गों (सिख, जैन, नवबौद्ध, निषाद समाज, वाल्मीकि समाज, जनजाति समाज, घुमंतू जातियां आदि) और भारत की सभी दिशाओं (उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम, उत्तर-पूर्व) से आए व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व था। इन सभी की मंच पर ही बैठने की व्यवस्था थी। देश का पोषण एवं विकास करने वाले किसान और मज़दूर बंधुओं के साथ सहकारिता और ग्राहक संगठनों के प्रतिनिधि भी यहां उपस्थित थे। एल एंड टी व टाटा समूह के अधिकारी, अभियंता और श्रमिक भी यहां उपस्थित थे। जिन श्रमिकों ने प्रभु श्रीराम के मंदिर के निर्माण को आकार दिया, प्रधानमंत्री ने स्वयं उन पर पुष्प-वर्षा करके उनका अभिनंदन किया। संघ और विश्व हिंदू परिषद के अनेक प्रबंधक कार्यकर्ताओं से लेकर संघ के पूजनीय सरसंघचालक माननीय श्री मोहन भागवत और भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भी इस कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के आग्रह पर जहां विश्व हिंदू परिषद के सैकड़ों कार्यकर्ता दिन-रात लगे थे, वहीं ट्रस्ट के ही आग्रह पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व अन्य कई स्थानीय स्वयंसेवी संगठनों के अनेक कार्यकर्ता इस आयोजन की व्यवस्था में थे। उनके प्रबंधन के अनुभव का लाभ सूक्ष्म दृष्टि से व्यवस्था के चिंतन में हुआ। जिसका अनुभव वहां आए प्रत्येक रामभक्त को हो रहा था। अयोध्या के नागरिक और प्रशासन भी ट्रस्ट के साथ समन्वय करते हुए अयोध्या को संवारने में लग गए। अयोध्यावासी सामान्य-जन के लिए यह एक कौतूहल का विषय था कि कैसे 4 माह में अयोध्या नगरी का स्वरूप सहसा परिवर्तित हो गया।
तीन दिनों में अयोध्या में बिना किसी राजनैतिक या व्यावसायिक आयोजन के 71 निजी विमान गतिमान हुए। लखनऊ तथा अयोध्या के विमानतल एवं लखनऊ, अयोध्या, काशी, गोरखपुर, गोंडा, सुल्तानपुर, प्रयागराज आदि रेल-स्टेशनों पर केसरिया पटके के साथ स्वागत एवं यातायात की पूर्ण व्यवस्था की गयी। विभिन्न उपस्थित लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सभी के लिए आवास व्यवस्था सावधानीपूर्वक तैयार की गई थी।
भारत का इतिहास साक्षी है कि यह स्वयं में ऐसा एक ही कार्यक्रम था जहां इस स्तर के व्यक्ति 4-5 घंटों तक सामान्य कुर्सियों पर बैठे। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री देवेगौड़ा वहां 4 घंटे व्हील चेयर पर बैठे। ना तो वहां किसी के सहयोगी थे, ना ही सुरक्षाकर्मी। प्रसाद स्वरूप सभी को जल सेवा एवं जलपान अपनी कुर्सियों पर ही दिया गया। प्रभु श्री राम के घर में सभी जातियां, सभी वर्ग, सभी क्षेत्र, एक समान थे, एक साथ थे। सभी ने अपने औहदे, अपनी सामाजिक-आर्थिक महत्ता से ऊपर उठकर अयोध्या के सादगी-पूर्ण आतिथ्य को सहृदय स्वीकार किया।
सम्पूर्ण भारत का हर गाँव, हर मोहल्ला, हर मंदिर अयोध्या बन गया था। जो अयोध्या नहीं आ पाए उन्होंने स्थानीय मंदिरों में पूजन किया, रात्रि में दीपोत्सव मनाया। अयोध्या का दैवी आयोजन प्रभु श्री राम की चिर-विरासत का एक प्रमाण जो विश्व भर में करोड़ों लोगों को प्रेरित और एकजुट करता है, यह आयोजन एकता, अखंडता, समरसता और श्रद्धा के ‘रामोत्सव’ के रूप में युगों-युगों तक जीवित रहेगा। अब समय आ गया है कि हम प्रभु श्रीराम का स्मरण कर, भारत को सुखी, संपन्न, स्वस्थ, समर्थ और सम्मानित राष्ट्र के रूप में स्थापित करने का संकल्प लें। भारत को ‘विश्व-गुरु’ के रूप में स्थापित करें।

– रामलाल
( अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ )

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