अकसर यह बात कही और सुनी जाती है कि दुनिया के हर छोटे और बड़े शहर में आबादी बढ़ती जा रही है। इसी कड़ी में कुछ खास शहरों की आबादी ज्यादा ही तेजी से बढ़ रही है। इस मामले को लेकर यूएन अर्थात संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट जो दुनिया की आबादी पर आधारित है ने चौंकाने वाले आंकड़े सबके सामने रखे हैं। यूएन वर्ल्ड अरबनाइजेशन प्रोसपेक्टस 2025 की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में अगस्त तक पूरी दुनिया की शहरी आबादी 81 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है और गांव की आबादी 19 प्रतिशत रह गयी है। कभी 2018 में दुनिया के शहरों में आबादी का प्रतिशत 55 था जो आज की तारीख में 81 प्रतिशत हो गया है। रिपोर्ट कहती है कि शहरी इलाके भारी भीड़ की परिभाषा बन रहे हैं और सभी गांव का दुनिया में स्वरूप सिमट रहा है।
इस रिपोर्ट को पढऩे के बाद अगर मैं भारत की बात करूं तो स्थिति यहां भी चौंकाने वाली है क्योंकि यहां भी पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, यूपी, मध्यप्रदेश, राजस्थान के गांव से लोग अब शहरों की तरफ भाग रहे हैं। लिहाजा वहां आबादी बढ़ रही है। दूसरी बात यह है कि गांव में आज की तारीख में सुविधाएं जिस तरह से बढ़ रही हैं तो उनका शहरीकरण हो रहा है। यानी कि हमारे गांव का जो परम्परागत स्वरूप हुआ करता था वह तेजी से सिमट रहा है सचमुच यह चौंकाने वाली बात है। हालांकि यूएन की रिपोर्ट में शहरीकरण की लहर के तेजी से बढ़ने में लोगों के ज्यादा पैमाने पर शिक्षित होने, बेहतर रोजगार होने की बात कही गयी है। शहर के प्रति एक क्रेज लोगों को गांव से पलायन करने पर मजबूर कर रहा है। शहरी विकास अच्छी बात है लेकिन ग्रामीण विकास के साथ-साथ संतुलन बना रहना चाहिए। विशेषज्ञों ने कहा है कि भारत जैसे देशों में शिक्षा और रोजगार के ज्यादा अवसर शहरों से ही जुड़े हैं। इस कारण पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश में पलायन तेजी से हुआ है। जबकि गांव में विकास उन्हें शहरीकरण के रूप में स्थापित कर रहा है। हमारा यह मानना है कि संतुलन हर सूरत में बना रहना चाहिए। यह सच है कि उत्तर भारत में लोगों का भारत की राजधानी होने के नाते दिल्ली के प्रति क्रेज बढ़ा है क्योंिक दिल्ली में यहां सुविधाएं हैं लेकिन यह भी सच है कि इसी पंजाब और हरियाणा के अनेक गांव अब शहरीकृत स्वरूप ले चुके हैं और आधुनिकता के लिबास में नजर आते हैं। कभी दिल्ली से सटे सोनीपत, राई, गुरुग्राम से अनेक गांव राजधानी से सटे हुए थे उधर यूपी में शामली, गाजियाबाद, हापुड़, मोदी नगर से सटे हुए थे लेकिन अब उनका शहरीकृत स्वरूप चौंकाने वाला है। दिल्ली में नजफगढ़, नरेला, अलीपुर के अनेक गांव अपनी ग्रामीण पहचान रखते थे। लेकिन अब सब के सब दिल्ली का एक भीड़भाड़ वाला नजारा पेश करते हैं। पुराने गांव के छोटे शहर और पृष्ठभूमि जो अपनी परंपरागत पहचान रखती थी वह अब शहरीकृत सुविधाओं में बदल चुकी है। गांव में शिक्षा और व्यापार के नाम पर वह सुविधाएं नहीं थे जो शहरों में आधुनिक पब्लिक स्कूलों, कालेजों और बड़े-बड़े मॉल्स के रूप में दिखाई देती है।
कितने ही नेशनल हाईवेज पर अब आसमान छूती इमारतें दिखाई देती हैं जिन्हें बड़े-बड़े मॉल का नाम दिया गया है। कई किलोमीटर तक फैले हुए हरियाली जमीन का नजारा पेश करते खेत खलिहान अब पत्थरों की इमारतों में बदलते नजर आ रहे हैं। सुविधाएं लोगों को मिलनी चाहिए और विकास भी होना चाहिए। लेकिन संतुलन बना रहना चाहिए।
यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में अब 19 प्रतिशत आबादी ही गांव में बसती है। हालांकि भारत में यह कुछ प्रतिशत ज्यादा हो सकती है। लेकिन हमारा मानना है कि ग्राम और शहर अगर सुविधाओं की तराजू में रखे जाएं तो गांव को गांव के हिसाब से और शहर को शहर के हिसाब से संतुलित करना होगा। गांव में आसपास की जमीन सस्ते रेटों पर खरीदना और फिर यहां बड़ी-बड़ी इमारतें, होटल, रेस्टोरेंट और बैंक्वेट बनाकर व्यापार करना गांव के समेटने के लिए एक बुरी खबर है। इस मामले में लोगों को खुद भी पलायन रोकना होगा और सरकार की कोशिश भी यही होनी चाहिए कि गांव और शहर के बीच में संतुलन बना रहे तथा नजारा ऐसा हो कि ग्रामीण कहे गांव हमारा स्वर्ग है और इधर शहरी कहे हमारा शहर स्वर्ग है।























